विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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सुधर्मा स्वामी की सौ वर्ष, मण्डित की त्रेयासी वर्ष, मोरियपुत्र की
पचानवे वर्ष, अकम्पित की अठहत्तर वर्ष, अचलभ्राता की बहत्तर
वर्ष, मेतार्य की बासठ वर्ष और प्रभास स्वामी की सर्वायु चालीस
वर्ष की थी।
(१९)-(२०) मोक्ष स्थान व तप—सभी गणधरो का निर्वाण
मासभक्तोपवास व पादोपगमन पूर्वक राजगृह नगर के वैभार
गिरि पर्वत पर हुआ। प्रथम और पचम गणधर के अतिरिक्त नौ
गणधर भगवान् महावीर की विद्यमानता मे ही मोक्ष प्राप्त हुए।
इन्द्रभूति और सुधर्मा स्वामी भगवान के निर्वाणोपरान्त मोक्ष गए।
यह गणधर-कल्प जो प्रतिदिन प्रातः काल प्रसन्न चित्त से
पढता है उसके करतल मे सभी कल्याणपरम्पराएं निवास
करती हैं।
संवत् १३८९ विक्रमीय के ज्येष्ठ शुक्ल पचमी बुधवार के दिन
श्री जिनप्रभसूरिकृत गणधर-कल्प चिरकाल तक जयवन्त रहे।
श्री महावीर-गणधर कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थसख्या
६८ है।
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४०. कोकावसति पार्श्वनाथ-कल्प
पद्मावती-नागराज धरणेन्द्र द्वारा ससेवित पार्श्वनाथ भगवान
को नमस्कार करके कोकावसति पार्श्वनाथ का थोडा सा वृत्तान्त
कहता हूँ।
श्री प्रश्नवाहणकुल संभूत हर्षपुरीये गच्छालंकार भूषित श्री