वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ वात्स्यायन-कामसूत्र
पुरुषोपसृप्तकानि पुरुषायिते वक्ष्यामः ॥ ५० ॥
समागम करने की रीति पुरुषायित (विपरीत रति) प्रकरण में कहेंगे ॥ ५० ॥
पशूनां मृगजातीनां पतङ्गानां च विभ्रमैः ।
तैस्तैरुपायैश्चित्तज्ञो रतियोगान्विवर्धयेत् ॥ ५१ ॥
चित्रवर्धन—चित्त को जानने वाला पुरुष पशुओं, मृगों और पक्षियों के कण्ठस्वर और
शारीरिक चेष्टाओं के जो जो प्रत्यक्ष उपाय दीखें, उनका प्रयोग समागम में करके उसके आकर्षण
और प्रेम को बढ़ाये ॥ ५१ ॥
तत्सात्म्याद्देशसात्म्याच्च तैस्तैर्भावैः प्रयोजितैः ।
स्त्रीणां स्नेहश्च रागश्च बहुमानश्च जायते ॥ ५२ ॥
चित्रों के वर्धन का फल—जो उपक्रियाएँ स्त्री की प्रकृति के अनुकूल हों, जो उस देश
में प्रचलित हों, उन्हीं के अनुरूप पशु-पक्षियों के कण्ठस्वर और शारीरिक चेष्टाओं का अनुकरण
करने वाले पुरुष पर स्त्रियाँ अत्यधिक अनुराग और स्नेह रखती हैं और उन्हें ही बहुमान
देती हैं ॥ ५२ ॥
संवेशनप्रकार एवं चित्ररतप्रकरण नामक षष्ठ अध्याय सम्पन्न ॥
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सप्तम अध्याय
प्रहणन-सीत्कारप्रकरण
कलहरूपं सुरतमाचक्षते; विवादात्मकत्वाद्वामशीलत्वाच्च कामस्य ॥ १ ॥
काम की वामता—सुरत कलहरूप है, क्योंकि काम स्वभाव से ही विवादात्मक और
परतिकूल प्रकृति वाला है ॥ १ ॥
तस्मात् प्रहणनस्थानमङ्गम्। स्कन्धौ शिरः स्तनान्तरं पृष्ठं जघनं पार्श्व इति
स्थानानि ॥ २ ॥
प्रहणन के स्थान—अतएव प्रहणन सुरत का अङ्ग है, फलतः उसके स्थानों का उल्लेख
करते हैं। कन्धे, सिर, स्तनों के मध्य का स्थान, पीठ, जाँघें और पार्श्व—ये प्रहणन के स्थान हैं,
अर्थात् पुरुष को समागमकाल में स्त्री के इन स्थानों पर प्रहार करना चाहिये ॥ २ ॥
तच्चतुर्विधम्-अपहस्तकं प्रसृतकं मुष्टिः समतलकमिति ॥ ३ ॥
प्रहणन चार प्रकार का होता है—१. अपहस्तक (फैली हुई अङ्गुलियों वाली हथेली की
पीठ), २. प्रसृतक (हाथ की अँगलियों को सिकोड़कर, सर्प के फन के समान आकार),
३. मुष्टि (मुक्का या घूँसा) और ४. समतलक (हाथ को बराबर करके हथेली से प्रहार) ॥ ३ ॥
तदुद्भवं च सीत्कृतम्। तस्यार्त्तिरूपत्वात्। तदनेकविधम् ॥ ४ ॥
सीत्कार की सम्बद्धता—प्रहणन से ही सीत्कार उत्पन्न होता है, फलतः उसका कष्टरूप
होना स्वाभाविक ही है। यह सीत्कार कई प्रकार का होता है ॥ ४ ॥