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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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वाराणसीनगरी-कल्प १६९
धर्मेक्षा नामका सन्निवेश है जहाँ अपने ऊँचे शिखरो से गगन को
चूमने वाला गौतम बुद्ध का आयतन है। यहाँ से ढाई योजन आगे
चन्द्रावती नगरी है, जहाँ पर अखिल भुवनजनो को तुष्ट करने
वाले चन्द्रप्रभ भगवान के गर्भावतारादि चार कल्याणक हुए हैं।
दो भगवान के जन्म और गंगोदक से गौरववती काशी
नगरी किसके द्वारा प्रकाशित नही है ? अर्थात् सभी ने इसका
वर्णन किया है। इस अनल्प समृद्धि वाली वाराणसी का कल्प
श्रीमान् जिनप्रभसूरि मुनीन्द्र ने बनाया है।
श्री वाराणसी नगरी का कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थसंख्या
११३ व २३ अक्षर ऊपर है।
३१. महावीर-गणधर-कल्प
श्री वीर प्रभु के ब्राह्मण-वंशोत्पन्न ग्यारह गणधरो को
नमस्कार करके शास्त्रो के अनुसार उनका कल्प सक्षेप से कहता
हूँ। उनके (१) नाम, (२) स्थान, (३) पिता, (४) माता, (५) जन्म-
नक्षत्र, (६) गोत्रादि, (७) गृहपर्याय, (८) सशय, (९) व्रतदिवस,
(१०) नगर, (११) देश, (१२) काल, (१३) व्रतपरिवार, (१४)
छद्मस्थ, (१५) केवलित्व वर्षसंख्या, (१६) रूप, (१७) लब्धि
(१८) आयुष्य, (१९) मोक्ष स्थान, (२०) तप आदि द्वार वर्णन
करता हूँ।
(१) गणधरो के नाम—१ इन्द्रभूति, (२) अग्निभूति, (३)