वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० वात्स्यायन-कामसूत्र
नायिका के कार्य—प्रसृतक का प्रयोग करने पर स्त्री को अन्तर्मुख से कूजित और
फूत्कार करना चाहिये ॥ १५ ॥
रतान्ते च श्वसितरुदिते ॥ १६ ॥
श्वसित और रुदित का समय—समागम के अन्त में श्वास बढ़ जाने को श्वसित और
रोने को रुदित (रोदन) कहते हैं ॥ १६ ॥
वेणोरिव स्फुटतः शब्दानुकरणं दूत्कृतम् ॥ १७ ॥
दूत्कृत—समागम करते समय बाँस की गाँठ फूटने जैसी चट-चट की ध्वनि होती है,
उसे दूत्कृत कहते हैं ॥ १७ ॥
अप्सु बदरस्येव निपततः ( शब्दानुकरणं ) फूत्कृतम् ॥ १८ ॥
फूत्कृत ( फूत्कार )—बेर के पानी में गिरते समय जो डुब्ब जैसी ध्वनि होती है,
समागम काल में होने वाली ऐसी ध्वनि को 'फूत्कृत' या 'फूत्कार' कहते हैं ॥ १८ ॥
सर्वत्र चुम्बनादिष्वपक्रान्तायाः ससीत्कृतं तेनैव प्रत्युत्तरम् ॥ १९ ॥
इनके उत्तर—जिस प्रकार चुम्बन, नखक्षत और दन्तक्षत के उत्तर में स्त्री को भी उन्हीं
का प्रयोग करना चाहिये, उसी प्रकार पुरुष के प्रहणन पर स्त्री ने जैसे सीत्कार किये हों, स्त्री के
प्रहार करने पर पुरुष को भी वैसे ही सीत्कार करने चाहिये ॥ १९ ॥
रागवशात् प्रहणनाभ्यासे वारणमोक्षणालमर्थानां शब्दानाम्म्बार्थानां च
रतान्तश्वसितरुदितस्तनितमिश्रीकृतप्रयोगा विरुतानां च। रागावसानकाले जघन-
पार्श्वयोस्ताडनमित्यतित्वरया चापरिसमाप्तेः ॥ २० ॥
समतलक और परवर्ती कार्य—जब राग की अधिकता के कारण पुरुष बार-बार प्रहार
करे, तो स्त्री 'ऐसा मत करो', 'अब रहने दो', 'बहुत हो गया', 'अरी मैया' आदि शब्दों का
प्रयोग खिन्नता, श्वसित, रुदित और स्तनित के साथ करे, और विभिन्न पक्षियों की ध्वनि का
मिश्रित प्रयोग करे। स्खलनकाल निकट जानकर शीघ्रता से जघन और पार्श्वों में समतलक (हाथ
से वार) करना चाहिये—यह स्खलन से पूर्व ही होता है ॥ २० ॥
तत्र लावकहंसविकूजितं त्वरयैव। इति स्तननप्रहणनयोगाः ॥ २१ ॥
इसके सीत्कार—समतलक-प्रहार करने पर हंस और लवा (बटेर) आदि पक्षियों की
बोली का अनुकरण करना चाहिये। इस प्रकार स्तनन—प्रहणन सम्बन्धी प्रकरण पूर्ण
हुआ ॥ २१ ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
पारुष्यं रभसत्वं च पौरुषं तेज उच्यते।
अशक्तिरार्तिर्व्यावृत्तिर्बलत्वं च योषितः ॥ २२ ॥
इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक मिलते हैं—कठोरता, धृष्टता और साहस पुरुष के
सहज धर्म हैं और असमर्थता, पीड़ित होना, निराकरण करना और सुकुमारता स्त्री के; फलतः
पुरुष का स्वभाव प्रहणन के अनुकूल है और स्त्री का सीत्कार के ॥ २२ ॥
रागात् प्रयोगसात्म्याच्च व्यत्ययोऽपि क्वचिद् भवेत्।