सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 82

५६ वात्स्यायन-कामसूत्र
परावृत्तक आसन कहते हैं। यह आभ्यासिक अर्थात् अभ्यास से सिद्ध होने वाला आसन
है॥ ३३॥
जले च संविष्टोपविष्टस्थितात्मकाँश्चात्रयोगानुपलक्षयेत्। तथा सुकरत्वादिति
सुवर्णनाभः॥ ३४॥
जलसंभोग— जल में भी खड़े होकर, बैठकर और लेटकर नानाविध आसनों से जैसे
समागम कर सके, करे। यह स्थल की अपेक्षा सरल भी है और मनोरंजक भी—ऐसा आचार्य
सुवर्णनाभ का मत है॥ ३४॥
वार्तं तु तत्। शिष्टैरपस्मृतत्वादिति वात्स्यायनः॥ ३५॥
जलसंभोग का निषेध—जल में समागम असार (अनुचित) है, क्योंकि शिष्ट व्यक्तियों
ने इसकी निन्दा की है—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है॥ ३५॥
अथ चित्ररतानि॥ ३६॥
चित्ररत-प्रकरण : अब चित्ररत समागम की अद्भुत विधियों को कहते हैं॥ ३६॥
ऊर्ध्वस्थितयोर्यूनोः परस्परापाश्रययोः कुड्यस्तम्भापाश्रितयोर्वा स्थित-
रतम्॥ ३७॥
पहले स्थितरत (खड़े होकर समागम) का विधान बताते हैं—जब स्त्री-पुरुष एक-दूसरे
के सहारे या दीवार अथवा स्तम्भ (खम्बा) के सहारे खड़े होकर समागम करते हैं, तो उसे
स्थितरत कहते हैं॥ ३७॥
कुड्यापाश्रितस्य कण्ठावसक्तबाहुपाशायास्तद्धस्तपञ्जरोपविष्टाया ऊरु-
पाशेन जघनमभिवेष्टयन्त्या कुड्ये चरणक्रमेण बलन्त्या अवलम्बितकं रतम्॥ ३८॥
अवलम्बितक—जब पुरुष दीवार के सहारे खड़ा हो, उसके कण्ठ में बाहुपाश डाले हुए
स्त्री उसके मिले हुए दोनों हाथों (हस्तपंजर) पर बैठी हुई हो, और अपनी जाँघों से पुरुष की
जाँघों को लपेटकर, दीवार पर पैर लगाकर, झूला झूलती हुई-सी समागम कर रही हो, तो वह
अवलम्बितक आसन कहलाता है॥ ३८॥
भूमौ वा चतुष्पदवदास्थिताया वृषलीलयावस्कन्दनं धेनुकम्॥ ३९॥
धेनुक—स्त्री हाथों और पैरों को भूमि पर टिकाकर पशु (गाय) के समान खड़ी हो जाये
और पुरुष साँड़ के समान उसके साथ समागम करे, तो यह धेनुक आसन होता है॥ ३९॥
तत्र पृष्ठमुरःकर्माणि लभते॥ ४०॥
धेनुक आसन में वक्ष पर सम्पन्न किये जाने वाले कार्य पीठ पर सम्पन्न किये जाते
हैं॥ ४०॥
एतेनैव योगेन शौनमैणेयं छागलं गर्दभाक्रान्तं मार्जारललितकं व्याघ्राव-
स्कन्दनं गजोपमर्दितं वराहघृष्टकं तुरगाधिरूढकमिति यत्र यत्र विशेषो योगोऽपूर्व-
स्तत्तदुपलक्षयेत्॥ ४१॥
अन्य पशुलीलाएँ—इसी प्रकार कुत्ता, हिरण, बकरा, गधा, बिलाव, व्याघ्र, हाथी, सूअर