वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५५
अब आचार्य सुवर्णनाभ द्वारा कथित आसनों को बताते हैं ॥ २३ ॥
उभावप्यूरू ऊर्ध्वादिति तद् भुग्नकम् ॥ २४ ॥
भुग्नक—यदि स्त्री अपनी दोनों जाँघों को ऊपर उठा दे, तो इसे भुग्नक आसन
कहते हैं ॥ २४ ॥
चरणावूर्ध्वं नायकोऽस्या धारयेदिति जृम्भितकम् ॥ २५ ॥
जृम्भितक—जब नायक, नायिका के दोनों पैरों को कन्धे पर धारण कर लेता है तो उसे
जृम्भितक आसन कहते हैं ॥ २५ ॥
तत्कुञ्चितावुपीडितकम् ॥ २६ ॥
उत्पीडितक—यदि पुरुष स्त्री के पैरों को सिकोड़कर वक्ष पर धारण करे, तो इसे
उत्पीडितक आसन कहते हैं ॥ २६ ॥
तदेकस्मिन् प्रसारितेऽर्धपीडितकम् ॥ २७ ॥
अर्धपीडितक—यदि उत्पीडित आसन से समागम करते समय स्त्री एक पैर को सीधा
फैला दे, तो यह अर्धपीडितक करण कहलाता है ॥ २७ ॥
नायकस्यांस एको द्वितीयकः प्रसारित इति पुनः पुनर्व्यत्यासेन वेणुदा-
रितकम् ॥ २८ ॥
वेणुदारितक—जब स्त्री अदल-बदल कर अपना एक पैर पुरुष के कन्धे पर रखे, दूसरा
सीधा फैलाये तो यह वेणुदारितक करण कहलाता है ॥ २८ ॥
एकः शिरस उपरि गच्छेद् द्वितीयः प्रसारित इति शूलाचितकमाभ्यासि-
कम् ॥ २९ ॥
शूलाचितक—जब स्त्री एक पैर को पुरुष के सिर पर रखकर और दूसरे को फैलाकर
समागम करती है, तो यह शूलाचितक करण कहलाता है। यह करण भी अभ्यास से ही सिद्ध
होता है ॥ २९ ॥
संकुचितौ स्वस्तिदेशे निदध्यादिति कार्कटकम् ॥ ३० ॥
कार्कटक—जब पुरुष लेटी हुई स्त्री के पैरों को घुटनो से मोड़कर और अपने
नाभिस्थल पर लगाकर समागम करता है, तो इसे केकड़े के समान होने से कार्कटक आसन
कहते हैं ॥ ३० ॥
ऊर्ध्वावूरू व्यत्यस्येदिति पीडितकम् ॥ ३१ ॥
पीडितक—यदि समागमकाल में स्त्री अपनी दाहिनी जाँघ को बायीं ओर ले जाये और
बाँयीं जाँघ को दाहिनी ओर, तो इसे पीड़ितक आसन कहते हैं ॥ ३१ ॥
जङ्घाव्यत्यासेन पद्मासनवत् ॥ ३२ ॥
पद्मासन—चित लेटी हुई स्त्री जब अपने बाँयें पैर को दाहिनी जाँघ की जड़ में और
दाहिने पैर को बाँयीं जाँघ की जड़ में रख ले, तो इसे पद्मासन कहा जाता है ॥ ३२ ॥
पृष्ठं परिष्वजमानायाः पराङ्मुखेण परावृत्तकमाभ्यासिकम् ॥ ३३ ॥
परावृत्तक—मुख के बल लेटी स्त्री के साथ पुरुष पीठ की ओर से समागम कर, तो इसे