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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 248 में से

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पृष्ठ 85

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५९
विरुतानि चाष्टौ ॥ ५ ॥
विरुत के आठ रूप—प्रहारजन्य पीड़ाके कारण मुख से आठ प्रकार की ध्वनि
(चिल्लाहट) निकलती है ॥ ५ ॥
हिङ्कारस्तनितकूजितरुदितसूत्कृतदूत्कृतफूत्कृतानि ॥ ६ ॥
हिंकार, स्तनित, कूजित, रुदित, नदित, सूत्कृत, दूत्कृत और फूत्कृत—ये सात प्रकार के
अव्यक्त अक्षर हैं ॥ ६ ॥
अम्बार्थाः शब्दा वारणार्था मोक्षणार्थाश्चालमर्थास्ते ते चार्थयोगात् ॥ ७ ॥
अन्य शब्द—'अरी मैया', 'ऐसा मत करो', 'अब रहने दो', 'बहुत हो गया', 'हाय, मर
गयी' इत्यादि शब्द भी पीड़ा द्योतित करते हैं ॥ ७ ॥
पारावतपरभृतहारीतशुकमधुकरदात्यूहहंसकारण्डवलावकविरुतानि
सीत्कृत-भूयिष्ठानि विकल्पशः प्रयुञ्जीत ॥ ८ ॥
पक्षियों की ध्वनि—कबूतर, कोयल, हारीत (हरियल), तोता, भ्रमर, चातक, हंस,
कारण्डव (जलकुक्कुट) और लवा (बटेर) आदि पक्षियों के शब्द रूप अनेक सीत्कारों का
विकल्प से प्रयोग करे ॥ ८ ॥
उत्सङ्गोपविष्टायाः पृष्ठे मुष्टिना प्रहारः ॥ ९ ॥
मुष्टिप्रहार—गोद में बैठी हुई स्त्री की पीठ में मुक्का मारना चाहिये ॥ ९ ॥
तत्र सासूयाया इव स्तनितरुदितकूजितानि प्रतीघातश्च स्यात् ॥ १० ॥
नायिका के कार्य—मुक्का लगते ही नायिका असहनशील के समान स्तनित, कूजित
और रुदित करती हुई बदले में नायक पर प्रतिघात करे ॥ १० ॥
युक्तयन्त्रायाः स्तनान्तरेऽपहस्तकेन प्रहरेत् ॥ ११ ॥
अपहस्तक प्रहार—चित लेटकर समागम कराती हुई स्त्री के स्तनों के मध्य में हथेली के
पिछले भाग से प्रहार करना चाहिये ॥ ११ ॥
मन्दोपक्रमं वर्धमानरागमा परिसमाप्तेः ॥ १२ ॥
प्रारम्भ में हल्के हाथ से प्रहार करे और राग के बढ़ने के साथ प्रहारों में भी तेजी लानी
चाहिये ॥ १२ ॥
तत्र हिङ्कारादीनामनियमेनाभ्यासेन विकल्पेन च तत्कालमेव प्रयोगः ॥ १३ ॥
सीत्कारों का उचित समय—हिंकार आदि सीत्कारों का अनियम से, अभ्यास से और
विकल्प से तत्काल ही प्रयोग करना चाहिये ॥ १३ ॥
शिरसि किञ्चिदाकुञ्चिताङ्गुलिना करेण विवदन्त्याः फूत्कृत्य प्रहणनं
तत्प्रसृतकम् ॥ १४ ॥
प्रसृतक-प्रहार—विवाद करती हुई स्त्री के सिर में हाथ की अङ्गुलियों को सिकोड़-
कर (हाथ को सर्प के फन के समान फैलाकर) फूत्कार करके प्रहार करना प्रसृतक
कहलाता है ॥ १४ ॥
काम० ६ तत्रान्तर्मुखेन कूजितं फूत्कृतं च ॥ १५ ॥