वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 248 में से
संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५१
मध्यमवेगाः सर्वंसहाः स्वाङ्गप्रच्छादिन्यः पराङ्गहासिन्यः कुत्सिताश्लील-
परुषपरिहारिण्यो वानवासिकाः ॥ ३२ ॥
वनवासी देश—वनवासी देश की स्त्रियाँ मध्यम वेग वाली होती हैं, वे नखक्षत,
दन्तक्षत, कुचमर्दन आदि सभी को सहन कर जाती हैं। वे अपने अङ्गों को आच्छादित रखती हैं,
किन्तु दूसरे के शरीरगत दोषों का उपहास करती हैं। वे कुत्सित, अश्लील और परुष स्वभाव
वाले पुरुषों से घृणा करती हैं ॥ ३२ ॥
मृदुभाषिण्योऽनुरागवत्यो मृद्व्यङ्ग्यश्च गौड्यः ॥ ३३ ॥
गौड़—गौड़ देश की स्त्रियाँ मृदुभाषिणी, पति से अनुराग रखने वाली और कोमलाङ्गी
होती हैं ॥ ३३ ॥
देशसात्म्यात् प्रकृतिसात्म्यं बलीय इति सुवर्णनाभः। न तत्र देश्या
उपचाराः ॥ ३४ ॥
देशसात्म्य से प्रकृतिसात्म्य की महत्ता—देशाचार से व्यक्ति की प्रकृति और प्रवृत्ति
अधिक बलवान् है, अतएव व्यक्ति की प्रकृति और प्रवृत्ति के विरुद्ध देशाचार नहीं अपनाना
चाहिये—ऐसा आचार्य सुवर्णनाभ का मत है ॥ ३४ ॥
कालयोगाच्च देशाद् देशान्तरमुपचारवेषलीलाश्चानुगच्छन्ति। तच्च
विद्यात् ॥ ३५ ॥
देशाचार की व्यापकता—समय के साथ-साथ एक देश के उपचार, वेशभूषा और
कामक्रीड़ाएँ दूसरे देशों में भी पहुँच जाते हैं, अतएव दूसरे स्थानों के आचार-विचार को भी जान
लेना चाहिये ॥ ३५ ॥
उपगूहनादिषु च रागवर्धनं पूर्वं पूर्वं विचित्रमुत्तरमुत्तरं च ॥ ३६ ॥
आलिङ्गन, चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत, प्रहणन और सीत्कार—इनमें प्रत्येक उपक्रिया
अपने उत्तरवर्ती से अधिक कामोत्तेजक है, लेकिन पूर्ववर्ती से अधिक विचित्र है ॥ ३६ ॥
वार्यमाणश्च पुरुषो यत्कुर्यात्तदनु क्षतम्।
अमृष्यमाणा द्विगुणं तदेव प्रतियोजयेत् ॥ ३७ ॥
एकान्त की चेष्टाएँ—यदि ना करने पर भी पुरुष नखक्षत और दन्तक्षत का प्रयोग करे,
तो स्त्री को चाहिये कि वह उससे दोगुना नखक्षत और दन्तक्षत का प्रयोग करे ॥ ३७ ॥
बिन्दोः प्रतिक्रिया माला मालायाश्चाभ्रखण्डकम्।
इति क्रोधादिवाविष्टा कलहान् प्रतियोजयेत् ॥ ३८ ॥
किस उपक्रिया का कौन दोगुना होता है, यह बताते हैं—बिन्दु के उत्तर में माला और
माला के उत्तर में खण्डाभ्रक का प्रयोग करे। इसी प्रकार क्रोध से आविष्ट होकर कलह के कार्यों
की योजना करे ॥ ३८ ॥
सकचग्रहमुन्नम्य मुखं तस्य ततः पिबेत्।
निलीयेत दशेच्चैव तत्र तत्र मदेरिता ॥ ३९ ॥
इसके पश्चात् एक हाथ से उस (नायक) के बाल पकड़कर और दूसरे हाथ में उसका