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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 248 में से

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पृष्ठ 75

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ४९
मणिमाला और बिन्दुमाला का स्थान—अतएव ये दोनों मालाएँ—मणिमाला और
बिन्दुमाला—गला, काँख और गुह्यस्थल पर ही होती हैं॥ १४॥
ललाटे चोर्वोर्बिन्दुमाला॥ १५॥
बिन्दुमाला का स्थान—बिन्दुमाला का प्रयोग मस्तक और जाँघों पर भी होता है॥ १५॥
मण्डलमिव विषमकूटकयुक्तं खण्डाभ्रकं स्तनपृष्ठ एव॥ १६॥
खण्डाभ्रक—मण्डल (वृत्त या घेरे) के समान दाँतों के छिन्न और असमान चिह्न,
बादल के टुकड़े के समान होने के खण्डाभ्रक कहलाते हैं। यह स्तनों पर किया जाता है॥ १६॥
संहताः प्रदीर्घा बह्वयो दशनपदराजयस्ताम्रान्तराला वराहचर्वितकम्। स्तनपृष्ठ
एव॥ १७॥
वराहचर्वितक—परस्पर सटी हुई, लम्बे लम्बे दन्तक्षत की पंक्तियाँ जिनका मध्य भाग
दाँतों से चबाने के कारण ताँबे-जैसा लाल हो गया हो, वराहचर्वितक कहलाता है। यह भी
स्तनपृष्ठ पर ही अंकित किया जाता है॥ १७॥
तदुभयमपि च चण्डवेगयोः। इति दशनच्छेद्यानि॥ १८॥
खण्डाभ्रक और वराहचर्वितक—इन दोनों का प्रयोग चण्डवेग वाले नायक और नायिका
ही करते हैं। दन्तक्षत के भेद समाप्त हुए॥ १८॥
विशेषके कर्णपूरे पुष्पापीडे ताम्बूलपलाशे तमालपत्रे चेति प्रयोज्यागामिषु
नखदशनच्छेद्यान्याभियोगिकानि॥ १९॥
सांक्रान्तिक आभियोगिक—मस्तक पर शोभार्थ धारण किये जाने वाले भोजपत्र आदि
से निर्मित तिलक पर, कानों में पहने जाने वाले नीलकमल पर, चोटी में बाँधे जाने वाले फूलों
के गजरों पर, पान के बीड़े पर, और तमाल-पत्र पर जो नायिका को प्रेमवश भेजे जा रहे हों,
नायक नखक्षत एवं दन्तक्षत अंकित करके अपना हृदयस्थ प्रेम व्यक्त करते हैं॥ १९॥
देशसात्म्याच्च योषित उपचरेत्॥ २०॥
देशोपचारप्रकरण—विभिन्न देशों में प्रचलित प्रवृत्तियों को ही देश्य कहते हैं, और ये
स्त्री के उपचार होने से देशोपचार कहलाते हैं। इन्हें इस प्रकरण में कहते हैं—स्त्रियों के देश
और प्रकृति के अनुरूप ही चुम्बन आदि का प्रयोग करना चाहिये॥ २०॥
मध्यदेश्या आर्यप्रायाः शुच्युपचाराश्चुम्बननखदन्तपदद्वेषिण्यः॥ २१॥
मध्यदेश में प्रायः आर्य जाति निवास करती है। इस जाति की स्त्रियाँ पवित्र प्रेम-व्यवहार
और अच्छे आचरण वाली होती हैं। वे चुम्बन, नखक्षत और दन्तक्षत की पसन्द नहीं
करती हैं॥ २१॥
बाह्लीकदेश्या आवन्तिकाश्च॥ २२॥
बाह्लीक देश और अवन्ति की स्त्रियाँ भी प्रायः ऐसी ही होती हैं॥ २२॥
चित्ररतेषु त्वासामभिनिवेशः॥ २३॥
बाह्लीक और अवन्ति देश की स्त्रियाँ चित्ररतों में विशेष आसक्ति रखती हैं॥ २३॥
(चित्ररतों को आगे—इसी अधिकरण के षष्ठ अध्याय में—कहेंगे।)