विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीमहावीर-गणधर-कल्प १७१
अचलभ्राता हारीतगोत्रीय, मेतार्य और प्रभास स्वामी कौडिन्य-
गोत्रज थे।
(७) गृहस्थ पर्याय —इन्द्रभूति का ५० वर्ष, अग्निभूति का
४६ वर्ष, वायुभूति का ४२ वर्ष, व्यक्त का ५० वर्ष, मण्डित का
५३ वर्ष, मोरियपुत्र का ६५ वर्ष, अकम्पित का ४८ वर्ष, अचल-
भ्राता का ४६ वर्ष, मेतार्य का ३६ वर्ष और प्रभास स्वामी का
१६ वर्ष था।
(८) सशय—इन्द्रभूति का 'जीव' विषयक सशय भगवान
महावीर ने मिटाया। अग्नि भूति का 'कर्म' विपयक, वायुभूति
का जीव-शरीर विषयक, व्यक्त का पच महाभूत विषयक, सुधर्मा
स्वामी का जैसा यह भव वैसा ही परभव, मण्डित का बन्ध-मोक्ष-
विषयक, मोरियपुत्र का देवसम्बन्धी, अकपित का नरक.सबधी,
अचलभ्राता का पुण्य-पापसम्बन्धी, मेतार्य का परलोकविषयक,
एव प्रभास स्वामी का निर्वाणविषयक सन्देह भगवान ने
मिटाया था।
(९-१०-११-१२) द्वार —ग्यारह गणधरो का दीक्षादिवस
एकादशी है। उन यज्ञवाटिका मे उपस्थितो ने समवशरण मे
देवो का आगमन देख कर वैशाख शुक्ल ११ के दिन, मध्यम पावा
नगरी मे, महसेन वनोद्यान मे पूर्वाह्न देश और पूर्वाह्न काल मे
भगवान् महावीर स्वामी के पास दीक्षा ग्रहण की थी।
(१३) व्रत परिवार—इन्द्रभूति आदि पाँच सौ छात्रो के साथ
दीक्षित हुए। मण्डित व मोरियपुत्र साढे तीन सौ एवं अकम्पितादि
चारो गणधर तीन-तीन सौ छात्रो के साथ प्रत्येक दीक्षित हुए थे।
(१४) छद्मस्थ पर्याय—इन्द्रभूति का तीस वर्ष, अग्निभूति का
बारह वर्ष, आयुभूति का दश वर्ष, व्यक्त का बारह वर्ष, सुधर्मा
स्वामी का वयालीस वर्ष, मण्डित और मोरियपुत्र का चौदह वर्ष,