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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 248 में से

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पृष्ठ 74

४८ वात्स्यायन-कामसूत्र
दाँतों के दोष—कुण्ठित (अतीक्ष्ण या भोथरे) हों; तीक्ष्ण न हों, दन्तपंक्ति से बाहर
निकले हुए हों, स्वाभाविक चमक से रहित हों, या रूक्ष हो, ऊँचे नीचे या खुरदुरे हों, बहुत पतले
या बहुत मोटे हों, और विरल हों ॥ ३ ॥
गूढकमुच्छूनकं बिन्दुबिन्दुमाला प्रवालमणिर्मणिमाला खण्डाभ्रकं वराह-
चर्वितकमिति दशनच्छेदनविकल्पाः ॥ ४ ॥
दन्तक्षत के आठ भेद—गूढ़क, उच्छूनक, बिन्दु, बिन्दुमाला, प्रवालमणि, मणिमाला,
खण्डाभ्रक और वराहचर्वितक ॥ ४ ॥
नातिलोहितेन रागमात्रेण विभावनीयं गूढकम् ॥ ५ ॥
गूढ़क—जब अधर को इस प्रकार कोमलतापूर्वक दबाया जाये कि ओष्ठ में चिह्न न बने,
मात्र हल्की सी लालिमा ही आये, तो उसे गूढ़क कहते हैं ॥ ५ ॥
तदेव पीडनादुच्छूनकम् ॥ ६ ॥
उच्छूनक—जब गूढ़क कुछ दबाकर सम्पादित किया जाये, तो यह दन्तक्षत उच्छूनक
कहलाता है ॥ ६ ॥
तदुभयं बिन्दुरधरमध्य इति ॥ ७ ॥
गूढ़क, उच्छूनक और बिन्दु का स्थान—गूढ़क, उच्छूनक और बिन्दु—ये तीनों
दन्तक्षत अधर के मध्य में ही किये जाते हैं ॥ ७ ॥
उच्छूनकं प्रवालमणिश्च कपोले ॥ ८ ॥
उच्छूनक और प्रवालमणि का स्थान—उच्छूनक और प्रवालमणि दन्तक्षत कपोल पर
किये जाते हैं ॥ ८ ॥
कर्णपूरचुम्बनं नखदशनच्छेद्यमिति सव्यकपोलमण्डनानि ॥ ९ ॥
कर्णपूर (कर्णफूल या कर्णाभरण), चुम्बन, नखक्षत और दन्तक्षत—ये सब बायें कपोल
के भूषण हैं। अर्थात् इन्हें नायिका के बायें कपोल पर ही सम्पादित करना चाहिये ॥ ९ ॥
दन्तौष्ठसंयोगाभ्यासनिष्पादनात् प्रवालमणिसिद्धिः ॥ १० ॥
प्रवालमणि—ऊपर के दाँत और अधर से बार-बार एक ही स्थान को दबाते रहने से
प्रवालमणि दन्तक्षत होता है ॥ १० ॥
सर्वस्येयं मणिमालायाश्च ॥ ११ ॥
मणिमाला—एक ही स्थान पर कई प्रवालमणि बनाना मणिमाला कहलाता है ॥ ११ ॥
अल्पदेशायाश्च त्वचो दशनद्वयसंदंशजा बिन्दुसिद्धिः ॥ १२ ॥
बिन्दु—ऊपर और नीचे के दो दाँतों की नोंक से दबाने पर तिलभर चिह्न बना देना बिन्दु
कहलाता है ॥ १२ ॥
सर्वैर्बिन्दुमालायाश्च ॥ १३ ॥
बिन्दुमाला—एक ही स्थान पर सब दाँतों से बने अनेक बिन्दुओं को (माला के समान
आकार होने के कारण) बिन्दुमाला कहते हैं ॥ १३ ॥
तस्मान्मालाद्वयमपि गलकक्षवंक्षणप्रदेशेषु ॥ १४ ॥