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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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६२ वात्स्यायन-कामसूत्र
विचार करता है। अतएव दुष्परिणामों का एकमात्र कारण उसका राग (कामातिरेक) ही
है॥ ३१॥
स्वप्नेष्वपि न दृश्यन्ते ते भावास्ते च विभ्रमाः।
सुरतव्यवहारेषु ये स्युस्तत्क्षणकल्पिताः ॥ ३२ ॥
समागमकाल में मनुष्य के मन और मस्तिष्क में जो जो भाव और विभ्रम उत्पन्न होते हैं,
वे न तो स्वप्न में सोचे जा सकते हैं और न शास्त्र में ही कहे गये होते हैं॥ ३२॥
यथा हि पञ्चमीं धारामास्थाय तुरगः पथि।
स्थाणुं श्वभ्रं दरीं वापि वेगान्धो न समीक्षते ॥
एवं सुरतसम्मर्दे रागान्धौ कामिनावपि।
चण्डवेगौ प्रवर्तेते समीक्षेते न चात्ययम् ॥ ३३ ॥
कामान्धता पर एक दृष्टान्त—जिस प्रकार पाँचवी धारागति (जव) में दौड़ता हुआ
वेगान्ध अश्व मार्ग के स्तम्भ, गर्त (गड्ढे), खन्दक आदि को नहीं देख पाता, और विनाश को प्राप्त
होता है; इसी प्रकार कामान्ध स्त्री-पुरुष चण्डवेग से सम्भोग करते हुए सुरतसम्मर्दों (नखक्षत,
दन्तक्षत, कुचमर्दन, प्रहणन आदि) के दुष्परिणामों को नहीं सोच पाते, और विनाश (अङ्गभङ्ग
या मृत्यु) को प्राप्त होते हैं॥ ३३॥
तस्मान्मृदुत्वं चण्डत्वं युवत्या बलमेव च।
आत्मनश्च बलं ज्ञात्वा तथा युञ्जीत शास्त्रवित् ॥ ३४ ॥
अतएव कामतत्त्वविद् को स्त्री की सुकुमारता एवं सहनशक्ति और काम की प्रचण्डता को
विचार कर तथा अपनी शारीरिक शक्ति का अनुमान करके ही समागम में प्रवृत्त होना
चाहिये ॥ ३४ ॥
न सर्वदा न सर्वासु प्रयोगाः सांप्रयोगिकाः ।
स्थाने देशे च काले च योग एषां विधीयते ॥ ३५ ॥
समागमकाल में जो प्रयोग अब तक बताये गये हैं, उनका प्रयोग न सदा होता है और न
सभी स्त्रियों पर; अपितु स्थान एवं देशकाल के अनुरूप ही इनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ३५॥
प्रहणनप्रयोग एवं सीत्कार वर्णन नामक सप्तम अध्याय सम्पन्न ॥
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अष्टम अध्याय
पुरुषायितप्रकरण
नायकस्य सन्तताभ्यासात् परिश्रममुपलभ्य रागस्य चानुपशमम्, अनुमता तेन
तमधोऽवपात्य पुरुषायितेन साहाय्यं दद्यात् ॥ १ ॥
विपरीत रति के कारण—निरन्तर मैथुन करते हुए जब पुरुष शिथिल हो जाये, किन्तु