विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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श्रावको ने उसके प्रस्ताव को मान लिया और घृतवसति के
निकट "कोकावसति" नामक चैत्य बनवाया। उसमे श्री पार्श्व-
नाथ भगवान स्थापित किए, त्रिकाल पूजा होने लगी।
कालक्रम से श्री भीमदेव के शासनकाल मे पाटण का भग
करते मालवा के सुलतान ने पार्श्वनाथ प्रतिमा भी भंग कर दी।
सौवर्णिक नायग के वशज सेठ रामदेव-आसधर ने उद्धार करना
प्रारभ किया। आरासन से तीन फलक आये, पर वे निर्दोष नही
थे। अत उनके तीन बिम्ब घड़ाने पर भी गुरु महाराज एवं
श्रावको को सन्तोष नही हुआ। तब सेठ रामदेव ने अभिग्रह लिया
कि जब तक पार्श्वनाथ प्रतिमा न हो, भोजन नही करूँगा। गुरु
महाराज भी उपवास कर रहे थे। आठवें उपवास मे रामदेव को
देव का आदेश हुआ कि जहाँ अक्षत पुष्प युक्त गहुली दिखाई दे,
उसके नीचे यही चैत्य के निकट इतने हाथ नीचे पाषाणफलक
विद्यमान हं। भूमि खोदकर फलक प्राप्त किया और पार्श्वनाथ
भगवान का अनुपम रूप वाला विम्ब बनवाया। विक्रम संवत्
१२६६ वर्ष मे श्री देवानंद सूरि जी ने प्रतिष्ठित कर भगवान को
चैत्य मे स्थापित किया। कोका पार्श्वनाथ नाम प्रसिद्ध हुआ।
सेठ रामदेव के तिहुणा और जाजा नाम के पुत्र हुए। तिहुण
का पुत्र मल्ल हुआ। उसके देल्हण और जइतसीह नामक पुत्र हैं
जो प्रतिदिन भगवान पार्श्वनाथ की पूजा करते है।
एक दिन श्री सखेश्वर पार्श्वनाथ भगवान (के अधिष्ठायक)
ने देल्हण को स्वप्न दिया कि प्रभात मे चार घडी पर्यन्त कोका
पार्श्वनाथ प्रतिमा का, मैं सानिध्य करूँगा। उस चार घडी
के समय एक प्रतिमा की पूजा करते हमारी पूजा हो जायगी।
उसी प्रकार लोगो द्वारा पूज्य मान श्री कोकावसति पार्श्व-
नाथ भी श्री सखेश्वर पार्श्वनाथ की भाँति परचे पूरते है।