विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री कोटिशिलातीर्थ-कल्प १७७
सखेश्वर पार्श्वनाथ सम्बन्धी पूजा-यात्रा-अभिग्रहादि लोगो के यही
पूर्ण होते हैं।
इस प्रकार सन्निहित प्रातिहार्य श्री कोकावसति पार्श्वनाथ
की तेतीस पर्वांगुल प्रमाण प्रतिमा मलधारि गच्छ प्रतिबद्ध है।
अणहिलपत्तणमण्डन श्री कोकावसति पार्श्वनाथ का यह सक्षिप्त
कल्प लोगो का क्लेश नष्ट करे।
श्री कोकावसति पार्श्वनाथ-कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थ-
श्लोक सख्या ४० है।
४१. श्रीकोटिशिलातीर्थ-कल्प
जिनेश्वर भगवान को नमस्कार करके पूर्व पुरुष-सिंहो के
वाक्यो का सहारा लेकर श्री कोटिशिलातीर्थ का कल्प श्री जिन-
प्रभसूरि प्रकाशित करते हैं।
इस भरतक्षेत्र मे मगधदेश मे कोटिशिला तीर्थ है, जो आज
भी चारण, सुर-असुर और यक्षो के द्वारा पूजा जाता है। भरतार्द्ध-
वासिनी अधिष्ठिता देवता द्वारा भी सतत (पूजा होती है), वह एक
योजन पृथुल और एक योजन ऊँचा है।
सभी तीन खण्ड पृथ्वी के स्वामी वासुदेव देवो, मनुष्यो और
विद्याधरो के प्रत्यक्ष मे उसे उपाड कर (उठा कर) अपने बाहुबल
की परीक्षा करते हैं।
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