वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६५
राग की विभिन्न अवस्थाएँ— जिसके साथ शिश्नसञ्चालन हो रहा है, उसके भाव की
तीन अवस्थाएँ होती हैं—प्राप्त, प्रत्यासन्न और प्रज्वलित। इन तीनों का लक्षण कहते हैं—शरीर
का शिथिल होना, नेत्रों का बन्द कर लेना, लज्जा का नाश और मदनमन्दिर को शिश्न से सटाये
रखना—ये स्त्रियों के भाव-प्राप्ति के लक्षण हैं ॥ १७॥
हस्तौ विधुनोति स्विद्यति दशन्युत्थातुं न ददाति पादेनाहन्ति रतावसाने च
पुरुषातिवर्तिनी ॥ १८ ॥
प्रज्वलित हुए (भभकते हुए) भाव का लक्षण—समागम के अन्त में स्त्री हाथों को
कँपाती हैं, पसीने से भींग जाती हैं, पुरुष को दाँतों से काटती है, पुरुष को समागम से विरत नहीं
होने देती, अर्थात् उठने नहीं देती, उसे लातें लगाती और पुरुष का भी अतिक्रमण कर जाती है
अर्थात् ये लक्षण इस बात के सूचक हैं कि स्त्री का काम अभी शान्त नहीं हुआ है, और वह
प्रज्वलित (भभक रहा) है ॥ १८ ॥
तस्याः प्राग्यन्त्रयोगात् करेण संबाधं गज इव क्षोभयेत्। आ मृदुभावात्। ततो
यन्त्रयोजनम् ॥ १९॥
करिकर का प्रयोग—स्त्री को शीघ्र स्खलित करने के लिए, समागम से पूर्व उसके
मदनमन्दिर को हाथ से हाथी के सूँड़ के समान क्षोभित करे और जब वह रससिक्त हो जाये तभी
शिश्नप्रवेश कराये ॥ १९॥
उपसृप्तकं मन्थनं हुलोऽवमर्दनं पीडितकं निर्घातो वराहघातो वृषाघातश्चटक-
विलसितं सम्पुट इति पुरुषोपसृप्तानि ॥ २० ॥
उपसृप्तों के प्रकार—उपसृप्तक, मन्थन, हुल, अवमर्दन, पीड़ितक, निर्घात, वराहघात,
वृषाघात, चटकविलसित और सम्पुट—ये दश पुरुषोपसृप्त हैं ॥ २० ॥
न्याय्यमृजुसम्मिश्रणमुपसृप्तकम् ॥ २१ ॥
उपसृप्तक—शिश्न को सीधी रीति से मदनमन्दिर से मिलाना उपसृप्तक है। सुकुमार और
अहानिकर होने से यही रीति शिष्टजनसम्मत (न्याय्य) है ॥ २१ ॥
हस्तेन लिङ्गं सर्वतो भ्रामयेदिति मन्थनम् ॥ २२ ॥
मन्थन—पुरुष शिश्न को हाथ से पकड़कर मदनमन्दिर में चारों ओर घुमावे, तो इसे
मन्थन कहते हैं ॥ २२ ॥
नीचीकृत्य जघनमुपरिष्टाद् घट्टयेदिति हुलः ॥ २३ ॥
हुल—स्त्री की जाँघों को नीचा करके मदनमन्दिर के अन्दर शिश्न को झटके से डालना
'हुल' कहलाता है ॥ २३ ॥
तदेव विपरीतं सरभसमवमर्दनम् ॥ २४ ॥
अवमर्दन—स्त्री की जाँघों को ऊँचा करके (नितम्बों के नीचे तकिया लगाकर)
मदनमन्दिर के अन्दर वेगपूर्वक शिश्न-प्रवेश को अवमर्दन कहते हैं ॥ २४ ॥
लिङ्गेन समाहत्य पीडयाँश्चिरमवतिष्ठेतेति पीडितकम् ॥ २५ ॥