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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

४८ वात्स्यायन-कामसूत्र
दाँतों के दोष—कुण्ठित (अतीक्ष्ण या भोथरे) हों; तीक्ष्ण न हों, दन्तपंक्ति से बाहर
निकले हुए हों, स्वाभाविक चमक से रहित हों, या रूक्ष हो, ऊँचे नीचे या खुरदुरे हों, बहुत पतले
या बहुत मोटे हों, और विरल हों ॥ ३ ॥
गूढकमुच्छूनकं बिन्दुबिन्दुमाला प्रवालमणिर्मणिमाला खण्डाभ्रकं वराह-
चर्वितकमिति दशनच्छेदनविकल्पाः ॥ ४ ॥
दन्तक्षत के आठ भेद—गूढ़क, उच्छूनक, बिन्दु, बिन्दुमाला, प्रवालमणि, मणिमाला,
खण्डाभ्रक और वराहचर्वितक ॥ ४ ॥
नातिलोहितेन रागमात्रेण विभावनीयं गूढकम् ॥ ५ ॥
गूढ़क—जब अधर को इस प्रकार कोमलतापूर्वक दबाया जाये कि ओष्ठ में चिह्न न बने,
मात्र हल्की सी लालिमा ही आये, तो उसे गूढ़क कहते हैं ॥ ५ ॥
तदेव पीडनादुच्छूनकम् ॥ ६ ॥
उच्छूनक—जब गूढ़क कुछ दबाकर सम्पादित किया जाये, तो यह दन्तक्षत उच्छूनक
कहलाता है ॥ ६ ॥
तदुभयं बिन्दुरधरमध्य इति ॥ ७ ॥
गूढ़क, उच्छूनक और बिन्दु का स्थान—गूढ़क, उच्छूनक और बिन्दु—ये तीनों
दन्तक्षत अधर के मध्य में ही किये जाते हैं ॥ ७ ॥
उच्छूनकं प्रवालमणिश्च कपोले ॥ ८ ॥
उच्छूनक और प्रवालमणि का स्थान—उच्छूनक और प्रवालमणि दन्तक्षत कपोल पर
किये जाते हैं ॥ ८ ॥
कर्णपूरचुम्बनं नखदशनच्छेद्यमिति सव्यकपोलमण्डनानि ॥ ९ ॥
कर्णपूर (कर्णफूल या कर्णाभरण), चुम्बन, नखक्षत और दन्तक्षत—ये सब बायें कपोल
के भूषण हैं। अर्थात् इन्हें नायिका के बायें कपोल पर ही सम्पादित करना चाहिये ॥ ९ ॥
दन्तौष्ठसंयोगाभ्यासनिष्पादनात् प्रवालमणिसिद्धिः ॥ १० ॥
प्रवालमणि—ऊपर के दाँत और अधर से बार-बार एक ही स्थान को दबाते रहने से
प्रवालमणि दन्तक्षत होता है ॥ १० ॥
सर्वस्येयं मणिमालायाश्च ॥ ११ ॥
मणिमाला—एक ही स्थान पर कई प्रवालमणि बनाना मणिमाला कहलाता है ॥ ११ ॥
अल्पदेशायाश्च त्वचो दशनद्वयसंदंशजा बिन्दुसिद्धिः ॥ १२ ॥
बिन्दु—ऊपर और नीचे के दो दाँतों की नोंक से दबाने पर तिलभर चिह्न बना देना बिन्दु
कहलाता है ॥ १२ ॥
सर्वैर्बिन्दुमालायाश्च ॥ १३ ॥
बिन्दुमाला—एक ही स्थान पर सब दाँतों से बने अनेक बिन्दुओं को (माला के समान
आकार होने के कारण) बिन्दुमाला कहते हैं ॥ १३ ॥
तस्मान्मालाद्वयमपि गलकक्षवंक्षणप्रदेशेषु ॥ १४ ॥

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ४९
मणिमाला और बिन्दुमाला का स्थान—अतएव ये दोनों मालाएँ—मणिमाला और
बिन्दुमाला—गला, काँख और गुह्यस्थल पर ही होती हैं॥ १४॥
ललाटे चोर्वोर्बिन्दुमाला॥ १५॥
बिन्दुमाला का स्थान—बिन्दुमाला का प्रयोग मस्तक और जाँघों पर भी होता है॥ १५॥
मण्डलमिव विषमकूटकयुक्तं खण्डाभ्रकं स्तनपृष्ठ एव॥ १६॥
खण्डाभ्रक—मण्डल (वृत्त या घेरे) के समान दाँतों के छिन्न और असमान चिह्न,
बादल के टुकड़े के समान होने के खण्डाभ्रक कहलाते हैं। यह स्तनों पर किया जाता है॥ १६॥
संहताः प्रदीर्घा बह्वयो दशनपदराजयस्ताम्रान्तराला वराहचर्वितकम्। स्तनपृष्ठ
एव॥ १७॥
वराहचर्वितक—परस्पर सटी हुई, लम्बे लम्बे दन्तक्षत की पंक्तियाँ जिनका मध्य भाग
दाँतों से चबाने के कारण ताँबे-जैसा लाल हो गया हो, वराहचर्वितक कहलाता है। यह भी
स्तनपृष्ठ पर ही अंकित किया जाता है॥ १७॥
तदुभयमपि च चण्डवेगयोः। इति दशनच्छेद्यानि॥ १८॥
खण्डाभ्रक और वराहचर्वितक—इन दोनों का प्रयोग चण्डवेग वाले नायक और नायिका
ही करते हैं। दन्तक्षत के भेद समाप्त हुए॥ १८॥
विशेषके कर्णपूरे पुष्पापीडे ताम्बूलपलाशे तमालपत्रे चेति प्रयोज्यागामिषु
नखदशनच्छेद्यान्याभियोगिकानि॥ १९॥
सांक्रान्तिक आभियोगिक—मस्तक पर शोभार्थ धारण किये जाने वाले भोजपत्र आदि
से निर्मित तिलक पर, कानों में पहने जाने वाले नीलकमल पर, चोटी में बाँधे जाने वाले फूलों
के गजरों पर, पान के बीड़े पर, और तमाल-पत्र पर जो नायिका को प्रेमवश भेजे जा रहे हों,
नायक नखक्षत एवं दन्तक्षत अंकित करके अपना हृदयस्थ प्रेम व्यक्त करते हैं॥ १९॥
देशसात्म्याच्च योषित उपचरेत्॥ २०॥
देशोपचारप्रकरण—विभिन्न देशों में प्रचलित प्रवृत्तियों को ही देश्य कहते हैं, और ये
स्त्री के उपचार होने से देशोपचार कहलाते हैं। इन्हें इस प्रकरण में कहते हैं—स्त्रियों के देश
और प्रकृति के अनुरूप ही चुम्बन आदि का प्रयोग करना चाहिये॥ २०॥
मध्यदेश्या आर्यप्रायाः शुच्युपचाराश्चुम्बननखदन्तपदद्वेषिण्यः॥ २१॥
मध्यदेश में प्रायः आर्य जाति निवास करती है। इस जाति की स्त्रियाँ पवित्र प्रेम-व्यवहार
और अच्छे आचरण वाली होती हैं। वे चुम्बन, नखक्षत और दन्तक्षत की पसन्द नहीं
करती हैं॥ २१॥
बाह्लीकदेश्या आवन्तिकाश्च॥ २२॥
बाह्लीक देश और अवन्ति की स्त्रियाँ भी प्रायः ऐसी ही होती हैं॥ २२॥
चित्ररतेषु त्वासामभिनिवेशः॥ २३॥
बाह्लीक और अवन्ति देश की स्त्रियाँ चित्ररतों में विशेष आसक्ति रखती हैं॥ २३॥
(चित्ररतों को आगे—इसी अधिकरण के षष्ठ अध्याय में—कहेंगे।)

५० वात्स्यायन-कामसूत्र
परिष्वङ्गचुम्बननखदन्तचूषणप्रधानाः क्षतवर्जिताः प्रहणनसाध्या मालव्य
आभीर्यश्च ॥ २४ ॥
मालव और आभीर देश की स्त्रियाँ आलिङ्गन, चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत और शिश्न को
चूसना अधिक पसन्द करती हैं। वे क्षत (घाव) नहीं चाहतीं, किन्तु प्रहणन में रुचि
रखती हैं ॥ २४ ॥
सिन्धुषष्ठानां च नदीनामन्तरालीया औपरिष्टकसात्म्याः ॥ २५ ॥
पंजाब और सिन्ध प्रान्त की स्त्रियों को औपरिष्टक (मुखमैथुन) अनुकूल पड़ता
है ॥ २५ ॥
चण्डवेगा मन्दसीत्कृता आपरान्तिका लाट्यश्च ॥ २६ ॥
अपरान्तक (सह्याद्रि का निकटवर्ती पश्चिमी सीमाप्रदेश) और लाट देश (सूरत, भड़ौँच
एवं समीपवर्ती भूभाग) की स्त्रियाँ चण्डवेग होती हैं और वे समागम में प्रहारों को सहकर
मन्द-मन्द सीत्कार करती हैं ॥ २६ ॥
(खरवेग और चण्डवेग में स्वल्प अन्तर है। खरवेग में खाज की अधिकता होती है
जबकि चण्डवेग में राग या काम की अधिकता ।)
दृढप्रहणनयोगिन्यः खरवेगा एव, अपद्रव्यप्रधानाः स्त्रीराज्ये कोशलायां
च ॥ २७ ॥
स्त्रीराज्य और कोशल देश की स्त्रियाँ खरवेग होती हैं। ये समागम में शिश्न के दृढ़
प्रहार चाहती हैं और रमणेच्छा शान्त न होने पर अपद्रव्य (कृत्रिम शिश्न) का भी प्रयोग करती
हैं ॥ २७ ॥
प्रकृत्या मृद्व्यो रतिप्रिया अशुचिरुचयो निराचाराश्चान्ध्र्यः ॥ २८ ॥
आन्ध्र—आन्ध्र देश की स्त्रियाँ कोमलाङ्गी, सम्भोगप्रिय, समागम में गन्दी रुचिवाली
और आचरणहीन (व्यभिचारिणी) होती हैं ॥ २८ ॥
सकलचतुःषष्टिप्रयोगरागिण्योऽश्लीलपरुषवाक्यप्रियाः शयने च सरभसोप-
क्रमा महाराष्ट्रीकाः ॥ २९ ॥
महाराष्ट्र—महाराष्ट्र देश की स्त्रियाँ चौंसठ कलाओं के प्रयोग में अनुराग रखती हैं, वे
समागम के समय अश्लील और परुष भाषा बोलती है और मैथुन का समारम्भ अत्यन्त साहस
एवं उत्साहपूर्वक करती हैं ॥ २९ ॥
तथाविधा एव रहसि प्रकाशन्ते नागरिकाः ॥ ३० ॥
मगध (पटना प्रान्त) की स्त्रियाँ भी महाराष्ट्र की स्त्रियों के समान ही होती हैं, परन्तु ये
कामकलाओं का अभ्यास और अश्लील एवं परुष वचनों का प्रयोग एकान्त में करती हैं ॥ ३० ॥
मृद्यमानाश्चाभियोगान्मन्दं मन्दं प्रसिञ्चन्ते द्रविड्यः ॥ ३१ ॥
द्रविड़—द्रविड़ देश की स्त्रियाँ आलिङ्गन आदि करते ही मन्द-मन्द रजःस्राव करने
लगती हैं ॥ ३१ ॥

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५१
मध्यमवेगाः सर्वंसहाः स्वाङ्गप्रच्छादिन्यः पराङ्गहासिन्यः कुत्सिताश्लील-
परुषपरिहारिण्यो वानवासिकाः ॥ ३२ ॥
वनवासी देश—वनवासी देश की स्त्रियाँ मध्यम वेग वाली होती हैं, वे नखक्षत,
दन्तक्षत, कुचमर्दन आदि सभी को सहन कर जाती हैं। वे अपने अङ्गों को आच्छादित रखती हैं,
किन्तु दूसरे के शरीरगत दोषों का उपहास करती हैं। वे कुत्सित, अश्लील और परुष स्वभाव
वाले पुरुषों से घृणा करती हैं ॥ ३२ ॥
मृदुभाषिण्योऽनुरागवत्यो मृद्व्यङ्ग्यश्च गौड्यः ॥ ३३ ॥
गौड़—गौड़ देश की स्त्रियाँ मृदुभाषिणी, पति से अनुराग रखने वाली और कोमलाङ्गी
होती हैं ॥ ३३ ॥
देशसात्म्यात् प्रकृतिसात्म्यं बलीय इति सुवर्णनाभः। न तत्र देश्या
उपचाराः ॥ ३४ ॥
देशसात्म्य से प्रकृतिसात्म्य की महत्ता—देशाचार से व्यक्ति की प्रकृति और प्रवृत्ति
अधिक बलवान् है, अतएव व्यक्ति की प्रकृति और प्रवृत्ति के विरुद्ध देशाचार नहीं अपनाना
चाहिये—ऐसा आचार्य सुवर्णनाभ का मत है ॥ ३४ ॥
कालयोगाच्च देशाद् देशान्तरमुपचारवेषलीलाश्चानुगच्छन्ति। तच्च
विद्यात् ॥ ३५ ॥
देशाचार की व्यापकता—समय के साथ-साथ एक देश के उपचार, वेशभूषा और
कामक्रीड़ाएँ दूसरे देशों में भी पहुँच जाते हैं, अतएव दूसरे स्थानों के आचार-विचार को भी जान
लेना चाहिये ॥ ३५ ॥
उपगूहनादिषु च रागवर्धनं पूर्वं पूर्वं विचित्रमुत्तरमुत्तरं च ॥ ३६ ॥
आलिङ्गन, चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत, प्रहणन और सीत्कार—इनमें प्रत्येक उपक्रिया
अपने उत्तरवर्ती से अधिक कामोत्तेजक है, लेकिन पूर्ववर्ती से अधिक विचित्र है ॥ ३६ ॥
वार्यमाणश्च पुरुषो यत्कुर्यात्तदनु क्षतम्।
अमृष्यमाणा द्विगुणं तदेव प्रतियोजयेत् ॥ ३७ ॥
एकान्त की चेष्टाएँ—यदि ना करने पर भी पुरुष नखक्षत और दन्तक्षत का प्रयोग करे,
तो स्त्री को चाहिये कि वह उससे दोगुना नखक्षत और दन्तक्षत का प्रयोग करे ॥ ३७ ॥
बिन्दोः प्रतिक्रिया माला मालायाश्चाभ्रखण्डकम्।
इति क्रोधादिवाविष्टा कलहान् प्रतियोजयेत् ॥ ३८ ॥
किस उपक्रिया का कौन दोगुना होता है, यह बताते हैं—बिन्दु के उत्तर में माला और
माला के उत्तर में खण्डाभ्रक का प्रयोग करे। इसी प्रकार क्रोध से आविष्ट होकर कलह के कार्यों
की योजना करे ॥ ३८ ॥
सकचग्रहमुन्नम्य मुखं तस्य ततः पिबेत्।
निलीयेत दशेच्चैव तत्र तत्र मदेरिता ॥ ३९ ॥
इसके पश्चात् एक हाथ से उस (नायक) के बाल पकड़कर और दूसरे हाथ में उसका

५२ वात्स्यायन-कामसूत्र
मुख झुकाकर अधरपान करे, प्रगाढ़ आलिङ्गन करे और कामोन्मत्त होकर उन-उन स्थानों पर
दन्तक्षत करे, जहाँ विहित हों अथवा उसने किये हों ॥ ३९ ॥
उन्नम्य कण्ठे कान्तस्य संश्रिता वक्षसः स्थलीम्।
मणिमालां प्रयुञ्जीत यच्चान्यदपि लक्षितम्॥ ४० ॥
दूसरी विधि—प्रिय के वक्षस्थल पर बैठकर, एक हाथ से उसका मुख उठाकर और
दूसरे हाथ को गले में डालकर ग्रीवा पर मणिमाला अथवा अन्य मोहक दन्तक्षत बना दे ॥ ४० ॥
दिवापि जनसम्बाधे नायकेन प्रदर्शितम्।
उद्दिश्य स्वकृतं चिह्नं हसेदन्यैरलक्षिता ॥ ४१ ॥
प्रकाश की चेष्टाएँ—एकान्त की चेष्टाओं को कहकर, अब प्रकाश की चेष्टाएँ कहते
हैं—न केवल रात्रि, बल्कि दिन में, मनुष्यों की भीड़ में भी नायक के शरीर पर अपने द्वारा किये
गये चिह्नों (नखक्षत एवं दन्तक्षत) को लक्ष्य करके इस प्रकार हँसे कि कोई अन्य न जान
पाये ॥ ४१ ॥
विकूणयन्तीव मुखं कुत्सयन्तीव नायकम्।
स्वगात्रस्थानि चिह्नानि सासूयेव प्रदर्शयेत् ॥ ४२ ॥
अपने मुख को चुम्बन लेने के समान संकुचित करके, नायक को झिड़कती हुई-सी,
असहनशील के समान, पति द्वारा अपने शरीर पर अंकित किये गये चिह्नों (नखक्षत एवं
दन्तक्षत) को दिखाये ॥ ४२ ॥
परस्परानुकूल्येन तदेवं लज्जमानयोः।
संवत्सरशतेनापि प्रीतिर्न परिहीयते ॥ ४३ ॥
परस्पर अनुकूलता और सलज्जता का भाव रखने वाले स्त्री-पुरुष की प्रीति सौ वर्ष में भी
क्षीण नहीं होती ॥ ४३ ॥
दशनक्षतविधिप्रकरण नामक पञ्चम अध्याय सम्पन्न ॥
●
षष्ठ अध्याय
संवेशनप्रकार-प्रकरण
रागकाले विशालयन्त्येव जघनं मृगी संविशेदुच्चरते ॥ १ ॥
उच्च और उच्चतर रत में मृगी—यदि मृगी (छोटी योनि वाली) नायिका बड़े शिश्न
वाले वृष एवं अश्व नायक में समागम करे, तो अपनी जाँघों को चौड़ा ले ॥ १ ॥
अवहासयन्तीव हस्तिनी नीचरते ॥ २ ॥
नीच और नीचतर रत में हस्तिनी—यदि हस्तिनी (बड़ी योनि वाली) नायिका छोटे
शिश्न वाले शश और वृष नायक से समागम करे, तो अपनी जाँघों को सिकोड़ ले ॥ २ ॥

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५३
न्याय्यो यत्र योगस्तत्र समपृष्ठम् ॥ ३ ॥
समरत की व्यवस्था—यदि नायक और नायिका के साधन (शिश्न एवं योनि) समान
आकार वाले हों, तो नायिका को न जाँघें फैलाने की आवश्यकता होती है और न सिकोड़ने
की ॥ ३ ॥
आभ्यां वडवा व्याख्याता ॥ ४ ॥
मृगी और हस्तिनी की व्यवस्था से वडवा नायिका की व्यवस्था भी कह दी गयी है।
(उसे शश नायक के साथ समागम करते समय नीचरत में जाँघों को सिकोड़ लेना चाहिये और
अश्व नायक के साथ समागम करते समय—उच्चरत में—जाँघों को चौड़ा लेना चाहिये) ॥ ४ ॥
तत्र जघनेन नायकं प्रतिगृह्णीयात् ॥ ५ ॥
शिश्नग्रहण की विधि—समागम में स्त्री लेटकर पुरुष के शिश्न को ग्रहण करे, तो
अपना शरीर ढीला छोड़ दे ॥ ५ ॥
अपद्रव्याणि च सविशेषं नीचरते ॥ ६ ॥
नीचरत में अपद्रव्य (कृत्रिम लिङ्ग) का प्रयोग योनि को फैलाकर ही करना चाहिये,
सिकोड़कर नहीं ॥ ६ ॥
उत्फुल्लकं विजृम्भितकमिन्द्राणिकं चेति त्रितयं मृग्याः प्रायेण ॥ ७ ॥
मृगी के आसन—उत्फुल्लक, विजृम्भितक और इन्द्राणिक—ये तीन आसन प्रायः मृगी
के होते हैं ॥ ७ ॥
शिरो विनिपात्योर्ध्वं जघनमूत्फुल्लकम् ॥ ८ ॥
उत्फुल्लक—जाँघों के ऊपरी भाग को नीचा और निचले भाग को ऊँचा कर देने को
उत्फुल्लक आसन कहते हैं। (स्त्री के कटिभाग के नीचे तकिया रख देने से ऐसी स्थिति बन
जाती है) ॥ ८ ॥
तत्रापसारं दद्यात् ॥ ९ ॥
इस उत्फुल्लक आसन में नायक-नायिका दोनों को पीछे सरकते रहना चाहिये ॥ ९ ॥
अनीचे सक्थिनी तिर्यगवसज्य प्रतीच्छेदिति विजृम्भितकम् ॥ १० ॥
विजृम्भितक—स्त्री ऊपर उठी हुई जाँघों को फैला दे और पुरुष शिश्न को तिरछा करके
उसमें प्रवेश कराये, तो यह विजृम्भितक आसन कहलाता है ॥ १० ॥
पार्श्वयोः सममूरू विन्यस्य पार्श्वयोर्जानुनी निदध्यादित्यभ्यासयोगादि-
न्द्राणी ॥ ११ ॥
इन्द्राणिक—मिली हुई जाँघों को बगल में रखकर और पुरुष की बगल में घुटनों को
स्थापित कर देने पर इन्द्राणिक आसन होता है। यह आसन आभासिक है अर्थात् अभ्यास से ही
किया जा सकता है ॥ ११ ॥
तयोच्चतररतस्यापि परिग्रहः ॥ १२ ॥
इस इन्द्राणिक आसन से मृगी अश्व के साथ भी सुखपूर्वक समागम कर सकती है ॥ १२ ॥

५४ वात्स्यायन-कामसूत्र
सम्पुटेन प्रतिग्रहो नीचरते ॥ १३ ॥
नीच और नीचतर रत की व्यवस्था—नीचतर में सम्पुटक आदि आसनों से अपनी
योनि सिकोड़कर समागम करना चाहिये ॥ १३ ॥
एतेन नीचतररतेऽपि हस्तिन्याः ॥ १४ ॥
इस आसन से नीचतर रत में हस्तिनी नायिका शश नायक से भी समागम करे ॥ १४॥
सम्पुटकं पीडितकं वेष्टितकं वाडवकमिति ॥ १५ ॥
नीच और नीचतर रत के आसन—नीच और नीचतर रत में चार प्रकार के उपवेशन
होते हैं—सम्पुटक, पीड़ितक, वेष्टितक और वाड़वक ॥ १५ ॥
ऋजुप्रसारितावुभावप्युभयोश्चरणाविति सम्पुटः ॥ १६ ॥
सम्पुटक—जब स्त्री और पुरुष दोनों के पैर सीधे फैले हुए हों, तो सम्पुटक आसन होता
है ॥ १६ ॥
स द्विविधः—पार्श्वसम्पुट उत्तानसम्पुटश्च । तथा कर्मयोगात् ॥ १७ ॥
सम्पुटक आसन दो प्रकार का होता है—पार्श्व सम्पुट और उत्तान सम्पुट। क्योंकि
सम्पुटक आसन में स्त्री को चित लिटाकर भी समागम किया जा सकता है और बगल में करवट
के बल लिटाकर भी, इसलिए यह पार्श्व और उत्तान दो प्रकार का होता है ॥ १७ ॥
पार्श्वेण तु शयानो दक्षिणेन नारीमधिशयीतेति सार्वत्रिकमेतत् ॥ १८ ॥
शयनविधि—शयन के समय स्त्री को अपनी बायीं ओर सुलाये—यह सर्वत्र प्रचलित
रीति है ॥ १८ ॥
सम्पुटकप्रयुक्तयन्त्रेणैव दृढमूरू पीडयेदिति पीडितकम् ॥ १९ ॥
पीड़ितक—सम्पुटक आसन से समागम करते हुए, यदि स्त्री-पुरुष एक-दूसरे की जाँघों
को दृढ़तापूर्वक दबायें, तो उसे पीड़ितक आसन कहते हैं ॥ १९ ॥
ऊरू व्यत्यस्येदिति वेष्टितकम् ॥ २० ॥
वेष्टितक—यदि सम्पुटक आसन में स्त्री अपना मदनमन्दिर सिकोड़ने के लिये अपने
बाँयें पैर से पुरुष का दायाँ पैर अथवा दायें पैर से बाँया पैर लपेट ले, तो इसे वेष्टितक आसन
कहते हैं ॥ २० ॥
वडवेव निष्ठुरमवगृह्णीयादिति वाडवकमाभ्यासिकम् ॥ २१ ॥
वाड़वक—जिस प्रकार समागम के समय घोड़ी घोड़े के शिश्न को कसकर जकड़ लेती
है, उसी प्रकार जब स्त्री, पुरुष के शिश्न को प्रविष्ट होते ही जकड़ ले और पुरुष के
शिश्नसञ्चालन के समय भी दृढ़तापूर्वक उसे जकड़े रखे, तो इसे वाड़वक आसन कहते हैं। यह
आभ्यासिक अर्थात् अभ्यास से सिद्ध होने वाला आसन है ॥ २१ ॥
तदान्ध्रीषु प्रायेण। इति संवेशनप्रकारा बाभ्रवीयाः ॥ २२ ॥
आन्ध्रप्रदेश की स्त्रियों में इस वाड़वक आसन का विशेष प्रचलन है। इस प्रकार
बाभ्रवीय आचार्यों द्वारा कथित संवेशन प्रकार (सम्भोग के आसन) पूर्ण हुए ॥ २२ ॥
सौवर्णनाभास्तु ॥ २३ ॥

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५५
अब आचार्य सुवर्णनाभ द्वारा कथित आसनों को बताते हैं ॥ २३ ॥
उभावप्यूरू ऊर्ध्वादिति तद् भुग्नकम् ॥ २४ ॥
भुग्नक—यदि स्त्री अपनी दोनों जाँघों को ऊपर उठा दे, तो इसे भुग्नक आसन
कहते हैं ॥ २४ ॥
चरणावूर्ध्वं नायकोऽस्या धारयेदिति जृम्भितकम् ॥ २५ ॥
जृम्भितक—जब नायक, नायिका के दोनों पैरों को कन्धे पर धारण कर लेता है तो उसे
जृम्भितक आसन कहते हैं ॥ २५ ॥
तत्कुञ्चितावुपीडितकम् ॥ २६ ॥
उत्पीडितक—यदि पुरुष स्त्री के पैरों को सिकोड़कर वक्ष पर धारण करे, तो इसे
उत्पीडितक आसन कहते हैं ॥ २६ ॥
तदेकस्मिन् प्रसारितेऽर्धपीडितकम् ॥ २७ ॥
अर्धपीडितक—यदि उत्पीडित आसन से समागम करते समय स्त्री एक पैर को सीधा
फैला दे, तो यह अर्धपीडितक करण कहलाता है ॥ २७ ॥
नायकस्यांस एको द्वितीयकः प्रसारित इति पुनः पुनर्व्यत्यासेन वेणुदा-
रितकम् ॥ २८ ॥
वेणुदारितक—जब स्त्री अदल-बदल कर अपना एक पैर पुरुष के कन्धे पर रखे, दूसरा
सीधा फैलाये तो यह वेणुदारितक करण कहलाता है ॥ २८ ॥
एकः शिरस उपरि गच्छेद् द्वितीयः प्रसारित इति शूलाचितकमाभ्यासि-
कम् ॥ २९ ॥
शूलाचितक—जब स्त्री एक पैर को पुरुष के सिर पर रखकर और दूसरे को फैलाकर
समागम करती है, तो यह शूलाचितक करण कहलाता है। यह करण भी अभ्यास से ही सिद्ध
होता है ॥ २९ ॥
संकुचितौ स्वस्तिदेशे निदध्यादिति कार्कटकम् ॥ ३० ॥
कार्कटक—जब पुरुष लेटी हुई स्त्री के पैरों को घुटनो से मोड़कर और अपने
नाभिस्थल पर लगाकर समागम करता है, तो इसे केकड़े के समान होने से कार्कटक आसन
कहते हैं ॥ ३० ॥
ऊर्ध्वावूरू व्यत्यस्येदिति पीडितकम् ॥ ३१ ॥
पीडितक—यदि समागमकाल में स्त्री अपनी दाहिनी जाँघ को बायीं ओर ले जाये और
बाँयीं जाँघ को दाहिनी ओर, तो इसे पीड़ितक आसन कहते हैं ॥ ३१ ॥
जङ्घाव्यत्यासेन पद्मासनवत् ॥ ३२ ॥
पद्मासन—चित लेटी हुई स्त्री जब अपने बाँयें पैर को दाहिनी जाँघ की जड़ में और
दाहिने पैर को बाँयीं जाँघ की जड़ में रख ले, तो इसे पद्मासन कहा जाता है ॥ ३२ ॥
पृष्ठं परिष्वजमानायाः पराङ्मुखेण परावृत्तकमाभ्यासिकम् ॥ ३३ ॥
परावृत्तक—मुख के बल लेटी स्त्री के साथ पुरुष पीठ की ओर से समागम कर, तो इसे

५६ वात्स्यायन-कामसूत्र
परावृत्तक आसन कहते हैं। यह आभ्यासिक अर्थात् अभ्यास से सिद्ध होने वाला आसन
है॥ ३३॥
जले च संविष्टोपविष्टस्थितात्मकाँश्चात्रयोगानुपलक्षयेत्। तथा सुकरत्वादिति
सुवर्णनाभः॥ ३४॥
जलसंभोग— जल में भी खड़े होकर, बैठकर और लेटकर नानाविध आसनों से जैसे
समागम कर सके, करे। यह स्थल की अपेक्षा सरल भी है और मनोरंजक भी—ऐसा आचार्य
सुवर्णनाभ का मत है॥ ३४॥
वार्तं तु तत्। शिष्टैरपस्मृतत्वादिति वात्स्यायनः॥ ३५॥
जलसंभोग का निषेध—जल में समागम असार (अनुचित) है, क्योंकि शिष्ट व्यक्तियों
ने इसकी निन्दा की है—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है॥ ३५॥
अथ चित्ररतानि॥ ३६॥
चित्ररत-प्रकरण : अब चित्ररत समागम की अद्भुत विधियों को कहते हैं॥ ३६॥
ऊर्ध्वस्थितयोर्यूनोः परस्परापाश्रययोः कुड्यस्तम्भापाश्रितयोर्वा स्थित-
रतम्॥ ३७॥
पहले स्थितरत (खड़े होकर समागम) का विधान बताते हैं—जब स्त्री-पुरुष एक-दूसरे
के सहारे या दीवार अथवा स्तम्भ (खम्बा) के सहारे खड़े होकर समागम करते हैं, तो उसे
स्थितरत कहते हैं॥ ३७॥
कुड्यापाश्रितस्य कण्ठावसक्तबाहुपाशायास्तद्धस्तपञ्जरोपविष्टाया ऊरु-
पाशेन जघनमभिवेष्टयन्त्या कुड्ये चरणक्रमेण बलन्त्या अवलम्बितकं रतम्॥ ३८॥
अवलम्बितक—जब पुरुष दीवार के सहारे खड़ा हो, उसके कण्ठ में बाहुपाश डाले हुए
स्त्री उसके मिले हुए दोनों हाथों (हस्तपंजर) पर बैठी हुई हो, और अपनी जाँघों से पुरुष की
जाँघों को लपेटकर, दीवार पर पैर लगाकर, झूला झूलती हुई-सी समागम कर रही हो, तो वह
अवलम्बितक आसन कहलाता है॥ ३८॥
भूमौ वा चतुष्पदवदास्थिताया वृषलीलयावस्कन्दनं धेनुकम्॥ ३९॥
धेनुक—स्त्री हाथों और पैरों को भूमि पर टिकाकर पशु (गाय) के समान खड़ी हो जाये
और पुरुष साँड़ के समान उसके साथ समागम करे, तो यह धेनुक आसन होता है॥ ३९॥
तत्र पृष्ठमुरःकर्माणि लभते॥ ४०॥
धेनुक आसन में वक्ष पर सम्पन्न किये जाने वाले कार्य पीठ पर सम्पन्न किये जाते
हैं॥ ४०॥
एतेनैव योगेन शौनमैणेयं छागलं गर्दभाक्रान्तं मार्जारललितकं व्याघ्राव-
स्कन्दनं गजोपमर्दितं वराहघृष्टकं तुरगाधिरूढकमिति यत्र यत्र विशेषो योगोऽपूर्व-
स्तत्तदुपलक्षयेत्॥ ४१॥
अन्य पशुलीलाएँ—इसी प्रकार कुत्ता, हिरण, बकरा, गधा, बिलाव, व्याघ्र, हाथी, सूअर

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५७
और घोड़े का समागम समझना चाहिये, और इनके समागम में जो विशेषताएँ दिखें, उनका
अनुकरण करना चाहिये ॥ ४१ ॥
मिश्रीकृतसद्भावाभ्यां द्वाभ्यां सह सङ्घाटकं रतम् ॥ ४२ ॥
सङ्घाटकरत—परस्पर विश्वास एवं सद्भाव के सूत्र में बँधी दो स्त्रियों के साथ एक पुरुष
का समागम करना सङ्घाटकरत कहलाता है ॥ ४२ ॥
बह्वीभिश्च सह गोयूथिकम् ॥ ४३ ॥
गोयूथिक—परस्पर विश्वास एवं सद्भाव के सूत्र में बँधी अनेक स्त्रियों के साथ एक
पुरुष का समागम करना गोयूथिक नामक चित्ररत कहलाता है ॥ ४३ ॥
वारिक्रीडितकं छागलमैणेयमिति तत्कर्मानुकृतियोगात् ॥ ४४ ॥
वारिक्रीड़ितक, छागल और ऐणेय—जिस प्रकार हाथी अनेक हथिनियों के साथ
क्रीड़ा करता है, उसी प्रकार एक पुरुष जब अनेक स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करे, तो उसे
वारिक्रीड़ितक कहते हैं। बकरा, हिरण आदि की मैथुन-क्रीड़ाओं का अनुकरण करने से
गोयूथिक करण अनेक प्रकार से प्रयुक्त हो सकता है ॥ ४४ ॥
ग्रामनारीविषये स्त्रीराज्ये च बाह्लीके बहवो युवानोऽन्तःपुरसधर्माण
एकैकस्याः परिग्रहभूताः ॥ ४५ ॥
अनेक पुरुषों के साथ समागम वाले देश—ग्रामनारी (असम का पूर्वी भाग) स्त्रीराज्य
और बाह्लीक (बलख) देश में अन्तःपुरवासिनी स्त्रियाँ अपने भवनों में अनेक संरक्षित युवकों
को रखती हैं ॥ ४५ ॥
तेषामेकैकशो युगपच्च यथासात्म्यं यथायोगं च रञ्जयेयुः ॥ ४६ ॥
यदि एक स्त्री के साथ अनेक पुरुष समागम करना चाहें, तो एक एक कर, एक साथ,
जैसा वह स्त्री चाहे और जैसा अवसर हो, तदनुकूल ही उसे प्रसन्न करें ॥ ४६ ॥
एको धारयेदेनामन्यो निषेवेत। अन्यो जघनं मुखमन्यो मध्यमन्य इति वारं
वारेण व्यतिकरेण चानुतिष्ठेयुः ॥ ४७ ॥
अनेक पुरुषों का एक साथ समागम—एक युवक उस स्त्री को गोद में लेकर बैठे,
दूसरा युवक उसका मुख-चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत आदि करे, तीसरा शिश्नप्रवेश कराये, और
चौथा कुचमर्दन आदि करे—इस प्रकार बारी-बारी से सभी पुरुष अपना कार्य और स्थान बदलते
चले जायें ॥ ४७ ॥
एतया गोष्ठीपरिग्रहा वेश्या राजयोषापरिग्रहाश्च व्याख्यातः ॥ ४८ ॥
इससे ही गोष्ठी में परिगृहीत वेश्या और रानियों के परिग्रह (रखैल पुरुषों) को भी कह
दिया गया है, अर्थात् गोष्ठी में अनेक पुरुष वेश्या के साथ और राजरानियाँ अपने पुरुष-रखैलों
के साथ, इसी प्रकार समागम करें ॥ ४८ ॥
अधोरतं पायावपि दाक्षिणात्यानाम्। इति चित्ररतानि ॥ ४९ ॥
दाक्षिणात्यों में गुदामैथुन भी प्रचलित है। (यह अधम मैथुन है, फलतः त्याज्य ही है)
इस प्रकार चित्ररत पूर्ण हुए ॥ ४९ ॥

५८ वात्स्यायन-कामसूत्र
पुरुषोपसृप्तकानि पुरुषायिते वक्ष्यामः ॥ ५० ॥
समागम करने की रीति पुरुषायित (विपरीत रति) प्रकरण में कहेंगे ॥ ५० ॥
पशूनां मृगजातीनां पतङ्गानां च विभ्रमैः ।
तैस्तैरुपायैश्चित्तज्ञो रतियोगान्विवर्धयेत् ॥ ५१ ॥
चित्रवर्धन—चित्त को जानने वाला पुरुष पशुओं, मृगों और पक्षियों के कण्ठस्वर और
शारीरिक चेष्टाओं के जो जो प्रत्यक्ष उपाय दीखें, उनका प्रयोग समागम में करके उसके आकर्षण
और प्रेम को बढ़ाये ॥ ५१ ॥
तत्सात्म्याद्देशसात्म्याच्च तैस्तैर्भावैः प्रयोजितैः ।
स्त्रीणां स्नेहश्च रागश्च बहुमानश्च जायते ॥ ५२ ॥
चित्रों के वर्धन का फल—जो उपक्रियाएँ स्त्री की प्रकृति के अनुकूल हों, जो उस देश
में प्रचलित हों, उन्हीं के अनुरूप पशु-पक्षियों के कण्ठस्वर और शारीरिक चेष्टाओं का अनुकरण
करने वाले पुरुष पर स्त्रियाँ अत्यधिक अनुराग और स्नेह रखती हैं और उन्हें ही बहुमान
देती हैं ॥ ५२ ॥
संवेशनप्रकार एवं चित्ररतप्रकरण नामक षष्ठ अध्याय सम्पन्न ॥
●
सप्तम अध्याय
प्रहणन-सीत्कारप्रकरण
कलहरूपं सुरतमाचक्षते; विवादात्मकत्वाद्वामशीलत्वाच्च कामस्य ॥ १ ॥
काम की वामता—सुरत कलहरूप है, क्योंकि काम स्वभाव से ही विवादात्मक और
परतिकूल प्रकृति वाला है ॥ १ ॥
तस्मात् प्रहणनस्थानमङ्गम्। स्कन्धौ शिरः स्तनान्तरं पृष्ठं जघनं पार्श्व इति
स्थानानि ॥ २ ॥
प्रहणन के स्थान—अतएव प्रहणन सुरत का अङ्ग है, फलतः उसके स्थानों का उल्लेख
करते हैं। कन्धे, सिर, स्तनों के मध्य का स्थान, पीठ, जाँघें और पार्श्व—ये प्रहणन के स्थान हैं,
अर्थात् पुरुष को समागमकाल में स्त्री के इन स्थानों पर प्रहार करना चाहिये ॥ २ ॥
तच्चतुर्विधम्-अपहस्तकं प्रसृतकं मुष्टिः समतलकमिति ॥ ३ ॥
प्रहणन चार प्रकार का होता है—१. अपहस्तक (फैली हुई अङ्गुलियों वाली हथेली की
पीठ), २. प्रसृतक (हाथ की अँगलियों को सिकोड़कर, सर्प के फन के समान आकार),
३. मुष्टि (मुक्का या घूँसा) और ४. समतलक (हाथ को बराबर करके हथेली से प्रहार) ॥ ३ ॥
तदुद्भवं च सीत्कृतम्। तस्यार्त्तिरूपत्वात्। तदनेकविधम् ॥ ४ ॥
सीत्कार की सम्बद्धता—प्रहणन से ही सीत्कार उत्पन्न होता है, फलतः उसका कष्टरूप
होना स्वाभाविक ही है। यह सीत्कार कई प्रकार का होता है ॥ ४ ॥

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५९
विरुतानि चाष्टौ ॥ ५ ॥
विरुत के आठ रूप—प्रहारजन्य पीड़ाके कारण मुख से आठ प्रकार की ध्वनि
(चिल्लाहट) निकलती है ॥ ५ ॥
हिङ्कारस्तनितकूजितरुदितसूत्कृतदूत्कृतफूत्कृतानि ॥ ६ ॥
हिंकार, स्तनित, कूजित, रुदित, नदित, सूत्कृत, दूत्कृत और फूत्कृत—ये सात प्रकार के
अव्यक्त अक्षर हैं ॥ ६ ॥
अम्बार्थाः शब्दा वारणार्था मोक्षणार्थाश्चालमर्थास्ते ते चार्थयोगात् ॥ ७ ॥
अन्य शब्द—'अरी मैया', 'ऐसा मत करो', 'अब रहने दो', 'बहुत हो गया', 'हाय, मर
गयी' इत्यादि शब्द भी पीड़ा द्योतित करते हैं ॥ ७ ॥
पारावतपरभृतहारीतशुकमधुकरदात्यूहहंसकारण्डवलावकविरुतानि
सीत्कृत-भूयिष्ठानि विकल्पशः प्रयुञ्जीत ॥ ८ ॥
पक्षियों की ध्वनि—कबूतर, कोयल, हारीत (हरियल), तोता, भ्रमर, चातक, हंस,
कारण्डव (जलकुक्कुट) और लवा (बटेर) आदि पक्षियों के शब्द रूप अनेक सीत्कारों का
विकल्प से प्रयोग करे ॥ ८ ॥
उत्सङ्गोपविष्टायाः पृष्ठे मुष्टिना प्रहारः ॥ ९ ॥
मुष्टिप्रहार—गोद में बैठी हुई स्त्री की पीठ में मुक्का मारना चाहिये ॥ ९ ॥
तत्र सासूयाया इव स्तनितरुदितकूजितानि प्रतीघातश्च स्यात् ॥ १० ॥
नायिका के कार्य—मुक्का लगते ही नायिका असहनशील के समान स्तनित, कूजित
और रुदित करती हुई बदले में नायक पर प्रतिघात करे ॥ १० ॥
युक्तयन्त्रायाः स्तनान्तरेऽपहस्तकेन प्रहरेत् ॥ ११ ॥
अपहस्तक प्रहार—चित लेटकर समागम कराती हुई स्त्री के स्तनों के मध्य में हथेली के
पिछले भाग से प्रहार करना चाहिये ॥ ११ ॥
मन्दोपक्रमं वर्धमानरागमा परिसमाप्तेः ॥ १२ ॥
प्रारम्भ में हल्के हाथ से प्रहार करे और राग के बढ़ने के साथ प्रहारों में भी तेजी लानी
चाहिये ॥ १२ ॥
तत्र हिङ्कारादीनामनियमेनाभ्यासेन विकल्पेन च तत्कालमेव प्रयोगः ॥ १३ ॥
सीत्कारों का उचित समय—हिंकार आदि सीत्कारों का अनियम से, अभ्यास से और
विकल्प से तत्काल ही प्रयोग करना चाहिये ॥ १३ ॥
शिरसि किञ्चिदाकुञ्चिताङ्गुलिना करेण विवदन्त्याः फूत्कृत्य प्रहणनं
तत्प्रसृतकम् ॥ १४ ॥
प्रसृतक-प्रहार—विवाद करती हुई स्त्री के सिर में हाथ की अङ्गुलियों को सिकोड़-
कर (हाथ को सर्प के फन के समान फैलाकर) फूत्कार करके प्रहार करना प्रसृतक
कहलाता है ॥ १४ ॥
काम० ६ तत्रान्तर्मुखेन कूजितं फूत्कृतं च ॥ १५ ॥

६० वात्स्यायन-कामसूत्र
नायिका के कार्य—प्रसृतक का प्रयोग करने पर स्त्री को अन्तर्मुख से कूजित और
फूत्कार करना चाहिये ॥ १५ ॥
रतान्ते च श्वसितरुदिते ॥ १६ ॥
श्वसित और रुदित का समय—समागम के अन्त में श्वास बढ़ जाने को श्वसित और
रोने को रुदित (रोदन) कहते हैं ॥ १६ ॥
वेणोरिव स्फुटतः शब्दानुकरणं दूत्कृतम् ॥ १७ ॥
दूत्कृत—समागम करते समय बाँस की गाँठ फूटने जैसी चट-चट की ध्वनि होती है,
उसे दूत्कृत कहते हैं ॥ १७ ॥
अप्सु बदरस्येव निपततः ( शब्दानुकरणं ) फूत्कृतम् ॥ १८ ॥
फूत्कृत ( फूत्कार )—बेर के पानी में गिरते समय जो डुब्ब जैसी ध्वनि होती है,
समागम काल में होने वाली ऐसी ध्वनि को 'फूत्कृत' या 'फूत्कार' कहते हैं ॥ १८ ॥
सर्वत्र चुम्बनादिष्वपक्रान्तायाः ससीत्कृतं तेनैव प्रत्युत्तरम् ॥ १९ ॥
इनके उत्तर—जिस प्रकार चुम्बन, नखक्षत और दन्तक्षत के उत्तर में स्त्री को भी उन्हीं
का प्रयोग करना चाहिये, उसी प्रकार पुरुष के प्रहणन पर स्त्री ने जैसे सीत्कार किये हों, स्त्री के
प्रहार करने पर पुरुष को भी वैसे ही सीत्कार करने चाहिये ॥ १९ ॥
रागवशात् प्रहणनाभ्यासे वारणमोक्षणालमर्थानां शब्दानाम्म्बार्थानां च
रतान्तश्वसितरुदितस्तनितमिश्रीकृतप्रयोगा विरुतानां च। रागावसानकाले जघन-
पार्श्वयोस्ताडनमित्यतित्वरया चापरिसमाप्तेः ॥ २० ॥
समतलक और परवर्ती कार्य—जब राग की अधिकता के कारण पुरुष बार-बार प्रहार
करे, तो स्त्री 'ऐसा मत करो', 'अब रहने दो', 'बहुत हो गया', 'अरी मैया' आदि शब्दों का
प्रयोग खिन्नता, श्वसित, रुदित और स्तनित के साथ करे, और विभिन्न पक्षियों की ध्वनि का
मिश्रित प्रयोग करे। स्खलनकाल निकट जानकर शीघ्रता से जघन और पार्श्वों में समतलक (हाथ
से वार) करना चाहिये—यह स्खलन से पूर्व ही होता है ॥ २० ॥
तत्र लावकहंसविकूजितं त्वरयैव। इति स्तननप्रहणनयोगाः ॥ २१ ॥
इसके सीत्कार—समतलक-प्रहार करने पर हंस और लवा (बटेर) आदि पक्षियों की
बोली का अनुकरण करना चाहिये। इस प्रकार स्तनन—प्रहणन सम्बन्धी प्रकरण पूर्ण
हुआ ॥ २१ ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
पारुष्यं रभसत्वं च पौरुषं तेज उच्यते।
अशक्तिरार्तिर्व्यावृत्तिर्बलत्वं च योषितः ॥ २२ ॥
इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक मिलते हैं—कठोरता, धृष्टता और साहस पुरुष के
सहज धर्म हैं और असमर्थता, पीड़ित होना, निराकरण करना और सुकुमारता स्त्री के; फलतः
पुरुष का स्वभाव प्रहणन के अनुकूल है और स्त्री का सीत्कार के ॥ २२ ॥
रागात् प्रयोगसात्म्याच्च व्यत्ययोऽपि क्वचिद् भवेत्।

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६१
न चिरं तस्य चैवान्ते प्रकृतेरेव योजनम् ॥ २३ ॥
स्त्री-पुरुष के ये धर्म सार्वत्रिक नहीं हैं। राग के चरम सीमा पर पहुँचने पर या देश, काल
और प्रकृति की अनुकूलता से उसकी विपरीतता भी देखी जाती है, अर्थात् इन स्थितियों में स्त्री
अपने सहज धर्म—सुकुमारता और सलज्जता—को छोड़कर और पुरुष-जैसा कठोर बनकर,
अपहस्तक आदि का वार कर सकती है, लेकिन यह विपरीतता अधिक समय तक नहीं चलती,
और अन्त में दोनों प्रकृतिस्थ हो जाते हैं ॥ २३ ॥
कीलामुरसि कर्तरीं शिरसि विद्धां कपोलयोः संदंशिकां स्तनयोः पार्श्वयोश्चेति
पूर्वैः सह प्रहणनमष्टविधमिति दाक्षिणात्यानाम्। तद्युवतीनामुरसि कीलानि च
तत्कृतानि दृश्यन्ते। देशसात्म्यमेतत् ॥ २४ ॥
दाक्षिणात्यों के कष्टद प्रहण—छाती में कीला, सिर में कर्तरी, कपोलों में विद्धा और
स्तनों एवं बगलों में संदंशिका—ये चार तथा पूर्वोक्त चार—अपहस्तक, प्रसृतक, मुष्टि और
समतलक—कुल आठ प्रकार के प्रहण दक्षिण देशवासियों में प्रचलित हैं। वहाँ की युवतियों
के वक्षःस्थल पर कीला और उसके कार्य देखे जाते हैं। यह देशाचारमात्र है, अतएव जहाँ
प्रचलित है, वहाँ के निवासियों के ही अनुकूल पड़ता है, सबके लिये नहीं ॥ २४ ॥
कष्टमनार्यवृत्तमनादृतमिति वात्स्यायनः ॥ २५ ॥
ये कष्टप्रद प्रहण आर्यवृत्त नहीं हैं, अतएव इसका आचरण नहीं करना चाहिये—ऐसा
महर्षि वात्सायन का मत है ॥ २५ ॥
तथान्यदपि देशसात्म्यात् प्रयुक्तमन्यत्र न प्रयुञ्जीत ॥ २६ ॥
घातक प्रहणों का सर्वथा निषेध—ऐसे प्रहण जिनमें विकलांगता या मृत्यु की
आशङ्का हो, देशाचारवश भी नहीं किये जाने चाहिये ॥ २७ ॥
रतियोगे हि कीलया गणिकां चित्रसेनां चोलराजो जघान ॥ २८ ॥
घातक प्रहारों के दुष्परिणाम—चोलराज ने समागमकाल में कीला से सुकुमार
नायिका चित्रसेना को मार डाला था ॥ २८ ॥
कर्तर्या कुन्तलः शातकर्णिः शातवाहनो महादेवीं मलयवतीम् ॥ २९ ॥
कुन्तलनरेश शतकर्ण के पुत्र शातवाहन (सातवाहन या शालिवाहन) ने कर्तरी के घातक
प्रयोग से महादेवी मलयवती को मार डाला था ॥ २९ ॥
नरदेवः कुपाणिर्विद्धया दुष्प्रयुक्तया नटीं काणां चकार ॥ ३० ॥
पाण्ड्य देश के सेनापति नरदेव ने अपने कठोर हाथ से विद्धा का प्रयोग कर चित्रलेखा
नामक नर्तकी को काणी बना दिया था ॥ ३० ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
नास्त्यत्र गणना काचिन्न च शास्त्रपरिग्रहः ।
प्रवृत्ते रतिसंयोगे राग एवात्र कारणम् ॥ ३१ ॥
घातक प्रहारों का कारण : कामातिरेक—जब पुरुष कामान्ध होकर समागम में प्रवृत्त
होता है, तब वह न तो परवर्ती दुष्परिणामों की चिन्ता करता है और न शास्त्र के बन्धनों का

६२ वात्स्यायन-कामसूत्र
विचार करता है। अतएव दुष्परिणामों का एकमात्र कारण उसका राग (कामातिरेक) ही
है॥ ३१॥
स्वप्नेष्वपि न दृश्यन्ते ते भावास्ते च विभ्रमाः।
सुरतव्यवहारेषु ये स्युस्तत्क्षणकल्पिताः ॥ ३२ ॥
समागमकाल में मनुष्य के मन और मस्तिष्क में जो जो भाव और विभ्रम उत्पन्न होते हैं,
वे न तो स्वप्न में सोचे जा सकते हैं और न शास्त्र में ही कहे गये होते हैं॥ ३२॥
यथा हि पञ्चमीं धारामास्थाय तुरगः पथि।
स्थाणुं श्वभ्रं दरीं वापि वेगान्धो न समीक्षते ॥
एवं सुरतसम्मर्दे रागान्धौ कामिनावपि।
चण्डवेगौ प्रवर्तेते समीक्षेते न चात्ययम् ॥ ३३ ॥
कामान्धता पर एक दृष्टान्त—जिस प्रकार पाँचवी धारागति (जव) में दौड़ता हुआ
वेगान्ध अश्व मार्ग के स्तम्भ, गर्त (गड्ढे), खन्दक आदि को नहीं देख पाता, और विनाश को प्राप्त
होता है; इसी प्रकार कामान्ध स्त्री-पुरुष चण्डवेग से सम्भोग करते हुए सुरतसम्मर्दों (नखक्षत,
दन्तक्षत, कुचमर्दन, प्रहणन आदि) के दुष्परिणामों को नहीं सोच पाते, और विनाश (अङ्गभङ्ग
या मृत्यु) को प्राप्त होते हैं॥ ३३॥
तस्मान्मृदुत्वं चण्डत्वं युवत्या बलमेव च।
आत्मनश्च बलं ज्ञात्वा तथा युञ्जीत शास्त्रवित् ॥ ३४ ॥
अतएव कामतत्त्वविद् को स्त्री की सुकुमारता एवं सहनशक्ति और काम की प्रचण्डता को
विचार कर तथा अपनी शारीरिक शक्ति का अनुमान करके ही समागम में प्रवृत्त होना
चाहिये ॥ ३४ ॥
न सर्वदा न सर्वासु प्रयोगाः सांप्रयोगिकाः ।
स्थाने देशे च काले च योग एषां विधीयते ॥ ३५ ॥
समागमकाल में जो प्रयोग अब तक बताये गये हैं, उनका प्रयोग न सदा होता है और न
सभी स्त्रियों पर; अपितु स्थान एवं देशकाल के अनुरूप ही इनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ३५॥
प्रहणनप्रयोग एवं सीत्कार वर्णन नामक सप्तम अध्याय सम्पन्न ॥
●
अष्टम अध्याय
पुरुषायितप्रकरण
नायकस्य सन्तताभ्यासात् परिश्रममुपलभ्य रागस्य चानुपशमम्, अनुमता तेन
तमधोऽवपात्य पुरुषायितेन साहाय्यं दद्यात् ॥ १ ॥
विपरीत रति के कारण—निरन्तर मैथुन करते हुए जब पुरुष शिथिल हो जाये, किन्तु

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६३
रमणेच्छा शान्त न हो, तो पुरुष की अनुमति से स्त्री उसके ऊपर आकर, विपरीत रति द्वारा, उसे
मैथुन में सहायता प्रदान करे॥ १॥
स्वाभिप्रायाद्वा विकल्पयोजनार्थिनी ॥ २ ॥
अथवा अपनी रमणेच्छा को सरलता और शीघ्रता से शान्त करने के लिये भी स्त्री विपरीत
रति कर सकती है ॥ २ ॥
नायककुतूहलाद्वा ॥ ३ ॥
प्रिय के विनोद एवं कुतूहल के लिये भी स्त्री विपरीत रति कर सकती है ॥ ३ ॥
तत्र युक्तयन्त्रेणैवेतरेणोत्थाप्यमाना तमधः पातयेत्। एवं च रतमविच्छिन्नरसं
तथा प्रवृत्तमेव स्यात्। इत्येकोऽयं मार्गः ॥ ४ ॥
विपरीत रति : प्रथम रीति—समागम करते हुए पुरुष यन्त्र किये हुए ही स्त्री को
बाहुपाश में भरकर ऊपर ले आये और स्त्री भी उसे नीचे करके स्वयं समागम करने लगे। ऐसा
करने से समागम के सुख में कोई अन्तर नहीं आता, अर्थात् उसका नैरन्तर्य बना रहता है—यह
विपरीत रति की प्रथम रीति है ॥ ४ ॥
पुनरारम्भेणादित एवोपक्रमेत्। इति द्वितीयः ॥ ५ ॥
द्वितीय रीति—यदि समागम को पुनः आरम्भ किया जाये, तो स्त्री प्रारम्भ से ही विपरीत
रति करे। यह विपरीत रति की दूसरी रीति है ॥ ५ ॥
सा प्रकीर्यमाणकेशकुसुमा श्वासविच्छिन्नहासिनी वक्त्रसंसर्गार्थं स्तनाभ्यामुरः
पीडयन्ती पुनः-पुनः शिरो नामयन्ती याश्चेष्टाः पूर्वमसौ दर्शितवांस्ता एव
प्रतिकुर्वीत। पातिता प्रतिपातयामीति हसन्ती तर्जयन्ती प्रतिघ्नती ब्रूयात्। पुनश्च
व्रीडां दर्शयेत्। श्रमं विरामाभीप्सां च। पुरुषोपसृमैरेवोपसर्पेत्॥ ६ ॥
बाह्य विपरीतरति—जब स्त्री विपरीत रति करती है, तो उसके केशपाश के बिखर जाने
से उनमें गूँथे हुए फूल बिखर जाते हैं, हँसने पर भी उसकी साँस फूलती है और उसकी हँसी
बाधित हो जाती है, पति के मुख का चुम्बन करने के लिए अपना मुख झुकाती हुई स्तनों से
उसके वक्षःस्थल को बार बार दबाती है, जो जो चेष्टाएँ (चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत आदि) पुरुष
ने समागम के समय की थीं, उन सभी को वह करती है; इतना ही नहीं, हँसती है और पुरुष को
डराती है तथा विजेता की भाँति बोलती है—'पहले तुमने मुझे गिराकर समागम किया था। अब
मैं तुम्हें गिराकर समागम करूँगी।' रमणेच्छा शान्त हो जाने पर लज्जा, थकान दिखाये। तदुपरान्त
पुरुष के समान ही उपसर्पण करे, अर्थात् पुरुष जिस प्रकार स्त्री पर प्रेम प्रकट करता है, उसी
प्रकार स्त्री भी पुरुष पर प्रेम प्रकट करे ॥ ६ ॥
तानि च वक्ष्यामः ॥ ७ ॥
अब पुरुषों के उन उपसर्पणों को कहते हैं जिन्हें स्त्री पुरुषायित (विपरीत रति) में प्रयोग
करती है ॥ ७ ॥
पुरुषः शयनस्थाया योषितस्तद्वचनव्याक्षिप्तचित्ताया इव नीर्वी विश्लेषयेत्।
तत्र विवदमानां कपोलचुम्बनेन पर्याकुलयेत् ॥ ८ ॥

वात्स्यायन-कामसूत्र
पुरुषोपसृप्त के भेद—शय्या पर बैठी हुई स्त्री को बातों में लगाकर पुरुष उसका नाड़ा
खोल दे। यदि स्त्री ना करे, तो उसके कपोलों का चुम्बन करता हुआ, उसे समागम के लिये
व्याकुल बना दे जिससे वह ना ही न कर सके ॥ ८ ॥
स्थिरलिङ्गश्च तत्र तत्रैनां परिस्पृशेत् ॥ ९ ॥
यदि पुरुष का शिश्न दृढ़ एवं स्थिर हो जाये, तो स्त्री को कामोद्रिक्त करने के लिये उसके
कामाङ्गों (स्तन, काँख आदि) को धीरे धीरे सहलाये ॥ ९ ॥
प्रथमसङ्गता चेत्संहतोर्वोरन्तरे घट्टनम् ॥ १० ॥
यदि स्त्री का प्रथम समागम हो, और उसने दोनों जाँघें दृढ़तापूर्वक मिला रखी हों, तो
पुरुष को उसकी जाँघों को सहलाते हुए अलग अलग करना चाहिये ॥ १० ॥
कन्यायाश्च ॥ ११ ॥
यदि अक्षतयोनि से समागम करना हो, तो भी इसी प्रकार व्यवहार करना
चाहिये ॥ ११ ॥
तथा स्तनयोः संहतयोर्हस्तयोः कक्षयोरंसयोर्ग्रीवायामिति च ॥ १२ ॥
इसी प्रकार हाथों से ढँके हुए स्त्री के स्तनों, काँखों, कन्धों और ग्रीवा में भी हाथ चलाना
चाहिये ॥ १२ ॥
स्वैरिण्यां यथासात्म्यं यथायोगं च। अलके चुम्बनार्थमेनां निर्दयमवलम्बेत
हनुदेशे चाङ्गुलिसम्पुटेन ॥ १३ ॥
स्वैरिणी (व्यभिचारिणी) स्त्रियों में तो जैसा उसके अनुकूल पड़े और जैसा सम्भव हो,
वैसा ही आचरण करे। मुखचुम्बन के लिये उसके केशपाश को निर्दयतापूर्वक पकड़े और
उसकी ठोड़ी को अङ्गुलियों के मध्य ले ले ॥ १३ ॥
तत्रेतरस्या व्रीडा निमीलनं च। प्रथमसमागमे कन्यायाश्च ॥ १४॥
जो भी स्त्री पुरुष से प्रथम बार मिलती है, वह लज्जावश आँखें बन्द कर लेती है। प्रथम
समागम में अक्षतयोनि कन्या की भी यही स्थिति होती है ॥ १४॥
रतिसंयोगे चैनां कथमनुरञ्जयत इति प्रवृत्त्या परीक्षेत ॥ १५ ॥
आभ्यन्तर पुरुषोपसृप्त कहते हैं—समागम में स्त्री को कैसे अनुरक्त किया जा सकता
है, यह अनुमान बाह्य पुरुषोपसृप्त में उसकी चेष्टाएँ देखकर ही कर लेना चाहिये ॥ १५ ॥
युक्तयन्त्रेणोपसृप्यमाणा यतो दृष्टिमावर्तयेत्तत एवैनां पीडयेत्। एतद्रहस्यं
युवतीनामिति सुवर्णनाभः ॥ १६ ॥
चेष्टा से पहचान—यन्त्रयोग होने पर मदनमन्दिर के जिस जिस ओर शिश्नसंचालन से
स्त्री आनन्दविह्वल होकर दृष्टि घुमाने लगे, उसी-उसी ओर लक्ष्य करके पुरुष को प्रहार करना
चाहिये। नारीजीवन का यह गहन रहस्य है—ऐसा आचार्य सुवर्णनाभ का मत है ॥ १६ ॥
गात्राणां स्रंसनं नेत्रनिमीलनं व्रीडानाशः समधिका च रतियोजनेति स्त्रीणां
भावलक्षणम् ॥ १७ ॥

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६५
राग की विभिन्न अवस्थाएँ— जिसके साथ शिश्नसञ्चालन हो रहा है, उसके भाव की
तीन अवस्थाएँ होती हैं—प्राप्त, प्रत्यासन्न और प्रज्वलित। इन तीनों का लक्षण कहते हैं—शरीर
का शिथिल होना, नेत्रों का बन्द कर लेना, लज्जा का नाश और मदनमन्दिर को शिश्न से सटाये
रखना—ये स्त्रियों के भाव-प्राप्ति के लक्षण हैं ॥ १७॥
हस्तौ विधुनोति स्विद्यति दशन्युत्थातुं न ददाति पादेनाहन्ति रतावसाने च
पुरुषातिवर्तिनी ॥ १८ ॥
प्रज्वलित हुए (भभकते हुए) भाव का लक्षण—समागम के अन्त में स्त्री हाथों को
कँपाती हैं, पसीने से भींग जाती हैं, पुरुष को दाँतों से काटती है, पुरुष को समागम से विरत नहीं
होने देती, अर्थात् उठने नहीं देती, उसे लातें लगाती और पुरुष का भी अतिक्रमण कर जाती है
अर्थात् ये लक्षण इस बात के सूचक हैं कि स्त्री का काम अभी शान्त नहीं हुआ है, और वह
प्रज्वलित (भभक रहा) है ॥ १८ ॥
तस्याः प्राग्यन्त्रयोगात् करेण संबाधं गज इव क्षोभयेत्। आ मृदुभावात्। ततो
यन्त्रयोजनम् ॥ १९॥
करिकर का प्रयोग—स्त्री को शीघ्र स्खलित करने के लिए, समागम से पूर्व उसके
मदनमन्दिर को हाथ से हाथी के सूँड़ के समान क्षोभित करे और जब वह रससिक्त हो जाये तभी
शिश्नप्रवेश कराये ॥ १९॥
उपसृप्तकं मन्थनं हुलोऽवमर्दनं पीडितकं निर्घातो वराहघातो वृषाघातश्चटक-
विलसितं सम्पुट इति पुरुषोपसृप्तानि ॥ २० ॥
उपसृप्तों के प्रकार—उपसृप्तक, मन्थन, हुल, अवमर्दन, पीड़ितक, निर्घात, वराहघात,
वृषाघात, चटकविलसित और सम्पुट—ये दश पुरुषोपसृप्त हैं ॥ २० ॥
न्याय्यमृजुसम्मिश्रणमुपसृप्तकम् ॥ २१ ॥
उपसृप्तक—शिश्न को सीधी रीति से मदनमन्दिर से मिलाना उपसृप्तक है। सुकुमार और
अहानिकर होने से यही रीति शिष्टजनसम्मत (न्याय्य) है ॥ २१ ॥
हस्तेन लिङ्गं सर्वतो भ्रामयेदिति मन्थनम् ॥ २२ ॥
मन्थन—पुरुष शिश्न को हाथ से पकड़कर मदनमन्दिर में चारों ओर घुमावे, तो इसे
मन्थन कहते हैं ॥ २२ ॥
नीचीकृत्य जघनमुपरिष्टाद् घट्टयेदिति हुलः ॥ २३ ॥
हुल—स्त्री की जाँघों को नीचा करके मदनमन्दिर के अन्दर शिश्न को झटके से डालना
'हुल' कहलाता है ॥ २३ ॥
तदेव विपरीतं सरभसमवमर्दनम् ॥ २४ ॥
अवमर्दन—स्त्री की जाँघों को ऊँचा करके (नितम्बों के नीचे तकिया लगाकर)
मदनमन्दिर के अन्दर वेगपूर्वक शिश्न-प्रवेश को अवमर्दन कहते हैं ॥ २४ ॥
लिङ्गेन समाहत्य पीडयाँश्चिरमवतिष्ठेतेति पीडितकम् ॥ २५ ॥

६६ वात्स्यायन-कामसूत्र
पीडितक—शिश्न से भली प्रकार प्रहार करता हुआ देर तक स्त्री को दबाये रहे, तो इसे
पीड़ितक कहते हैं ॥ २५ ॥
सुदूरमुत्कृष्य वेगेन स्वजघनमवपातयेदिति निर्घातः ॥ २६ ॥
निर्घात—प्रविष्ट कराये हुए शिश्न को पूरा बाहर निकालकर स्त्री की जाँघों पर अपनी
जाँघों को बलपूर्वक गिराना निर्घात कहलाता है ॥ २६ ॥
एकत एव भूयिष्ठमवलिखेदिति वराहघातः ॥ २७ ॥
वराहघात—मदनमन्दिर में एक ओर ही शिश्नप्रहार करने को 'वराहघात'
कहते हैं ॥ २७ ॥
स एवोभयतः पर्यायेण वृषाघातः ॥ २८ ॥
वृषाघात—जब मदनमन्दिर के दोनों पार्श्वों में क्रम से प्रहार किया जाये, तो उसे वृषाघात
कहते हैं ॥ २८ ॥
सकृन्मिश्रितमनिष्क्रमय्य द्वित्रिश्चतुरिति घट्टयेदिति चटकविलसितम् ॥ २९ ॥
चटकविलसित—प्रविष्ट शिश्न को बाहर न निकालकर, नरगौरैया (चिड़े) के समान
दो तीन-चार बार प्रहार करने को चटकविलसित कहते हैं ॥ २९ ॥
रागावसानिकं व्याख्यातं करणं सम्पुटमिति ॥ ३० ॥
सम्पुट—स्खलन के समय सम्पुट होता है। इस करण को पहले ही कहा जा
चुका है ॥ ३० ॥
तेषां स्त्रीसात्म्याद् विकल्पेन प्रयोगः ॥ ३१ ॥
प्रयोग की रीति—इन पुरुषोपसृतों का स्त्री की प्रकृति और प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर,
विकल्प से, प्रयोग करना चाहिये ॥ ३१ ॥
पुरुषायिते तु सन्दंशो भ्रमरकः प्रेङ्खोलितमित्यधिकानि ॥ ३२ ॥
पुरुषायित (विपरीत रति) में संदंश, भ्रमरक और प्रेङ्खोलित— ये तीन उपसृत
अधिक हैं ॥ ३२ ॥
वाडवेन लिङ्गमवगृह्य निष्कर्षन्त्याः पीडयन्त्या वा चिरावस्थानं
सन्दंशः ॥ ३३ ॥
सन्दंश—स्त्री, पुरुष के शिश्न को मदनमन्दिर में डालकर घोड़ी के समान देर तक भीतर
खींचती या दबाती रहे तो उसे संदंश कहते हैं ॥ ३३ ॥
युक्तयन्त्रा चक्रवद् भ्रमेदिति भ्रमरक आभ्यासिकः ॥ ३४ ॥
भ्रमरक—यन्त्रयोग किये हुए स्त्री चाक की तरह घूमे, यह भ्रमरक कहलाता है। यह
अभ्यास से ही हो सकता है ॥ ३४ ॥
तत्रेतरः स्वजघनमुत्क्षिपेत् ॥ ३५ ॥
नायक का कार्य—भ्रमरक उपसृत में नायक को अपनी जाँघें ऊपर उठा लेनी
चाहिये ॥ ३५ ॥
जघनमेव दोलायमानं सर्वतो भ्रामयेदिति प्रेङ्खोलिखितकम् ॥ ३६ ॥

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६७
प्रेङ्खोलिखितक—झूले के समान हिलती हुई जांघों को चारों ओर घुमाना
'प्रेङ्खोलिखितक' कहलाता है।
युक्तयन्त्रैव ललाटे ललाटं निधाय विश्राम्येत ॥ ३७ ॥
विश्रामविधि—थक जाने पर स्त्री यन्त्रयोग किये हुए ही पुरुष के मस्तक पर अपना
मस्तक रखकर विश्राम कर ले ॥ ३७ ॥
विश्रान्तायां च पुरुषस्य पुनरावर्तनम् । इति पुरुषायितानि ॥ ३८ ॥
पुरुष के ऊपर आने का समय—यदि स्त्री की तृप्ति न हुई हो, तो थक जाने पर स्त्री
नीचे आ जाये और पुरुष ऊपर आकर समागम करे। विपरीत रति का प्रकरण पूर्ण
हुआ ॥ ३८ ॥
भवन्ति चात्र श्लोका:—
प्रच्छादितस्वभावापि गूढाकारापि कामिनी।
विवृणोत्येव भावं स्वं रागादुपरिवर्तिनी ॥ ३९ ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक हैं—जो कामिनी शील और सङ्कोच के कारण अपने
भावों को छिपाये रखती है, वह भी कामातुरा होकर विपरीत रति में अपने वास्तविक स्वरूप को
प्रकट कर देती है ॥ ३९ ॥
यथाशीला भवेन्नारी यथा च रतिलालसा।
तस्या एव विचेष्टाभिस्तत्सर्वमुपलक्षयेत् ॥ ४० ॥
जिस स्त्री का जैसा शील और जैसी रतिलालसा—कामवासना—हो, विपरीत रति की
चेष्टाओं से पति को वह सब जान लेना चाहिये, जिससे बाद में तदनुकूल व्यवहार किया जा
सके ॥ ४० ॥
न त्वेवतौं न प्रसूतां न मृगीं न च गर्भिणीम्।
न चातिव्यायतां नारीं योजयेत् पुरुषायिते ॥ ४१ ॥
विपरीत रति के अनुपयुक्त पात्र—रजस्वला, प्रसूता, मृगी, गर्भवती और मोटी स्त्री को
विपरीत रति में नियुक्त नहीं करना चाहिये ॥ ४१ ॥
पुरुषायितप्रकरण नामक अष्टम अध्याय सम्पन्न ॥
नवम अध्याय
औपरिष्टकप्रकरण
द्विविधा तृतीया प्रकृतिः स्त्रीरूपिणी पुरुषरूपिणी च ॥ १ ॥
नपुंसक के भेद—नपुंसक दो प्रकार के होते हैं—एक स्त्रीरूपधारी, और दूसरा
पुरुषरूपधारी ॥ १ ॥