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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 248 में से

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पृष्ठ 92

६६ वात्स्यायन-कामसूत्र
पीडितक—शिश्न से भली प्रकार प्रहार करता हुआ देर तक स्त्री को दबाये रहे, तो इसे
पीड़ितक कहते हैं ॥ २५ ॥
सुदूरमुत्कृष्य वेगेन स्वजघनमवपातयेदिति निर्घातः ॥ २६ ॥
निर्घात—प्रविष्ट कराये हुए शिश्न को पूरा बाहर निकालकर स्त्री की जाँघों पर अपनी
जाँघों को बलपूर्वक गिराना निर्घात कहलाता है ॥ २६ ॥
एकत एव भूयिष्ठमवलिखेदिति वराहघातः ॥ २७ ॥
वराहघात—मदनमन्दिर में एक ओर ही शिश्नप्रहार करने को 'वराहघात'
कहते हैं ॥ २७ ॥
स एवोभयतः पर्यायेण वृषाघातः ॥ २८ ॥
वृषाघात—जब मदनमन्दिर के दोनों पार्श्वों में क्रम से प्रहार किया जाये, तो उसे वृषाघात
कहते हैं ॥ २८ ॥
सकृन्मिश्रितमनिष्क्रमय्य द्वित्रिश्चतुरिति घट्टयेदिति चटकविलसितम् ॥ २९ ॥
चटकविलसित—प्रविष्ट शिश्न को बाहर न निकालकर, नरगौरैया (चिड़े) के समान
दो तीन-चार बार प्रहार करने को चटकविलसित कहते हैं ॥ २९ ॥
रागावसानिकं व्याख्यातं करणं सम्पुटमिति ॥ ३० ॥
सम्पुट—स्खलन के समय सम्पुट होता है। इस करण को पहले ही कहा जा
चुका है ॥ ३० ॥
तेषां स्त्रीसात्म्याद् विकल्पेन प्रयोगः ॥ ३१ ॥
प्रयोग की रीति—इन पुरुषोपसृतों का स्त्री की प्रकृति और प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर,
विकल्प से, प्रयोग करना चाहिये ॥ ३१ ॥
पुरुषायिते तु सन्दंशो भ्रमरकः प्रेङ्खोलितमित्यधिकानि ॥ ३२ ॥
पुरुषायित (विपरीत रति) में संदंश, भ्रमरक और प्रेङ्खोलित— ये तीन उपसृत
अधिक हैं ॥ ३२ ॥
वाडवेन लिङ्गमवगृह्य निष्कर्षन्त्याः पीडयन्त्या वा चिरावस्थानं
सन्दंशः ॥ ३३ ॥
सन्दंश—स्त्री, पुरुष के शिश्न को मदनमन्दिर में डालकर घोड़ी के समान देर तक भीतर
खींचती या दबाती रहे तो उसे संदंश कहते हैं ॥ ३३ ॥
युक्तयन्त्रा चक्रवद् भ्रमेदिति भ्रमरक आभ्यासिकः ॥ ३४ ॥
भ्रमरक—यन्त्रयोग किये हुए स्त्री चाक की तरह घूमे, यह भ्रमरक कहलाता है। यह
अभ्यास से ही हो सकता है ॥ ३४ ॥
तत्रेतरः स्वजघनमुत्क्षिपेत् ॥ ३५ ॥
नायक का कार्य—भ्रमरक उपसृत में नायक को अपनी जाँघें ऊपर उठा लेनी
चाहिये ॥ ३५ ॥
जघनमेव दोलायमानं सर्वतो भ्रामयेदिति प्रेङ्खोलिखितकम् ॥ ३६ ॥