वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० वात्स्यायन-कामसूत्र
परिष्वङ्गचुम्बननखदन्तचूषणप्रधानाः क्षतवर्जिताः प्रहणनसाध्या मालव्य
आभीर्यश्च ॥ २४ ॥
मालव और आभीर देश की स्त्रियाँ आलिङ्गन, चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत और शिश्न को
चूसना अधिक पसन्द करती हैं। वे क्षत (घाव) नहीं चाहतीं, किन्तु प्रहणन में रुचि
रखती हैं ॥ २४ ॥
सिन्धुषष्ठानां च नदीनामन्तरालीया औपरिष्टकसात्म्याः ॥ २५ ॥
पंजाब और सिन्ध प्रान्त की स्त्रियों को औपरिष्टक (मुखमैथुन) अनुकूल पड़ता
है ॥ २५ ॥
चण्डवेगा मन्दसीत्कृता आपरान्तिका लाट्यश्च ॥ २६ ॥
अपरान्तक (सह्याद्रि का निकटवर्ती पश्चिमी सीमाप्रदेश) और लाट देश (सूरत, भड़ौँच
एवं समीपवर्ती भूभाग) की स्त्रियाँ चण्डवेग होती हैं और वे समागम में प्रहारों को सहकर
मन्द-मन्द सीत्कार करती हैं ॥ २६ ॥
(खरवेग और चण्डवेग में स्वल्प अन्तर है। खरवेग में खाज की अधिकता होती है
जबकि चण्डवेग में राग या काम की अधिकता ।)
दृढप्रहणनयोगिन्यः खरवेगा एव, अपद्रव्यप्रधानाः स्त्रीराज्ये कोशलायां
च ॥ २७ ॥
स्त्रीराज्य और कोशल देश की स्त्रियाँ खरवेग होती हैं। ये समागम में शिश्न के दृढ़
प्रहार चाहती हैं और रमणेच्छा शान्त न होने पर अपद्रव्य (कृत्रिम शिश्न) का भी प्रयोग करती
हैं ॥ २७ ॥
प्रकृत्या मृद्व्यो रतिप्रिया अशुचिरुचयो निराचाराश्चान्ध्र्यः ॥ २८ ॥
आन्ध्र—आन्ध्र देश की स्त्रियाँ कोमलाङ्गी, सम्भोगप्रिय, समागम में गन्दी रुचिवाली
और आचरणहीन (व्यभिचारिणी) होती हैं ॥ २८ ॥
सकलचतुःषष्टिप्रयोगरागिण्योऽश्लीलपरुषवाक्यप्रियाः शयने च सरभसोप-
क्रमा महाराष्ट्रीकाः ॥ २९ ॥
महाराष्ट्र—महाराष्ट्र देश की स्त्रियाँ चौंसठ कलाओं के प्रयोग में अनुराग रखती हैं, वे
समागम के समय अश्लील और परुष भाषा बोलती है और मैथुन का समारम्भ अत्यन्त साहस
एवं उत्साहपूर्वक करती हैं ॥ २९ ॥
तथाविधा एव रहसि प्रकाशन्ते नागरिकाः ॥ ३० ॥
मगध (पटना प्रान्त) की स्त्रियाँ भी महाराष्ट्र की स्त्रियों के समान ही होती हैं, परन्तु ये
कामकलाओं का अभ्यास और अश्लील एवं परुष वचनों का प्रयोग एकान्त में करती हैं ॥ ३० ॥
मृद्यमानाश्चाभियोगान्मन्दं मन्दं प्रसिञ्चन्ते द्रविड्यः ॥ ३१ ॥
द्रविड़—द्रविड़ देश की स्त्रियाँ आलिङ्गन आदि करते ही मन्द-मन्द रजःस्राव करने
लगती हैं ॥ ३१ ॥