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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 248 में से

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पृष्ठ 87

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६१
न चिरं तस्य चैवान्ते प्रकृतेरेव योजनम् ॥ २३ ॥
स्त्री-पुरुष के ये धर्म सार्वत्रिक नहीं हैं। राग के चरम सीमा पर पहुँचने पर या देश, काल
और प्रकृति की अनुकूलता से उसकी विपरीतता भी देखी जाती है, अर्थात् इन स्थितियों में स्त्री
अपने सहज धर्म—सुकुमारता और सलज्जता—को छोड़कर और पुरुष-जैसा कठोर बनकर,
अपहस्तक आदि का वार कर सकती है, लेकिन यह विपरीतता अधिक समय तक नहीं चलती,
और अन्त में दोनों प्रकृतिस्थ हो जाते हैं ॥ २३ ॥
कीलामुरसि कर्तरीं शिरसि विद्धां कपोलयोः संदंशिकां स्तनयोः पार्श्वयोश्चेति
पूर्वैः सह प्रहणनमष्टविधमिति दाक्षिणात्यानाम्। तद्युवतीनामुरसि कीलानि च
तत्कृतानि दृश्यन्ते। देशसात्म्यमेतत् ॥ २४ ॥
दाक्षिणात्यों के कष्टद प्रहण—छाती में कीला, सिर में कर्तरी, कपोलों में विद्धा और
स्तनों एवं बगलों में संदंशिका—ये चार तथा पूर्वोक्त चार—अपहस्तक, प्रसृतक, मुष्टि और
समतलक—कुल आठ प्रकार के प्रहण दक्षिण देशवासियों में प्रचलित हैं। वहाँ की युवतियों
के वक्षःस्थल पर कीला और उसके कार्य देखे जाते हैं। यह देशाचारमात्र है, अतएव जहाँ
प्रचलित है, वहाँ के निवासियों के ही अनुकूल पड़ता है, सबके लिये नहीं ॥ २४ ॥
कष्टमनार्यवृत्तमनादृतमिति वात्स्यायनः ॥ २५ ॥
ये कष्टप्रद प्रहण आर्यवृत्त नहीं हैं, अतएव इसका आचरण नहीं करना चाहिये—ऐसा
महर्षि वात्सायन का मत है ॥ २५ ॥
तथान्यदपि देशसात्म्यात् प्रयुक्तमन्यत्र न प्रयुञ्जीत ॥ २६ ॥
घातक प्रहणों का सर्वथा निषेध—ऐसे प्रहण जिनमें विकलांगता या मृत्यु की
आशङ्का हो, देशाचारवश भी नहीं किये जाने चाहिये ॥ २७ ॥
रतियोगे हि कीलया गणिकां चित्रसेनां चोलराजो जघान ॥ २८ ॥
घातक प्रहारों के दुष्परिणाम—चोलराज ने समागमकाल में कीला से सुकुमार
नायिका चित्रसेना को मार डाला था ॥ २८ ॥
कर्तर्या कुन्तलः शातकर्णिः शातवाहनो महादेवीं मलयवतीम् ॥ २९ ॥
कुन्तलनरेश शतकर्ण के पुत्र शातवाहन (सातवाहन या शालिवाहन) ने कर्तरी के घातक
प्रयोग से महादेवी मलयवती को मार डाला था ॥ २९ ॥
नरदेवः कुपाणिर्विद्धया दुष्प्रयुक्तया नटीं काणां चकार ॥ ३० ॥
पाण्ड्य देश के सेनापति नरदेव ने अपने कठोर हाथ से विद्धा का प्रयोग कर चित्रलेखा
नामक नर्तकी को काणी बना दिया था ॥ ३० ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
नास्त्यत्र गणना काचिन्न च शास्त्रपरिग्रहः ।
प्रवृत्ते रतिसंयोगे राग एवात्र कारणम् ॥ ३१ ॥
घातक प्रहारों का कारण : कामातिरेक—जब पुरुष कामान्ध होकर समागम में प्रवृत्त
होता है, तब वह न तो परवर्ती दुष्परिणामों की चिन्ता करता है और न शास्त्र के बन्धनों का