सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 78

५२ वात्स्यायन-कामसूत्र
मुख झुकाकर अधरपान करे, प्रगाढ़ आलिङ्गन करे और कामोन्मत्त होकर उन-उन स्थानों पर
दन्तक्षत करे, जहाँ विहित हों अथवा उसने किये हों ॥ ३९ ॥
उन्नम्य कण्ठे कान्तस्य संश्रिता वक्षसः स्थलीम्।
मणिमालां प्रयुञ्जीत यच्चान्यदपि लक्षितम्॥ ४० ॥
दूसरी विधि—प्रिय के वक्षस्थल पर बैठकर, एक हाथ से उसका मुख उठाकर और
दूसरे हाथ को गले में डालकर ग्रीवा पर मणिमाला अथवा अन्य मोहक दन्तक्षत बना दे ॥ ४० ॥
दिवापि जनसम्बाधे नायकेन प्रदर्शितम्।
उद्दिश्य स्वकृतं चिह्नं हसेदन्यैरलक्षिता ॥ ४१ ॥
प्रकाश की चेष्टाएँ—एकान्त की चेष्टाओं को कहकर, अब प्रकाश की चेष्टाएँ कहते
हैं—न केवल रात्रि, बल्कि दिन में, मनुष्यों की भीड़ में भी नायक के शरीर पर अपने द्वारा किये
गये चिह्नों (नखक्षत एवं दन्तक्षत) को लक्ष्य करके इस प्रकार हँसे कि कोई अन्य न जान
पाये ॥ ४१ ॥
विकूणयन्तीव मुखं कुत्सयन्तीव नायकम्।
स्वगात्रस्थानि चिह्नानि सासूयेव प्रदर्शयेत् ॥ ४२ ॥
अपने मुख को चुम्बन लेने के समान संकुचित करके, नायक को झिड़कती हुई-सी,
असहनशील के समान, पति द्वारा अपने शरीर पर अंकित किये गये चिह्नों (नखक्षत एवं
दन्तक्षत) को दिखाये ॥ ४२ ॥
परस्परानुकूल्येन तदेवं लज्जमानयोः।
संवत्सरशतेनापि प्रीतिर्न परिहीयते ॥ ४३ ॥
परस्पर अनुकूलता और सलज्जता का भाव रखने वाले स्त्री-पुरुष की प्रीति सौ वर्ष में भी
क्षीण नहीं होती ॥ ४३ ॥
दशनक्षतविधिप्रकरण नामक पञ्चम अध्याय सम्पन्न ॥
●
षष्ठ अध्याय
संवेशनप्रकार-प्रकरण
रागकाले विशालयन्त्येव जघनं मृगी संविशेदुच्चरते ॥ १ ॥
उच्च और उच्चतर रत में मृगी—यदि मृगी (छोटी योनि वाली) नायिका बड़े शिश्न
वाले वृष एवं अश्व नायक में समागम करे, तो अपनी जाँघों को चौड़ा ले ॥ १ ॥
अवहासयन्तीव हस्तिनी नीचरते ॥ २ ॥
नीच और नीचतर रत में हस्तिनी—यदि हस्तिनी (बड़ी योनि वाली) नायिका छोटे
शिश्न वाले शश और वृष नायक से समागम करे, तो अपनी जाँघों को सिकोड़ ले ॥ २ ॥