विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
पृष्ठ 255, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें१७२ विविध तीर्थ-कल्प
अकम्पित का नौ वर्ष, अचलभ्राता का बारह वर्ष, मेतार्य का दस
वर्ष और प्रभात का साठ वर्ष छद्मस्थकाल है।
(१५) केवलित्व—इन्द्रभूति गणधर बारह वर्ष, अग्निभूति
सोलह वर्ष, वायुभूति और व्यक्त अठारह-अठारह वर्ष, आर्य
सुधर्मा स्वामी आठ वर्ष, मण्डित और मोरियपुत्र सोलह सोलह
वर्ष, अचलभ्राता चौदह वर्ष, मेतार्य और प्रभास गणधर प्रत्येक
सोलह-सोलह वर्ष केवलीपर्याय मे विचरे थे।
(१६) रूप—ग्यारहों गणधर वज्र ऋषभ नाराच संघयण वाले
सम चतुरस्र संस्थान, स्वर्णाभ देह वर्ण वाले एवं तीर्थङ्करों की भाँति
रूप सम्पदा वाले थे। तीर्थङ्कर के लिए कहा है कि—समस्त देवों
का सौन्दर्य यदि अगुष्ठ प्रमाण मे विकुर्वण किया जाय तो भी वे
जिनेश्वर के पदाङ्गुष्ठ के वरावर शोभा नही देते। इन वाक्यो के
अनुसार तीर्थङ्करों का रूप अद्वितीय होता है। उनसे किञ्चन न्यून
गणधरो का, उनसे कुछ हीन आहारक शरीर वालो का, उनसे
न्यून अनुत्तर देवो का, उनसे हीन नौ ग्रैवेयक पर्यवसान देवो का,
उनसे हीन क्रमश अच्युत देवलोक से लगा कर सौधर्म देवलोक
के देवो का रूप होता है। उनसे भी हीन भुवनपति, उनसे हीन
ज्योतिषी देव और उनसे हीन व्यन्तर देवो का रूप होता है।
उनसे भी हीन चक्रवर्त्ती, उनसे हीन अर्ध चक्री वामुदेवो का उनसे
हीन बलदेवो का एवं उनसे हीन अवशिष्ट लोगो का रूप होता
है। इस प्रकार के विशिष्ट रूपधारी गणधर होते हैं।
श्रुतज्ञान की दृष्टि से गृहस्थावास मे वे चतुर्दश विद्या के
पारगत, श्रामण्य मे द्वादश अग गणि पिटक के पारगामी और
सभी द्वादशाङ्गो के प्रणेता होते हैं।
(१७) लब्धि—सभी गणधर सर्वलब्धिसम्पन्न होते हैं। अतः
बुद्धिलब्धि (१८ प्रकार) केवलज्ञान, अवधिज्ञान, मन पर्यवज्ञान,