विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकोकावसतिपार्श्वनाथ-कल्प १७५
अभयदेव सूरि हर्ष पुर से एक बार ग्रामानुग्राम विचरते हुए श्री
अणहिल्लवाड पाटण मे आये । बाह्य प्रदेश मे वे सपरिवार रहे ।
एक दिन महाराजा श्री जयसिंहदेव गजारूढ होकर राजवाटिका
मे आया और सूरिजी को मल-मलिन वस्त्र-देहयुक्त देखा । राजा
ने हाथी से उतर कर नमस्कार करते हुए उन्हे दुष्कर क्रियागील
देखकर 'मलधारि' नाम दिया । राजा उन्हे अभ्यर्थना करके
नगर मे ले गया और घृतवसही के निकट उपाश्रय दिया जहाँ
सूरि महाराज रहे ।
कालक्रम से उनके पट्ट पर अनेक ग्रंथ निर्माण द्वारा विख्यात
कीर्त्ति वाले श्री हेमचन्द्रसूरि (मलधारि) हुए । वे प्रतिदिन चौमासी
चौदस से घृतवसही मे जाकर व्याख्यान करते । एक दिन घृत-
वसति के किसी गोष्ठी के पितृ-कार्य से उस चैत्य मे बलि-
विस्तरादि करना प्रारंभ किया । जब श्रीहेमचन्द्र सूरिजी व्याख्यान
करने के लिए वहाँ पधारे तो गोष्ठी लोगो ने प्रतिषेध करते हुए
कहा—आज यहाँ व्याख्यान न करे क्योकि बलि-मंडनादि से
अवकाश नही है । सूरि जी ने कहा—आज थोडा सा व्याख्यान
करेंगे जिससे चौमासे के व्याख्यान मे विच्छेद न हो । पर गोष्ठी
लोगो के न मानने पर आचार्य महाराज उदास मन से उपाश्रय
लौट आये ।
गुरु महाराज को दु खित चित्त ज्ञात कर सौवर्णिक मोखदेव-
नायग नामक श्रावक ने और किसी दिन पराये चैत्य मे ऐसा
अपमान न हो इसलिए नव्य चैत्य निर्माणार्थ घृतवसति के निकट
भूमि माँगी, पर कही भी नही मिली । तब कोका नामक सेठ मे
भूमि मागी । घृतवसति के गोष्टिको ने मना कर दिया और तिगुना
मूल्य देने को प्रस्तुत हो गए । सूरि महाराज सघसहित कोका के
घर पधारे । उसने आदरपूर्वक कहा—मैने यथोचित मूल्य मे
भूमि दी, पर मेरे नाम से चैत्य बनवाना । सूरि महाराज और