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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 248 में से

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पृष्ठ 83

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५७
और घोड़े का समागम समझना चाहिये, और इनके समागम में जो विशेषताएँ दिखें, उनका
अनुकरण करना चाहिये ॥ ४१ ॥
मिश्रीकृतसद्भावाभ्यां द्वाभ्यां सह सङ्घाटकं रतम् ॥ ४२ ॥
सङ्घाटकरत—परस्पर विश्वास एवं सद्भाव के सूत्र में बँधी दो स्त्रियों के साथ एक पुरुष
का समागम करना सङ्घाटकरत कहलाता है ॥ ४२ ॥
बह्वीभिश्च सह गोयूथिकम् ॥ ४३ ॥
गोयूथिक—परस्पर विश्वास एवं सद्भाव के सूत्र में बँधी अनेक स्त्रियों के साथ एक
पुरुष का समागम करना गोयूथिक नामक चित्ररत कहलाता है ॥ ४३ ॥
वारिक्रीडितकं छागलमैणेयमिति तत्कर्मानुकृतियोगात् ॥ ४४ ॥
वारिक्रीड़ितक, छागल और ऐणेय—जिस प्रकार हाथी अनेक हथिनियों के साथ
क्रीड़ा करता है, उसी प्रकार एक पुरुष जब अनेक स्त्रियों के साथ क्रीड़ा करे, तो उसे
वारिक्रीड़ितक कहते हैं। बकरा, हिरण आदि की मैथुन-क्रीड़ाओं का अनुकरण करने से
गोयूथिक करण अनेक प्रकार से प्रयुक्त हो सकता है ॥ ४४ ॥
ग्रामनारीविषये स्त्रीराज्ये च बाह्लीके बहवो युवानोऽन्तःपुरसधर्माण
एकैकस्याः परिग्रहभूताः ॥ ४५ ॥
अनेक पुरुषों के साथ समागम वाले देश—ग्रामनारी (असम का पूर्वी भाग) स्त्रीराज्य
और बाह्लीक (बलख) देश में अन्तःपुरवासिनी स्त्रियाँ अपने भवनों में अनेक संरक्षित युवकों
को रखती हैं ॥ ४५ ॥
तेषामेकैकशो युगपच्च यथासात्म्यं यथायोगं च रञ्जयेयुः ॥ ४६ ॥
यदि एक स्त्री के साथ अनेक पुरुष समागम करना चाहें, तो एक एक कर, एक साथ,
जैसा वह स्त्री चाहे और जैसा अवसर हो, तदनुकूल ही उसे प्रसन्न करें ॥ ४६ ॥
एको धारयेदेनामन्यो निषेवेत। अन्यो जघनं मुखमन्यो मध्यमन्य इति वारं
वारेण व्यतिकरेण चानुतिष्ठेयुः ॥ ४७ ॥
अनेक पुरुषों का एक साथ समागम—एक युवक उस स्त्री को गोद में लेकर बैठे,
दूसरा युवक उसका मुख-चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत आदि करे, तीसरा शिश्नप्रवेश कराये, और
चौथा कुचमर्दन आदि करे—इस प्रकार बारी-बारी से सभी पुरुष अपना कार्य और स्थान बदलते
चले जायें ॥ ४७ ॥
एतया गोष्ठीपरिग्रहा वेश्या राजयोषापरिग्रहाश्च व्याख्यातः ॥ ४८ ॥
इससे ही गोष्ठी में परिगृहीत वेश्या और रानियों के परिग्रह (रखैल पुरुषों) को भी कह
दिया गया है, अर्थात् गोष्ठी में अनेक पुरुष वेश्या के साथ और राजरानियाँ अपने पुरुष-रखैलों
के साथ, इसी प्रकार समागम करें ॥ ४८ ॥
अधोरतं पायावपि दाक्षिणात्यानाम्। इति चित्ररतानि ॥ ४९ ॥
दाक्षिणात्यों में गुदामैथुन भी प्रचलित है। (यह अधम मैथुन है, फलतः त्याज्य ही है)
इस प्रकार चित्ररत पूर्ण हुए ॥ ४९ ॥