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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 248 में से

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पृष्ठ 80

५४ वात्स्यायन-कामसूत्र
सम्पुटेन प्रतिग्रहो नीचरते ॥ १३ ॥
नीच और नीचतर रत की व्यवस्था—नीचतर में सम्पुटक आदि आसनों से अपनी
योनि सिकोड़कर समागम करना चाहिये ॥ १३ ॥
एतेन नीचतररतेऽपि हस्तिन्याः ॥ १४ ॥
इस आसन से नीचतर रत में हस्तिनी नायिका शश नायक से भी समागम करे ॥ १४॥
सम्पुटकं पीडितकं वेष्टितकं वाडवकमिति ॥ १५ ॥
नीच और नीचतर रत के आसन—नीच और नीचतर रत में चार प्रकार के उपवेशन
होते हैं—सम्पुटक, पीड़ितक, वेष्टितक और वाड़वक ॥ १५ ॥
ऋजुप्रसारितावुभावप्युभयोश्चरणाविति सम्पुटः ॥ १६ ॥
सम्पुटक—जब स्त्री और पुरुष दोनों के पैर सीधे फैले हुए हों, तो सम्पुटक आसन होता
है ॥ १६ ॥
स द्विविधः—पार्श्वसम्पुट उत्तानसम्पुटश्च । तथा कर्मयोगात् ॥ १७ ॥
सम्पुटक आसन दो प्रकार का होता है—पार्श्व सम्पुट और उत्तान सम्पुट। क्योंकि
सम्पुटक आसन में स्त्री को चित लिटाकर भी समागम किया जा सकता है और बगल में करवट
के बल लिटाकर भी, इसलिए यह पार्श्व और उत्तान दो प्रकार का होता है ॥ १७ ॥
पार्श्वेण तु शयानो दक्षिणेन नारीमधिशयीतेति सार्वत्रिकमेतत् ॥ १८ ॥
शयनविधि—शयन के समय स्त्री को अपनी बायीं ओर सुलाये—यह सर्वत्र प्रचलित
रीति है ॥ १८ ॥
सम्पुटकप्रयुक्तयन्त्रेणैव दृढमूरू पीडयेदिति पीडितकम् ॥ १९ ॥
पीड़ितक—सम्पुटक आसन से समागम करते हुए, यदि स्त्री-पुरुष एक-दूसरे की जाँघों
को दृढ़तापूर्वक दबायें, तो उसे पीड़ितक आसन कहते हैं ॥ १९ ॥
ऊरू व्यत्यस्येदिति वेष्टितकम् ॥ २० ॥
वेष्टितक—यदि सम्पुटक आसन में स्त्री अपना मदनमन्दिर सिकोड़ने के लिये अपने
बाँयें पैर से पुरुष का दायाँ पैर अथवा दायें पैर से बाँया पैर लपेट ले, तो इसे वेष्टितक आसन
कहते हैं ॥ २० ॥
वडवेव निष्ठुरमवगृह्णीयादिति वाडवकमाभ्यासिकम् ॥ २१ ॥
वाड़वक—जिस प्रकार समागम के समय घोड़ी घोड़े के शिश्न को कसकर जकड़ लेती
है, उसी प्रकार जब स्त्री, पुरुष के शिश्न को प्रविष्ट होते ही जकड़ ले और पुरुष के
शिश्नसञ्चालन के समय भी दृढ़तापूर्वक उसे जकड़े रखे, तो इसे वाड़वक आसन कहते हैं। यह
आभ्यासिक अर्थात् अभ्यास से सिद्ध होने वाला आसन है ॥ २१ ॥
तदान्ध्रीषु प्रायेण। इति संवेशनप्रकारा बाभ्रवीयाः ॥ २२ ॥
आन्ध्रप्रदेश की स्त्रियों में इस वाड़वक आसन का विशेष प्रचलन है। इस प्रकार
बाभ्रवीय आचार्यों द्वारा कथित संवेशन प्रकार (सम्भोग के आसन) पूर्ण हुए ॥ २२ ॥
सौवर्णनाभास्तु ॥ २३ ॥