सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 79

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ५३
न्याय्यो यत्र योगस्तत्र समपृष्ठम् ॥ ३ ॥
समरत की व्यवस्था—यदि नायक और नायिका के साधन (शिश्न एवं योनि) समान
आकार वाले हों, तो नायिका को न जाँघें फैलाने की आवश्यकता होती है और न सिकोड़ने
की ॥ ३ ॥
आभ्यां वडवा व्याख्याता ॥ ४ ॥
मृगी और हस्तिनी की व्यवस्था से वडवा नायिका की व्यवस्था भी कह दी गयी है।
(उसे शश नायक के साथ समागम करते समय नीचरत में जाँघों को सिकोड़ लेना चाहिये और
अश्व नायक के साथ समागम करते समय—उच्चरत में—जाँघों को चौड़ा लेना चाहिये) ॥ ४ ॥
तत्र जघनेन नायकं प्रतिगृह्णीयात् ॥ ५ ॥
शिश्नग्रहण की विधि—समागम में स्त्री लेटकर पुरुष के शिश्न को ग्रहण करे, तो
अपना शरीर ढीला छोड़ दे ॥ ५ ॥
अपद्रव्याणि च सविशेषं नीचरते ॥ ६ ॥
नीचरत में अपद्रव्य (कृत्रिम लिङ्ग) का प्रयोग योनि को फैलाकर ही करना चाहिये,
सिकोड़कर नहीं ॥ ६ ॥
उत्फुल्लकं विजृम्भितकमिन्द्राणिकं चेति त्रितयं मृग्याः प्रायेण ॥ ७ ॥
मृगी के आसन—उत्फुल्लक, विजृम्भितक और इन्द्राणिक—ये तीन आसन प्रायः मृगी
के होते हैं ॥ ७ ॥
शिरो विनिपात्योर्ध्वं जघनमूत्फुल्लकम् ॥ ८ ॥
उत्फुल्लक—जाँघों के ऊपरी भाग को नीचा और निचले भाग को ऊँचा कर देने को
उत्फुल्लक आसन कहते हैं। (स्त्री के कटिभाग के नीचे तकिया रख देने से ऐसी स्थिति बन
जाती है) ॥ ८ ॥
तत्रापसारं दद्यात् ॥ ९ ॥
इस उत्फुल्लक आसन में नायक-नायिका दोनों को पीछे सरकते रहना चाहिये ॥ ९ ॥
अनीचे सक्थिनी तिर्यगवसज्य प्रतीच्छेदिति विजृम्भितकम् ॥ १० ॥
विजृम्भितक—स्त्री ऊपर उठी हुई जाँघों को फैला दे और पुरुष शिश्न को तिरछा करके
उसमें प्रवेश कराये, तो यह विजृम्भितक आसन कहलाता है ॥ १० ॥
पार्श्वयोः सममूरू विन्यस्य पार्श्वयोर्जानुनी निदध्यादित्यभ्यासयोगादि-
न्द्राणी ॥ ११ ॥
इन्द्राणिक—मिली हुई जाँघों को बगल में रखकर और पुरुष की बगल में घुटनों को
स्थापित कर देने पर इन्द्राणिक आसन होता है। यह आसन आभासिक है अर्थात् अभ्यास से ही
किया जा सकता है ॥ ११ ॥
तयोच्चतररतस्यापि परिग्रहः ॥ १२ ॥
इस इन्द्राणिक आसन से मृगी अश्व के साथ भी सुखपूर्वक समागम कर सकती है ॥ १२ ॥