वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवात्स्यायन-कामसूत्र
पुरुषोपसृप्त के भेद—शय्या पर बैठी हुई स्त्री को बातों में लगाकर पुरुष उसका नाड़ा
खोल दे। यदि स्त्री ना करे, तो उसके कपोलों का चुम्बन करता हुआ, उसे समागम के लिये
व्याकुल बना दे जिससे वह ना ही न कर सके ॥ ८ ॥
स्थिरलिङ्गश्च तत्र तत्रैनां परिस्पृशेत् ॥ ९ ॥
यदि पुरुष का शिश्न दृढ़ एवं स्थिर हो जाये, तो स्त्री को कामोद्रिक्त करने के लिये उसके
कामाङ्गों (स्तन, काँख आदि) को धीरे धीरे सहलाये ॥ ९ ॥
प्रथमसङ्गता चेत्संहतोर्वोरन्तरे घट्टनम् ॥ १० ॥
यदि स्त्री का प्रथम समागम हो, और उसने दोनों जाँघें दृढ़तापूर्वक मिला रखी हों, तो
पुरुष को उसकी जाँघों को सहलाते हुए अलग अलग करना चाहिये ॥ १० ॥
कन्यायाश्च ॥ ११ ॥
यदि अक्षतयोनि से समागम करना हो, तो भी इसी प्रकार व्यवहार करना
चाहिये ॥ ११ ॥
तथा स्तनयोः संहतयोर्हस्तयोः कक्षयोरंसयोर्ग्रीवायामिति च ॥ १२ ॥
इसी प्रकार हाथों से ढँके हुए स्त्री के स्तनों, काँखों, कन्धों और ग्रीवा में भी हाथ चलाना
चाहिये ॥ १२ ॥
स्वैरिण्यां यथासात्म्यं यथायोगं च। अलके चुम्बनार्थमेनां निर्दयमवलम्बेत
हनुदेशे चाङ्गुलिसम्पुटेन ॥ १३ ॥
स्वैरिणी (व्यभिचारिणी) स्त्रियों में तो जैसा उसके अनुकूल पड़े और जैसा सम्भव हो,
वैसा ही आचरण करे। मुखचुम्बन के लिये उसके केशपाश को निर्दयतापूर्वक पकड़े और
उसकी ठोड़ी को अङ्गुलियों के मध्य ले ले ॥ १३ ॥
तत्रेतरस्या व्रीडा निमीलनं च। प्रथमसमागमे कन्यायाश्च ॥ १४॥
जो भी स्त्री पुरुष से प्रथम बार मिलती है, वह लज्जावश आँखें बन्द कर लेती है। प्रथम
समागम में अक्षतयोनि कन्या की भी यही स्थिति होती है ॥ १४॥
रतिसंयोगे चैनां कथमनुरञ्जयत इति प्रवृत्त्या परीक्षेत ॥ १५ ॥
आभ्यन्तर पुरुषोपसृप्त कहते हैं—समागम में स्त्री को कैसे अनुरक्त किया जा सकता
है, यह अनुमान बाह्य पुरुषोपसृप्त में उसकी चेष्टाएँ देखकर ही कर लेना चाहिये ॥ १५ ॥
युक्तयन्त्रेणोपसृप्यमाणा यतो दृष्टिमावर्तयेत्तत एवैनां पीडयेत्। एतद्रहस्यं
युवतीनामिति सुवर्णनाभः ॥ १६ ॥
चेष्टा से पहचान—यन्त्रयोग होने पर मदनमन्दिर के जिस जिस ओर शिश्नसंचालन से
स्त्री आनन्दविह्वल होकर दृष्टि घुमाने लगे, उसी-उसी ओर लक्ष्य करके पुरुष को प्रहार करना
चाहिये। नारीजीवन का यह गहन रहस्य है—ऐसा आचार्य सुवर्णनाभ का मत है ॥ १६ ॥
गात्राणां स्रंसनं नेत्रनिमीलनं व्रीडानाशः समधिका च रतियोजनेति स्त्रीणां
भावलक्षणम् ॥ १७ ॥