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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 261

१७८ विविध तीर्थ-कल्प

प्रथम वासुदेव ने उसका छत्र किया, दूसरे ने मस्तक तक,
तीसरे ने ग्रीवापर्यन्त, चौथे ने छाती तक, पाँचवे ने उदर पर्यन्त,
छट्ठे ने कटि प्रदेश तक, सातवे वासुदेव ने जघा तक -ऊँचा
उठाया। आठवे ने जानुपर्यन्त और नौवे कृष्ण वासुदेव ने उसे
अपनी वायो भुजा से उठा कर भूमि से चार अगुल ऊँचा किया।
अवसर्पिणी काल के प्रभाव से क्रमश मनुष्य का वलादि कम
होता जाता है। तीर्थङ्करो का वल सब का एक जैसा होता है।
जिस कोटिगिला को करोड वलवान् सुभटो द्वारा उठाना
अशक्य है, उसे अकेला वासुदेव उठा लेता है।
शान्तिनाथ भगवान के प्रथम गणधर चक्रायुध विधिपूर्वक
अनशन करके कोटिशिला पर मुक्त हुए।
गान्तिनाथ भगवान के तीर्थ मे सख्याबद्ध मुनियो की कोटि
यही सिद्ध हुई एव श्री कुन्थुनाथ भगवान के तीर्थ मे भी। श्री
अरनाथ जिनेश्वर के तीर्थ मे भी बारह श्रमणो की कोटि और
मल्लि जिनेश्वर के तीर्थ मे छ, कोटि ऋषि सिद्ध हुए। मुनि
सुव्रतनाथ जिनेश्वर के तीर्थ मे तीन कोटि सिद्ध हुए। नमिनाथ -
भगवान के तीर्थ मे एक कोटि अणगार सिद्ध हुए।
वहाँ अन्य भी अनेक महर्षि गाश्वत पद को प्राप्त हुए।
इसीसे भूमण्डल मे कोटिगिलातीर्थ विख्यात हुआ।
पूर्वाचार्यो ने इससे विशेष भी कुछ कहा है, जैसे-
दशार्ण पर्वत के समीप योजन पृथुलयाम वाली कोटिगिला
है। छ तीर्थङ्करो के गासन मे वहाँ से अनेको कोटि मुनि सिद्ध
हुए।
गान्तिनाथ स्वामी के प्रथम गणधर चक्रायुध अनेक साधुओ
के परिवार सहित यहाँ से बत्तीस युगो तक सख्यात कोटि मुनि
सिद्ध हुए। कुन्थुनाथ भगवान के अठाइस युगो तक सख्यात मुनि