वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ६७
प्रेङ्खोलिखितक—झूले के समान हिलती हुई जांघों को चारों ओर घुमाना
'प्रेङ्खोलिखितक' कहलाता है।
युक्तयन्त्रैव ललाटे ललाटं निधाय विश्राम्येत ॥ ३७ ॥
विश्रामविधि—थक जाने पर स्त्री यन्त्रयोग किये हुए ही पुरुष के मस्तक पर अपना
मस्तक रखकर विश्राम कर ले ॥ ३७ ॥
विश्रान्तायां च पुरुषस्य पुनरावर्तनम् । इति पुरुषायितानि ॥ ३८ ॥
पुरुष के ऊपर आने का समय—यदि स्त्री की तृप्ति न हुई हो, तो थक जाने पर स्त्री
नीचे आ जाये और पुरुष ऊपर आकर समागम करे। विपरीत रति का प्रकरण पूर्ण
हुआ ॥ ३८ ॥
भवन्ति चात्र श्लोका:—
प्रच्छादितस्वभावापि गूढाकारापि कामिनी।
विवृणोत्येव भावं स्वं रागादुपरिवर्तिनी ॥ ३९ ॥
इस विषय में कुछ आनुवंश्य श्लोक हैं—जो कामिनी शील और सङ्कोच के कारण अपने
भावों को छिपाये रखती है, वह भी कामातुरा होकर विपरीत रति में अपने वास्तविक स्वरूप को
प्रकट कर देती है ॥ ३९ ॥
यथाशीला भवेन्नारी यथा च रतिलालसा।
तस्या एव विचेष्टाभिस्तत्सर्वमुपलक्षयेत् ॥ ४० ॥
जिस स्त्री का जैसा शील और जैसी रतिलालसा—कामवासना—हो, विपरीत रति की
चेष्टाओं से पति को वह सब जान लेना चाहिये, जिससे बाद में तदनुकूल व्यवहार किया जा
सके ॥ ४० ॥
न त्वेवतौं न प्रसूतां न मृगीं न च गर्भिणीम्।
न चातिव्यायतां नारीं योजयेत् पुरुषायिते ॥ ४१ ॥
विपरीत रति के अनुपयुक्त पात्र—रजस्वला, प्रसूता, मृगी, गर्भवती और मोटी स्त्री को
विपरीत रति में नियुक्त नहीं करना चाहिये ॥ ४१ ॥
पुरुषायितप्रकरण नामक अष्टम अध्याय सम्पन्न ॥
नवम अध्याय
औपरिष्टकप्रकरण
द्विविधा तृतीया प्रकृतिः स्त्रीरूपिणी पुरुषरूपिणी च ॥ १ ॥
नपुंसक के भेद—नपुंसक दो प्रकार के होते हैं—एक स्त्रीरूपधारी, और दूसरा
पुरुषरूपधारी ॥ १ ॥