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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 256

श्रीमहावीर-गणधर-कल्प १७३
बीजवुद्धि, कोष्टबुद्धि, पदानुसारित्व, सभिन्न सोइत्व, दूरासायण
सामर्थ्य, दूरस्पर्शसामर्थ्य, दूरदर्शनसामर्थ्य, दूरश्रवणसामर्थ्य,
दशपूर्वित्व, चतुर्दशपूर्वित्व, अष्टाङ्ग महानिमित्त कौशल्य, पण्णा-
सवण्णत, प्रत्येकवुद्धत्व, वादित्व ।
क्रियाविषयक लब्धियाँ दो प्रकार की होती है—
१ चारण लब्धि, २ आकाशगामित्व लब्धि ।
विकुर्वित लब्धि अनेक प्रकार की होती है—
अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, पत्ती, प्रकामित्व, इसित्त,
वसित्त, अप्रतिघात, अन्तर्द्धान, कामरूपित्व इत्यादि ।
तपातिशय लब्धि सात प्रकार की होती है । यथा—
उग्रतपत्व, दित्त तपत्व, महातपत्व, घोर तपत्व, घोर परा-
क्रमत्व, घोर ब्रह्मचारित्व, अघोर ब्रह्मचारित्व ।
वललब्धि तीन प्रकार की होती है—
१ मनोबलित्व, २ वचनबलित्व, ३ कायबलित्व ।
औषधिलब्धि आठ प्रकार की होती है—
१ आमोसहि लब्धि, २ खेलोसहि लब्धि, ३ जल्लोसहि
लब्धि, ४ मलोषधि लब्धि, ५ विप्पोसहि लब्धि, ६ सर्वोषधि
लब्धि, ७ आसग अविसत्व, ८ दृष्टि अविषत्व ।
रसलब्धि छ प्रकार की होती है, यथा— ́
१ वचन विषत्व, २ दृष्टि विषत्व, ३ क्षीराश्रवित्व, ४ मधु
आश्रवित्व, ५ रूपि आश्रवित्व, ६ अमृताश्रवित्व ।
क्षेत्रलब्धि दो प्रकार की होती है—
१ अक्षीण महान सत्व, २ अक्षोण महालयत्त्व ।
सभी गणधर इन लब्धियो से सम्पन्न होते हैं ।
(१८) सर्वायु—इन्द्रभूति की वाणवे वर्ष, अग्निभूति की चौह-
त्तर वर्ष, वायुभूति की सत्तर वर्ष, व्यक्त की अस्सी वर्ष, आर्य