वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६३
रमणेच्छा शान्त न हो, तो पुरुष की अनुमति से स्त्री उसके ऊपर आकर, विपरीत रति द्वारा, उसे
मैथुन में सहायता प्रदान करे॥ १॥
स्वाभिप्रायाद्वा विकल्पयोजनार्थिनी ॥ २ ॥
अथवा अपनी रमणेच्छा को सरलता और शीघ्रता से शान्त करने के लिये भी स्त्री विपरीत
रति कर सकती है ॥ २ ॥
नायककुतूहलाद्वा ॥ ३ ॥
प्रिय के विनोद एवं कुतूहल के लिये भी स्त्री विपरीत रति कर सकती है ॥ ३ ॥
तत्र युक्तयन्त्रेणैवेतरेणोत्थाप्यमाना तमधः पातयेत्। एवं च रतमविच्छिन्नरसं
तथा प्रवृत्तमेव स्यात्। इत्येकोऽयं मार्गः ॥ ४ ॥
विपरीत रति : प्रथम रीति—समागम करते हुए पुरुष यन्त्र किये हुए ही स्त्री को
बाहुपाश में भरकर ऊपर ले आये और स्त्री भी उसे नीचे करके स्वयं समागम करने लगे। ऐसा
करने से समागम के सुख में कोई अन्तर नहीं आता, अर्थात् उसका नैरन्तर्य बना रहता है—यह
विपरीत रति की प्रथम रीति है ॥ ४ ॥
पुनरारम्भेणादित एवोपक्रमेत्। इति द्वितीयः ॥ ५ ॥
द्वितीय रीति—यदि समागम को पुनः आरम्भ किया जाये, तो स्त्री प्रारम्भ से ही विपरीत
रति करे। यह विपरीत रति की दूसरी रीति है ॥ ५ ॥
सा प्रकीर्यमाणकेशकुसुमा श्वासविच्छिन्नहासिनी वक्त्रसंसर्गार्थं स्तनाभ्यामुरः
पीडयन्ती पुनः-पुनः शिरो नामयन्ती याश्चेष्टाः पूर्वमसौ दर्शितवांस्ता एव
प्रतिकुर्वीत। पातिता प्रतिपातयामीति हसन्ती तर्जयन्ती प्रतिघ्नती ब्रूयात्। पुनश्च
व्रीडां दर्शयेत्। श्रमं विरामाभीप्सां च। पुरुषोपसृमैरेवोपसर्पेत्॥ ६ ॥
बाह्य विपरीतरति—जब स्त्री विपरीत रति करती है, तो उसके केशपाश के बिखर जाने
से उनमें गूँथे हुए फूल बिखर जाते हैं, हँसने पर भी उसकी साँस फूलती है और उसकी हँसी
बाधित हो जाती है, पति के मुख का चुम्बन करने के लिए अपना मुख झुकाती हुई स्तनों से
उसके वक्षःस्थल को बार बार दबाती है, जो जो चेष्टाएँ (चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत आदि) पुरुष
ने समागम के समय की थीं, उन सभी को वह करती है; इतना ही नहीं, हँसती है और पुरुष को
डराती है तथा विजेता की भाँति बोलती है—'पहले तुमने मुझे गिराकर समागम किया था। अब
मैं तुम्हें गिराकर समागम करूँगी।' रमणेच्छा शान्त हो जाने पर लज्जा, थकान दिखाये। तदुपरान्त
पुरुष के समान ही उपसर्पण करे, अर्थात् पुरुष जिस प्रकार स्त्री पर प्रेम प्रकट करता है, उसी
प्रकार स्त्री भी पुरुष पर प्रेम प्रकट करे ॥ ६ ॥
तानि च वक्ष्यामः ॥ ७ ॥
अब पुरुषों के उन उपसर्पणों को कहते हैं जिन्हें स्त्री पुरुषायित (विपरीत रति) में प्रयोग
करती है ॥ ७ ॥
पुरुषः शयनस्थाया योषितस्तद्वचनव्याक्षिप्तचित्ताया इव नीर्वी विश्लेषयेत्।
तत्र विवदमानां कपोलचुम्बनेन पर्याकुलयेत् ॥ ८ ॥