सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

विषयानुक्रमणिका १९
दृष्टान्त का फलितार्थ, अपरिहार्यता पर उपाय, क्षुद्र व्यक्तियों के उपाय, सम्प्रयोग के अवसर,
गौशाला का अधिकारी, सूत का प्रभारी, नगराध्यक्ष (कोतवाल), पण्याध्यक्ष (बाजार का
अधिकारी), मुख्य अधिकारियों का उपाय, राजदूती का प्रयास, राजा के प्रेम का प्रकटीकरण,
राजदासी की असफलता पर राजा का कर्तव्य, सद्भावप्रदर्शन, रानी द्वारा सहयोग, कलाकौशल
के बहाने बुलाना, पीड़ित और स्वार्थियों के पत्नियों को बुलाने की रीति, रक्षिता बनाने की रीति,
परगृहप्रवेश में दोष, कोट्टराज और जयसेन का उदाहरण, सार्वजनिक प्रयोग, आन्ध्र की प्रथा,
वत्सगुल्म की प्रथा, विदर्भ की प्रथा, अपरान्त की प्रथा, सौराष्ट्र की प्रथा, अन्य योग, राजा के
लिए प्रशस्त मार्ग।
षष्ठ अध्याय १४८-१५४
अन्तःपुरिकावृत्तप्रकरण—अन्तःपुर की लीलाएँ, प्रयोगविधि, प्राच्यों के उपचार,
विना पत्नी वाले पुरुष की कामशक्ति का उपाय, नागरिकों का प्रवेश, सुरक्षाप्रबन्ध के अभाव में
प्रवेश न करें, वात्स्यायन का परामर्श, ध्यातव्य बातें, स्वेच्छा से प्रवेश की विधि, परिचारिका से
कृत्रिम प्रेम, गुप्तचरों से सावधान, गतिविधियाँ, चित्र का प्रयोग, पुटापुट योग, जनसाधारण का
अन्तःपुर में प्रवेश और निष्क्रमण, अन्तःपुर की स्त्रियों को परपुरुषगमन में मिलाने की रीति,
रानियों के भोग-विलास : अपरान्त देश की प्रवृत्ति, आभीर की प्रवृत्ति, वत्सगुल्म की प्रवृत्ति,
विदर्भ की प्रवृत्ति, स्त्रीराज की प्रवृत्ति, गौड़ देश की प्रवृत्ति, सिन्ध देश की प्रवृत्ति, हैमवतों की
प्रवृत्ति, अङ्ग-वङ्ग और कलिंग, प्राच्यों की प्रवृत्ति।
दाररक्षितप्रकरण—स्त्रियों की रक्षा का उपाय, कामशास्त्र का परामर्श, आचार्य
गोणिकापुत्र का मत, वात्स्यायन की व्यवस्था, परीक्षण द्वारा रक्षण सम्भव, बाभ्रवीय मत,
वात्स्यायन का मत, विनाश के कारण, उपसंहार।
६. वैशिक षष्ठ अधिकरण
प्रथम अध्याय १५४-१५९
सहायगम्यागम्यगमनकारणचिन्ताप्रकरण—वैशिक अधिकरण की प्रयोक्त्री, वेश्या
का प्रयोजन—काम और रतिसुख, स्वाभाविक और कृत्रिम प्रवृत्ति, कृत्रिम राग को स्वाभाविक
दिखाना, इसका कारण, प्रेम के समय निर्लोभता दिखाये, उपाय से ही धनप्राप्ति, रहन-सहन,
वेश्याजनों के सहायक, धन के लिये मिलने योग्य पुरुष, गुण के लिये मिलने योग्य पुरुष,
नायकोचित गुण, नायिका के गुण, दोनों का सामान्य गुण, नायक-नायिका के दोष, अगम्य
नायक, मिलने के कारण, वात्स्यायन की व्यवस्था।
गम्योपावर्तनप्रकरण—भावजिज्ञासा, प्रेमसूत्र जोड़ने के उपाय, आगत का स्वागत,
गोष्ठी में सम्मान, प्रेम की दृढ़ता हेतु उपाय, स्वयं दर्शन, उपसंहार, आदान-प्रदान।
द्वितीय अध्याय १५९-१६६
कान्तावृत्तप्रकरण—आचार्य वात्स्यायन का परामर्श, कान्तानुवृत्त, माँ के संरक्षण में

२० वात्स्यायन-कामसूत्र
कार्य, माँ के कार्य, बेटी का शिष्टाप्रदर्शन, माँ का आज्ञापालन, व्याधि का बहाना, बहाने का
फल, इसकी विधि, मिलनविषयक बातें, मनोरथकथन, दोषों को छिपाना, शयनविधि, देखने
की रीति, व्यवहार की रीति, बोलने की रीति, सहानुभूति के अवसर, नायक के साथ सहजीवन
को प्राथमिकता, जीवन सार्थक मानना, देवपूजा (कृतज्ञताप्रदर्शन), भोजन और अलङ्कार की
रीति, नायक से सन्तान की इच्छा, आवश्यक बातें, प्रतिकूल ऋतु में भी अभिसार, जन्मान्तर
सम्बन्धों की कामना, वशीकरण की शङ्का, माँ से विवाद, माँ को भयभीत करना, रहस्योद्घाटन
का प्रयास, धन के विषय में विवाद नहीं, सभी कार्यों में माता की सहमति, नायक के आने के
बाद के कृत्य, काकबलि, साथ ही मरना, आसक्त की पहचान, उपजीव्य का उल्लेख, वेश्या-
नायकों को शिक्षा।
तृतीय अध्याय १६६-१७१
अर्थागमोपायप्रकरण—कामशास्त्र के आचार्यों का मत, आचार्य वात्स्यायन का मत,
धनप्राप्ति के उपाय, वैशिक के धन की प्रशंसा, लूट का बहाना, अग्निकाण्ड या विनाश का
बहाना, स्वागत-सत्कार का खर्च, ऋण, प्रेमोपहार की विवशता, आवश्यक खर्चों में कटौती,
वैद्य और राजपुरुषों पर उपकार, मित्रों की सहायता, प्रिय वस्तु की बिक्री का बहाना, विशिष्ट
बर्तनों की माँग, नायक के प्रति कृतज्ञताज्ञापन, त्यागशीलता का दिखावा, बच्चों के समान
हठपूर्वक माँगना।
विरक्तप्रतिपत्तिप्रकरण—विरक्त के लक्षण, विरक्त पुरुष के कार्य, वेश्या के कार्य ।
निष्कासनक्रमप्रकरण—अकिञ्चन का निष्कासन, निष्कासन के प्रकट उपाय, सम्भोगकालीन
व्यवहार, बातें करने की रीति, अन्तिम उपाय, बाभ्रव्य का वैशिक, आचार्य दत्तक ने इतना ही
क्यों कहा ?।
चतुर्थ अध्याय १७१-१७६
विशीर्णप्रतिसन्धानप्रकरण—मिलने का कारण, विशीर्ण के विविध रूप — प्रथमः
दोनों ओर से स्वयं हटने वाला, द्वितीय : दोनों ओर से धक्के देकर निकाला गया, तृतीय यहाँ से
स्वयं निकाल वहाँ से निकाला गया, चतुर्थ : यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ जमा, पंचम : यहाँ से
निकाला गया और वहाँ से स्वयं हटा, षष्ठ : यहाँ से निकाला गया और वहाँ जमा, प्रथम—न
मिलाने योग्य नायक, द्वितीय—अधिक लाभ पर स्वीकार्य, निर्धन या दुष्ट का संसर्ग योग्य नहीं,
तृतीय—अधिक धन पर स्वीकार्य, चतुर्थ—विचारणीय, संसर्ग योग पक्ष, असंसर्ग योग्य पक्ष,
पंचम—विचारणीय, संसर्गयोग्य पक्ष, असंसर्गयोग्य पक्ष, षष्ठ—नायक का विचार, इसके
कारण, पूर्वकृत उपकारों से प्रेम की पहचान, पूर्वपरिचित की श्रेष्ठता, आचार्य वात्स्यायन का
मत, पूर्वसंसृष्ट (वियुक्त) के भेद, पुरुष का स्वभाव ही प्रमुख, प्रतिसंधान के कारण—
वियुक्तगत कारण, वर्तमानगत कारण, नायक को परामर्श, नायिका को परामर्श, समर्थ और
अनुरक्त को प्राथमिकता, वियुक्त को मिलाते समय ध्यातव्य बातें।

विषयानुक्रमणिका २१
पञ्चम अध्याय १७७-१८२
लाभविशेषप्रकरण—अपरिग्रह का कारण, एक रात की फीस, दूत भेजने की रीति,
अधिक लाभ की रीति, एक साथ आने वालों से अधिक लाभ, आचार्य वात्स्यायन का मत,
फीस का स्वरूप, समानता में प्राथमिकता, रागी से त्यागी की श्रेष्ठता, उपायों द्वारा रागी की
त्यागशीलता भी सम्भव, आचार्य वात्स्यायन का मत, निर्धन से धनवान् और त्यागशील से
कार्यसाधक श्रेष्ठ, आचार्य वात्स्यायन का मत, आवश्यकतानुसार विशिष्ट, कृतज्ञ और त्यागी,
त्यागी की न्यूनता, त्यागियों का स्वभाव, कृतज्ञ, रागी, त्यागी, कृतज्ञ : तीनों में विशेष,
मित्रवाक्य और अर्थप्राप्ति में प्राथमिकता, आचार्य वात्स्यायन का मत, मित्रों से अनुनय-विनय,
अर्थप्राप्ति और अनर्थनिवारण, आचार्य वात्स्यायन का मत, व्यवस्थाविषयक विचार, सिद्धान्त
का स्पष्टीकरण, उत्तम गणिका के लाभ, रूपाजीवा के लाभ, कुम्भदासी के लाभ, लाभ पर
आचार्यों का मत, आचार्य वात्स्यायन का मत, लाभ न लेने के स्थान, तत्काल लाभ के स्थान,
भविष्य में अल्प लाभ के स्थान, लाभ के स्थान, अग्राह्य पुरुष, ग्राह्य पुरुष, अर्थप्रयोजन वाले
नायक।
षष्ठ अध्याय १८२-१८९
अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारप्रकरण—अनर्थ की उत्पत्ति के कारण, इनके
दुष्परिणाम, उपाय का समुचित समय, अर्थत्रिवर्ग, अनर्थ-त्रिवर्ग, अनुबन्धस्वरूप, शुद्ध संशय,
संकीर्ण संशय, उभयतोयोग, समन्ततोयोग, दोनों त्रिवर्ग, अर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध,
अनुबन्धरहित अर्थ, अर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध, अनर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध,
अनुबन्धरहित अनर्थ, अनर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध, अर्थ और काम की सम्बन्ध योजना,
शुद्धसंशय : अर्थसंशय, धर्मसंशय, कामसंशय, अनर्थसंशय, अधर्मसंशय, द्वेषसंशय, संकीर्ण
संशय, विरुद्ध संकीर्ण—अर्थ और अनर्थ की संकीर्णता, धर्म और अधर्म की संकीर्णता, काम
और द्वेष की संकीर्णता, अविरुद्ध संकीर्ण—श्वेतकेतु के उभयतोयोग—उभयतः अर्थ योग,
उभयतः अनर्थयोग, उभयतः अर्थसंशय, उभयतः अनर्थसंशय, बाभ्रवीयों के उभयतो योग,
उभयतः अर्थयोग, उभयतः अर्थसंशय, उभयतः अनर्थसंशय, उभयतः संकीर्ण योग, विवेचन
का प्रयोजन, अवशिष्टों के शुद्ध, संकीर्ण और संश्लिष्ट, उभयतो योगों का समष्टिविचार,
समन्ततोयोग—गोष्ठीपरिग्रह, समन्ततो योग में वेश्या का कर्तव्य, स्पर्धा का कारण, लाभनिर्देश,
वेश्याभेद, उपसंहार, महर्षि से मतभेद, वेश्या का स्वरूप, वैशिक को परामर्श।
७. औपनिषदिक नामक सप्तम अधिकरण
प्रथम अध्याय १८९-१९६
सुभगंकरणादिप्रकरण—सुभगंकरण योग, सौन्दर्यवर्धक योग, सुभगंकर काजल,
सुभगंकर तैल, सुभगंकर माला, सुभगंकर चटनी, सुभगंकर लेप, सुभगंकर यन्त्रधारण,
परिचारिका का सौभाग्यवर्धन, वेश्यापुत्री के विवाह की रीति, वेश्यापुत्री का कर्तव्य, रसिकों
का दर्शन, पाणिग्रहण, विना धन मिले भी प्रदर्शन, धन वसूलने की रीति, प्राच्य देशों की

१. साधारण अधिकरण (त्रिवर्ग प्रतिपत्ति, ६४ कलाएँ, नागरक-वृत्त व सखी-दूत विचार)

२२ वात्स्यायन-कामसूत्र
वेश्याओं की रीति, एक वर्ष तक पत्नीव्रत का निर्वाह, निमन्त्रण पर उपस्थिति आवश्यक,
अभिनेत्री कन्याओं के विवाह की रीति, वैशिष्ट्यकथन।
वशीकरणप्रकरण—वशीकरण लेप, वशीकरण चूर्ण, वशीकरण स्नान, शिश्नलेप,
वांछित कन्या से विवाह की रीति, देवकान्त अनुलेप, गन्धर्वकान्त अनुलेप, नागकान्त अनुलेप,
पुण्य अञ्जन।
वृष्ययोग (वाजीकरण) प्रकरण—वाजीकरण का आशय, उच्चटा और मुलहटी,
मेढ़ा और बकरे का अण्डकोश, विदारीकन्द, वंशलोचन और क्रौंच, चिरौंजी, मुहार और श्वेत
विदारी, क्षीरकाकोली, सिंघाड़ा, कसेरू और महुआ, उड़द की दाल की खीर, विदारीकन्द और
क्रौंच की पूड़ियाँ, गौरैया के अण्डों से भावित खीर, उक्त रीति से भावित तिलों की खीर,
मुलहठी आदि का षडंग अमृतं, शतावरी और गोखरू, शतावरी, गोखरू और श्रीपर्णी, गोखरू
और जौ, उपसंहार, अग्राह्य योग, ग्राह्य योग।
द्वितीय अध्याय १९६-२०३
नष्टरागप्रत्यानयनप्रकरण—समागम के प्रयोजन, चण्डवेग का प्रसादन, नष्टराग की
वापसी का उपाय, अपद्रव्यों का प्रयोग, बाभ्रवीय मत, आचार्य वात्स्यायन का मत, चूड़क,
एकचूड़क, कंचुक या जालक, छेदनकर्म, छेदनविधि, शोधन, छिद्रवर्धन, व्रणशोधन, अपद्रव्यों
का रूप।
वर्धनयोगप्रकरण—वर्धन योग।
चित्रयोगप्रकरण—कन्यामोहन, रागनाशन विधि, योनिसंकोचन, योनिविस्तार, बाल
सफेद करना, बाल काले करना, होंठ सफेद करना, होंठ लाल करना, मोहक वंशी, पागल
बनाना, अच्छा करना, अदृश्य करना, पानी को दूध के समान सफेद करना, लोहे को ताँबे के
समान करना, लकड़ियों का सर्प दिखाना, यश और आयुर्वर्धक दूध, ब्राह्मणों का आशीर्वाद
सदैव हितकर, उपसंहार, शास्त्र का उद्देश्य रागोद्दीपन नहीं, अशिष्टसम्मत योग प्रयोज्य नहीं,
शास्त्रीय ग्रन्थ, निर्माण की अवस्था और प्रयोजन, कामतत्त्वज्ञ कामुक नहीं होता, सिद्धि के लिये
रागात्मकता का अभाव आवश्यक॥
साम्प्रयोगिक आसनों के कतिपय चित्र २०५-२१८

॥ श्रीः ॥
वात्स्यायन-कामसूत्र
१.
साधारण नामक प्रथम अधिकरण
प्रथम अध्याय
शास्त्रसंग्रह
धर्मार्थकामेभ्यो नमः ॥ १ ॥
मङ्गलाचरण—धर्म, अर्थ और काम को नमस्कार है ॥ १ ॥
शास्त्रे प्रकृतत्वात् ॥ २ ॥
(क्योंकि) इस शास्त्र में मूलतः धर्म, अर्थ और काम का ही उपदेश किया गया है,
अतएव उन्हें ही नमस्कार किया गया ॥ २ ॥
तत्समयावबोधकेभ्यश्चाचार्येभ्यः ॥ ३ ॥
और जिन आचार्यों ने धर्म, अर्थ और कामशास्त्र के तत्त्व को समझाने के लिये तद्विषयक
ग्रन्थ लिखे हैं, उन्हें भी नमस्कार है ॥ ३ ॥
तत्सम्बन्धात् ॥ ४ ॥ इति ॥
त्रिवर्ग से सम्बद्ध ग्रन्थों की रचना करने वाले आचार्यों को नमस्कार करने का कारण यह
है कि उन के ग्रन्थों से संग्रह कर इस 'कामसूत्र' की रचना कर रहे हैं, अतएव उपजीव्य ग्रन्थों
के रचयिताओं के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन भी आवश्यक है ॥ ४ ॥
प्रजापतिर्हि प्रजाः सृष्ट्वा तासां स्थितिनिबन्धनं त्रिवर्गस्य साधनमध्यायानां
शतसहस्रेणाग्रे प्रोवाच ॥ ५ ॥
कामशास्त्र की प्राचीनता—प्रजापति ने प्रजाओं की सृष्टि कर त्रिवर्ग के साधनभूत
शास्त्र का, जो उनकी स्थिति का कारण या व्यवस्थित जीवन का संविधान है, एक लाख
अध्यायों में प्रवचन किया था ॥ ५ ॥
तस्यैकदेशिकं मनुः स्वायम्भुवो धर्माधिकारिकं पृथक् चकार ॥ ६ ॥
प्रजापति ब्रह्मा द्वारा रचित उस शास्त्र के धर्मशास्त्रविषयक अंश को स्वयंभू के पुत्र मनु ने
पृथक् कर लिया ॥ ६ ॥
बृहस्पतिरर्थाधिकारिकम् ॥ ७ ॥
बृहस्पति ने अर्थशास्त्रविषयक अंश को पृथक् किया ॥ ७ ॥
महादेवानुचरश्च नन्दी सहस्रेणाध्यायानां पृथक् कामसूत्रं प्रोवाच ॥ ८ ॥
कामशास्त्र की परम्परा—महादेव के अनुचर नन्दी ने प्रजापति ब्रह्मा के उस शास्त्र से

२ वात्स्यायन-कामसूत्र
एक सहस्र अध्याय वाले कामसूत्र को पृथक् कर कहा, अर्थात् एक सहस्र अध्यायों में उसका
स्वतन्त्र एवं विशद विवेचन किया ॥ ८ ॥
तदेव तु पञ्चभिरध्यायशतैरुद्दालकिः श्वेतकेतुः सञ्चिक्षेप ॥ ९ ॥
महर्षि उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु ने नन्दिकेश्वर के उस कामसूत्र को पाँच सौ अध्यायों में
संक्षिप्त करके निरूपित किया ॥ ९ ॥
तदेव तु पुनरर्ध्यर्धेनाध्यायशतेन साधारण-साम्प्रयोगिक-कन्यासम्प्रयुक्तक-
भार्याधिकारिक-पारदारिक-वैशिक-औपनिषदिकैः सप्तभिरधिकरणैर्बाभ्रव्यः
पाञ्चालः सञ्चिक्षेप ॥ १० ॥
इसके पश्चात् पांचाल देश के निवासी बभ्रु के पुत्र बाभ्रव्य ने श्वेतकेतु के पाँच सौ अध्याय
वाले कामसूत्र को साधारण, साम्प्रयोगिक, कन्यासम्प्रयुक्तक, भार्याधिकारिक, पारदारिक,
वैशिक और औपनिषदिक—इन सात अधिकरणों में विभक्त कर, एक सौ पचास अध्यायों में
संक्षिप्त किया ॥ १० ॥
तस्य षष्ठं वैशिकमधिकरणं पाटलिपुत्रिकाणां गणिकानां नियोगाद् दत्तकः
पृथक् चकार ॥ ११ ॥
पटना की वेश्याओं के अनुरोध पर, आचार्य दत्तक ने बाभ्रव्य द्वारा संक्षिप्त किये गये
कामशास्त्र के षष्ठ भाग—वैशिक अधिकरण को पृथक् किया (अर्थात् उसका स्वतन्त्र विवेचन
किया) ॥ ११ ॥
तत्प्रसङ्गात् चारायणः साधारणमधिकरणं पृथक् प्रोवाच। सुवर्णनाभः
साम्प्रयोगिकम्। घोटकमुखः कन्यासम्प्रयुक्तकम्। गोनर्दीयो भार्याधिकारिकम्।
गोणिकापुत्रः पारदारिकम्। कुचुमार औपनिषदिकमिति ॥ १२ ॥
(जिस प्रकार बाभ्रव्य के संक्षिप्त कामशास्त्र से आचार्य दत्तक ने वैशिक अधिकरण का
स्वतन्त्र विवेचन किया, उसी प्रकार) विशेष प्रयोजनवश चारायण ने साधारण अधिकरण,
सुवर्णनाभ ने साम्प्रयोगिक अधिकरण, घोटकमुख ने कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण, गोनर्द देश के
निवासी गोनर्दीय ने भार्याधिकारिक अधिकरण, गोणिकापुत्र ने पारदारिक अधिकरण और
कुचुमार ने औपनिषदिक अधिकरण का स्वतन्त्र विवेचन किया ॥ १२ ॥
एवं बहुभिराचार्यैस्तच्छास्त्रं खण्डशः प्रणीतमुत्सन्नकल्पमभूत् ॥ १३ ॥
कामशास्त्र बनाने का प्रयोजन—इस प्रकार बाभ्रव्यरचित वह शास्त्र विभिन्न आचार्यों
द्वारा विभिन्न खण्डों में पृथक् पृथक् लिखे जाने के कारण बिखर-सा गया ॥ १३ ॥
तत्र दत्तकादिभिः प्रणीतानां शास्त्रावयवानामेकदेशत्वात् महदिति च
बाभ्रवीयस्य दुरध्येयत्वात् संक्षिप्य सर्वमर्थमल्पेन ग्रन्थेन कामसूत्रमिदं
प्रणीतम् ॥ १४ ॥
क्योंकि दत्तक आदि आचार्यों ने पृथक्-पृथक् अधिकरणों को लेकर अपने ग्रन्थों की
रचना की थी, फलतः वे समस्त शास्त्र के अंशमात्र थे और आचार्य बाभ्रव्य का शास्त्र
साङ्गोपाङ्ग, किन्तु विशाल होने के कारण दुरध्येय (जिसका कठिनता से अध्ययन किया जा

१. साधारण अधिकरण ३
सके) था, अतएव बाभ्रव्य के उस विशाल शास्त्र को संक्षिप्त कर, एक संक्षिप्त एवं पूर्ण इस
'कामसूत्र' की रचना की गयी है ॥ १४ ॥
तस्यायं प्रकरणाधिकरणसमुद्देशः ॥ १५ ॥
इस 'कामसूत्र' के प्रकरण, अधिकरण और समुद्देश की सूची इस प्रकार है ॥ १५ ॥
शास्त्रसंग्रहः। त्रिवर्गप्रतिपत्तिः। विद्यासमुद्देशः। नागरकवृत्तम्। नायक-
सहायदूतीकर्मविमर्शः। इति साधारणं प्रथमाधिकरणम्। अध्यायाः पञ्च।
प्रकरणानि पञ्च ॥ १६ ॥
'कामसूत्र' की विषयवस्तु—'साधारण' नामक प्रथम अधिकरण है, इसमें पाँच
अध्याय और पाँच ही प्रकरण हैं—(१) शास्त्रसंग्रह, (२) त्रिवर्गप्रतिपत्ति, (३) विद्यासमुद्देश,
(४) नागरकवृत्त और (५) नायकसहायदूतीकर्मविमर्श ॥ १६ ॥
प्रमाणकालाभावेभ्यो रतावस्थापनम्। प्रीतिविशेषाः। आलिङ्गनविचाराः।
चुम्बनविकल्पाः। नखरदनजातयः। दशनच्छेद्यविधयः। वेश्या-उपचाराः।
संवेशनप्रकाराः। चित्ररतानि। प्रहणनयोगाः। तद्युक्ताश्च। सीत्कृतोपक्रमाः।
पुरुषायितम्। पुरुषोपसृप्तानि। औपरिष्टकम्। रतारम्भावसानिकम्। रतविशेषाः।
प्रणयकलहः। इति साम्प्रयोगिकं द्वितीयमधिकरणम्। अध्याया दश। प्रकरणानि
सप्तदश ॥ १७ ॥
'साम्प्रयोगिक' नामक द्वितीय अधिकरण है, इसमें दश अध्याय और सत्रह प्रकरण हैं—
(१) प्रमाण, काल और भावों के अनुरूप रमण (सम्भोग) की व्यवस्था, (२) प्रीतिविशेष या
प्रीतिवर्णन, (३) आलिङ्गनविचार, (४) चुम्बनप्रकार, (५) नखक्षतप्रकार, (६) दन्त-
क्षतप्रकार, (७) विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित बाह्योपचार सम्बन्धी परम्पराएँ, (८) सम्भोग-
विधियाँ (९) विचित्र रत, (१०) प्रहणनप्रकार, (११) सीत्कार, (१२) पुरुषायित या विपरीत
रति, (१३) पुरुषोपसृप्त या पुरुष का निकट आना (सम्भोग से पूर्व की छेड़छाड़),
(१४) औपरिष्टक (मुखमैथुन), (१५) सम्भोग के समारम्भ और समापन के कर्तव्य,
(१६) रतविशेष और (१७) प्रणयकलह।
वरणविधानम्। सम्बन्धनिर्णयः। कन्याविस्रम्भणम्। बालाया उपक्रमाः।
इङ्गिताकारसूचनम्। एकपुरुषाभियोगः। प्रयोज्यस्योपावर्तनम्। अभियोगतश्च
कन्यायाः प्रतिपत्तिः विवाहयोगः। इति कन्यासम्प्रयुक्तकं तृतीयाधिकरणम्।
अध्यायाः पञ्च। प्रकरणानि नव ॥ १८ ॥
'कन्यासम्प्रयुक्तक' नामक तृतीय अधिकरण है, इसमें पाँच अध्याय और नौ प्रकरण
हैं—(१) कन्यावरण, (२) विवाह-सम्बन्ध का निर्णय, (३) कन्याविस्रम्भण—कन्या में
विश्वास जगाना, (४) कन्या में प्रेमोत्पत्ति, (५) इंगित और आकारविषयक सूचनाएँ, (६)
ईप्सित कन्या से विवाह करने का प्रयत्न, (७) कन्या द्वारा मनोवाञ्छित को आकर्षित करना,
(८) अपने प्रेमी की अभियोगों द्वारा प्राप्ति और (९) विवाह-सम्बन्ध ॥ १८ ॥
एकचारिणीवृत्तम्। प्रवासचर्या। सपत्नीषु ज्येष्ठावृत्तम्। कनिष्ठावृत्तम्।

४ वात्स्यायन-कामसूत्र
पुनर्भूवृत्तम्। दुर्भगावृत्तम्। आन्तःपुरिकम्। पुरुषस्य बह्वीषु प्रतिपत्तिः। इति
भार्याधिकारिकं चतुर्थमधिकरणम्। अध्यायो द्वौ। प्रकरणाण्यष्टौ ॥ १९ ॥
'भार्याधिकारिक' नामक चतुर्थ अधिकरण है, इसमें दो अध्याय और आठ
प्रकरण हैं—(१) पतिपरायणा पत्नी के कर्तव्य, (२) पति के बाहर जाने पर पत्नी के
कर्तव्य, (३) सपत्नियों में ज्येष्ठा का कनिष्ठा के प्रति व्यवहार, (४) सपत्नियों में कनिष्ठा का
ज्येष्ठा के प्रति व्यवहार, (५) पुनर्विवाहित पत्नी का व्यवहार, (६) दुर्भाग्यशालिनी पत्नी का
पति एवं सपत्नियों के प्रति व्यवहार, (७) अन्तःपुर के प्रति कर्तव्य और (८) पुरुष का अनेक
पत्नियों के प्रति कर्तव्य ॥ १९ ॥
स्त्री-पुरुषशीलावस्थापनम्। व्यावर्तनकारणानि। स्त्रीषु सिद्धाः पुरुषाः।
अयत्नसाध्या योषितः। परिचयकारणानि। अभियोगाः। भावपरीक्षा। दूतीकर्माणि।
ईश्वरकामितम्। अन्तःपुरिकं दाररक्षितकम्। इति पारदारिकं पञ्चममधिकरणम्।
अध्यायाः षट्। प्रकरणाणि दश ॥ २० ॥
'पारदारिक' नामक पञ्चम अधिकरण है, इसमें छह अध्याय और दश प्रकरण हैं—
(१) स्त्री-पुरुष के स्वभाव की विवेचना, (२) परपुरुष-सम्बन्ध में अवरोध उत्पन्न करने के
कारण, (३) परनारी को वशीभूत करने में सिद्ध पुरुष, (४) अनायास साध्य स्त्रियाँ,
(५) परिचय बनाने के उपाय, (६) अभियोग, (७) भावों की परीक्षा, (८) दूतीकर्म,
(९) ऐश्वर्यशाली पुरुषों की इच्छा पूरी करने के उपाय और (१०) अन्तःपुर में प्रवेश और
व्यभिचारी एवं दुष्ट पुरुषों से अपनी स्त्रियों की रक्षा ॥ २० ॥
गम्यचिन्ता। गमनकारणानि। उपावर्तनविधिः। कान्तानुवर्तनम्।
अर्थागमोपायाः। विरक्तलिङ्गानि। विरक्तप्रतिपत्तिः। निष्कांसनप्रकाराः।
विशीर्णप्रतिसन्धानम्। लाभविशेषः। अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारः। वेश्या-
विशेषाश्च। इति वैशिकं षष्ठमधिकरणम्। अध्यायाः षट्। प्रकरणाणि द्वादश ॥ २१ ॥
'वैशिक' नामक षष्ठ अधिकरण है, इसमें छह अध्याय और बारह प्रकरण हैं—
(१) गम्यपुरुष-चिन्तन, (२) सम्भोग के कारण, (३) अपनी ओर आकृष्ट करने की विधि,
(४) अपने प्रेमी के साथ पत्नी के समान आचरण, (५) अर्थार्जन के उपाय, (६) विरक्त पुरुष
के चिह्न, (७) विरक्त पुरुष की पुनः प्राप्ति, (८) निष्कासन के उपाय, (९) निष्कासित का
प्रतिसन्धान, (१०) विशेष लाभ की युक्ति, (११) अर्थानर्थपरक अनुबन्ध और संशय-सम्बन्धी
विचार और (१२) वेश्याओं के विभिन्न प्रकार ॥ २१ ॥
सुभगङ्करणम्। वशीकरणम्। वृष्याश्च योगाः। नष्टरागप्रत्यानयनम्।
वृद्धिविधयः। चित्राश्च योगाः। इत्यौपनिषदिकं सप्तममधिकरणम्। अध्यायो द्वौ।
प्रकरणाणि षट् ॥ २२ ॥
'औपनिषदिक' नामक सप्तम अधिकरण है, इसमें दो अध्याय और छह प्रकरण हैं—
(१) रूप, गुण, आयु आदि सौभाग्य-प्राप्ति के उपाय, (२) यन्त्र, मन्त्र और तन्त्र से वश में

१. साधारण अधिकरण ५
करना, (३) वाजीकरण के योग, (४) नष्टराग का पुनः उत्पादन, (५) सम्भोग-साधन की
वृद्धि के उपाय और (६) कुछ विचित्र अलौकिक योग ॥ २२ ॥
एवं षट्त्रिंशदध्यायाः। चतुःषष्टिः प्रकरणानि। अधिकरणानि सप्त। सपादं
श्लोकसहस्रम्। इति शास्त्रस्य संग्रहः ॥ २३ ॥
इस प्रकार इस 'कामसूत्र' में छत्तीस अध्याय, चौंसठ प्रकरण, सात अधिकरण और एक
हजार दो सौ पचास श्लोक हैं। इस प्रकार शास्त्रसंग्रह, विषयवस्तु (का सामान्य उल्लेख) समाप्त
हुआ ॥ २३ ॥
संक्षेपमिममुक्त्वास्य विस्तरोऽतः प्रवक्ष्यते।
इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासभाषणम् ॥ २४ ॥
इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे साधारणे प्रथमेऽधिकरणे
शास्त्रसंग्रहः प्रथमोऽध्यायः।
इस शास्त्र के संक्षिप्त उल्लेख—अधिकरण, अध्याय और प्रकरणों के नामोल्लेख को
कहकर, अब उसे विस्तारपूर्वक कहा जा रहा है, क्योंकि लोक में विद्वानों को संक्षेप और
विस्तार दोनों की इच्छा होती है ॥ २४ ॥
प्रथम अधिकरण में शास्त्रसंग्रह नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न॥
द्वितीय अध्याय
त्रिवर्गप्रतिपत्ति
शतायुर्वै पुरुषो विभज्य कालमन्योन्यानुबद्धं परस्परस्यानुपघातकं त्रिवर्गं
सेवेत ॥ १ ॥
कालविभाग—शतंजीवी विचारशील मनुष्य को चाहिये कि अपने जीवन को आश्रमों
में विभक्त कर धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों का इस प्रकार सेवन करे कि ये एक दूसरे से
सम्बद्ध भी रहें और परस्पर अनिष्टकर भी न हों ॥ १ ॥
बाल्ये विद्याग्रहणादीनर्थान् ॥ २ ॥
अवस्थानुरूप कालविभाग—बाल्यावस्था में विद्योपार्जन आदि बाल्योचित अर्थों का
सेवन करना चाहिये ॥ २ ॥
कामं च यौवने ॥ ३ ॥
युवावस्था में काम का सेवन करना चाहिये ॥ ३ ॥
स्थाविरे धर्मं मोक्षं च ॥ ४ ॥
वृद्धावस्था में धर्म और मोक्ष का सेवन करना चाहिये ॥ ४ ॥
अनित्यत्वादायुषो यथोपपादं वा सेवेत ॥ ५ ॥

६ वात्स्यायन-कामसूत्र
अथवा जीवन की अनित्यता के कारण जिस समय भी जो सम्भव हो उसका ही सेवन
करना चाहिये ॥ ५ ॥
ब्रह्मचर्यमेव त्वा विद्याग्रहणात् ॥ ६ ॥
ब्रह्मचर्यपालन—विद्योपार्जन काल में ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है ॥ ६ ॥
अलौकिकत्वाददृष्टार्थत्वादप्रवृत्तानां यज्ञादीनां शास्त्रात् प्रवर्त्तनम्, लौकिक-
त्वाद् दृष्टार्थत्वाच्च प्रवृत्तेभ्यश्च मांसभक्षणादिभ्यः शास्त्रादेव निवारणं धर्मः ॥ ७ ॥
धर्म का स्वरूप और उसका उपाय—अलौकिक एवं फल के अदृष्ट होने से यज्ञादि में
स्वभावतः प्रवृत्त न होने वाले मनुष्य का शास्त्र के आदेश से प्रवृत्त होना तथा लौकिक एवं प्रत्यक्ष
फल वाला होने के कारण मांस-भक्षणादि कार्यों में प्रवृत्त मनुष्य का शास्त्र के आदेश से निवृत्त
होना—यह प्रवृत्ति और निवृत्ति रूप द्विविध धर्म है ॥ ७ ॥
तं श्रुतेर्धर्मज्ञसमवायाच्च प्रतिपद्येत ॥ ८ ॥
धर्म के विषय में शास्त्र ही प्रमाण क्यों मानते हो?—उस धर्म को विद्वान् लोग वेद के
अध्ययन से और साधारण लोग धर्मज्ञ पुरुषों से जान लें ॥ ८ ॥
विद्याभूमिहिरण्यपशुधान्यभाण्डोपस्करमित्रादीनामर्जनमर्जितस्य विवर्धन-
मर्थः ॥ ९ ॥
अर्थ का स्वरूप और उसका उपाय—विद्या, भूमि, हिरण्य (स्वर्ण), पशु, धान्य,
बर्तनादि गृह-उपकरण, मित्रों आदि का सम्पादन करना तथा अर्जित को बढ़ाना ही अर्थ
कहलाता है ॥ ९ ॥
तमध्यक्षप्रचाराद्वार्तासमयविद्भ्यो वणिग्भ्यश्चेति ॥ १० ॥
उस अर्थ को अध्यक्षप्रचार (स्वयं दर्शन) से, कृषि-वाणिज्य आदि के तत्त्वज्ञों से और
व्यापारियों से जानना चाहिये ॥ १० ॥
श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानामात्मसंयुक्तेन मनसाधिष्ठितानां स्वेषु स्वेषु
विषयेष्वानुकूल्यतः प्रवृत्तिकामः ॥ ११ ॥
काम का स्वरूप और उसका उपाय—आत्मा से संयुक्त हुए मन से अधिष्ठित श्रोत्र
(कान), त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की अपने अपने विषय—
क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—में अनुकूल प्रवृत्ति को काम कहते हैं ॥ ११ ॥
स्पर्शविशेषविषयात्त्वस्याभिमानिकसुखानुविद्धा फलवत्यर्थप्रतीतिः
प्राधान्यात् कामः ॥ १२ ॥
चुम्बनादि के प्रासङ्गिक सुख के साथ, परस्पर स्तन, नितम्ब आदि विशेष अङ्गों के स्पर्श
से आनन्द की जो फलवती प्रतीति होती है, उसे काम कहते हैं ॥ १२ ॥
तं कामसूत्रान्नागरिकजनसमवायाच्च प्रतिपद्येत ॥ १३ ॥
उस काम-विषयक ज्ञान को ‘कामसूत्र’ से तथा सम्भ्रान्त नागरिकों से सीखना
चाहिये ॥ १३ ॥

१. साधारण अधिकरण ७
एषां समवाये पूर्वः पूर्वो गरीयान् ॥ १४ ॥
धर्म, अर्थ और काम के समुदाय में उत्तर से पूर्व पूर्व श्रेष्ठ है, अर्थात् काम से अर्थ श्रेष्ठ हैं
और अर्थ से धर्म श्रेष्ठ है ॥ १४ ॥
अर्थश्च राज्ञः। तन्मूलत्वाल्लोकयात्रायाः। वेश्यायाश्चेति त्रिवर्गप्रति-
पत्तिः ॥ १५ ॥
राजा के लिए धर्म और काम की अपेक्षा अर्थ ही बड़ा है, क्योंकि उसकी लोकयात्रा का
मूल धन ही हैं। वेश्या के लिए भी अर्थ ही बड़ा है। इस प्रकार त्रिवर्ग की प्रतिपत्ति (प्राप्ति) पूर्ण
हुई ॥ १५ ॥
धर्मस्यालौकिकत्वात् तदभिधायकं शास्त्रं युक्तम्; उपायपूर्वकत्वादर्थसिद्धेः।
उपायप्रतिपत्तिः शास्त्रात् ॥ १६ ॥
धर्मादि की प्रतिपत्ति — धर्म अलौकिक हैं, इसलिये उसके स्वरूप का बोध कराने वाले
शास्त्र का होना युक्तिसङ्गत भी है और आवश्यक भी। अर्थ की सिद्धि भी उपायों से ही होती है,
अतएव इन उपायों को बताने वाले अर्थशास्त्र की भी आवश्यकता है ॥ १६ ॥
तिर्यग्योनिष्वपि तु स्वयं प्रवृत्तत्वात् कामस्य नित्यत्वाच्च न शास्त्रेण
कृत्यमस्तीत्याचार्याः ॥ १७ ॥
कामशास्त्र की आवश्यकता — पशु-पक्षियों में भी काम की स्वतः प्रवृत्ति पायी जाती
है तथा यह नित्य (अविनाशी) है, अतः इसे सिखाने के लिये शास्त्र की आवश्यकता नहीं है—
ऐसा कुछ आचार्यों का मत है ॥ १७ ॥
सम्प्रयोगपराधीनत्वात् स्त्रीपुंसयोरुपायमपेक्षते ॥ १८ ॥
सम्भोग में स्त्री-पुरुष के पराधीन होने के कारण, उन्हें पराधीनता से बचने के लिये
शास्त्ररूप उपाय की आवश्यकता होती है ॥ १८ ॥
सा चोपायप्रतिपत्तिः कामसूत्रादिति वात्स्यायनः ॥ १९ ॥
दाम्पत्य जीवन को सफल बनाने वाले उपायों का परिज्ञान कामसूत्र से ही होता है—ऐसा
महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ १९ ॥
तिर्यग्योनिषु पुनरनावृतत्वात् स्त्रीजातेश्च, ऋतौ यावदर्थं प्रवृत्तेरबुद्धिपूर्वक-
त्वाच्च प्रवृत्तीनामनुपायः प्रत्ययः ॥ २० ॥
मनुष्यों में शास्त्ररूपी उपाय की आवश्यकता क्यों है? — पशु-पक्षियों में स्त्री जाति
अनावृत—स्वतन्त्र, बन्धनरहित एवं आवरणरहित रहती है, ऋतुकाल में ही उनकी सोद्देश्य
प्रवृत्ति होती है, और यह प्रवृत्ति बुद्धिपूर्वक नहीं होती, अतः उनका सहज धर्म किसी शास्त्ररूपी
उपाय की आवश्यकता नहीं रखता ॥ २० ॥
न धर्मांश्चरेत्; एष्यत्फलत्वात्। सांशयिकत्वाच्च ॥ २१ ॥
त्रिवर्ग के आचरण की आवश्यकता पर शंका — क्योंकि धर्म का फल भविष्य में
मिलने वाला (अनिश्चित) होता है, अतः धर्मों का आचरण नहीं करना चाहिये। उनके फल
मिलने में भी संशय रहता है ॥ २१ ॥

८ वात्स्यायन-कामसूत्र
को ह्यबालिशो हस्तगतं परगतं कुर्यात् ॥ २२ ॥
लोकरीति—कौन ऐसा मूर्ख होगा जो हस्तगत पदार्थ को दूसरे से हाथ सौंपेगा ॥ २२ ॥
वरमद्य कपोतः श्वो मयूरात् ॥ २३ ॥
कल मिलने वाले मयूर से आज मिलने वाला कबूतर अच्छा है ॥ २३ ॥
वरं सांशयिकान्निष्कादसांशयिकः कार्षापणः । इति लौकायतिकाः ॥ २४ ॥
पारस्परिक असहमति के द्वितीय हेतु की लोकप्रसिद्धि बताते हैं—सन्दिग्ध निष्क
(स्वर्णमुद्रा) की अपेक्षा असन्दिग्ध कार्षापण (ताम्रमूद्रा या ताँबे का सिक्का) का लाभ अधिक
अच्छा है—ऐसा लौकायतिकों (लोकायत अर्थात् नास्तिक दर्शन के अनुयायी लोगों) का
मत है ॥ २४ ॥
शास्त्रस्यानभिशङ्क्यत्वादभिचारानुव्याहारयोश्च क्वचित्फलदर्शनान्नक्षत्रचन्द्र-
सूर्यताराग्रहचक्रस्य लोकार्थं बुद्धिपूर्वकमिव प्रवृत्तेर्दर्शनाद् वर्णाश्रमाचार-
स्थितिलक्षणत्वाच्च लोकयात्राया हस्तगतस्य च बीजस्य भविष्यतः सस्यार्थे
त्यागदर्शनाच्चरेद्धर्मानिति वात्स्यायनः ॥ २५ ॥
धर्म पर की गयी शंकाओं का उत्तर—क्योंकि—(१) धर्म का उपदेश करने वाले
शास्त्र (वेद, स्मृति आदि) अपौरुषेय (ईश्वरकृत या मन्त्रद्रष्टा ऋषियों द्वारा प्रणीत) हैं, इसलिये
उनमें शंका नहीं की जा सकती, वे निश्चय ही सत्य है।
(२) कहीं शास्त्रों द्वारा निर्देशित अभिचार कर्मों, शान्ति एवं पुष्टिवर्धक कर्मों का फल भी
स्पष्ट देखा जाता है।
(३) नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, तारागण एवं ग्रहचक्रों की लोकहित में बुद्धिपूर्वक के समान
प्रवृत्ति देखी जाती है।
(४) वर्ण एवं आश्रम व्यवस्था एवं उनके समस्त करणीय कर्मों का प्रतिपादन धर्म में ही
किया गया है।
(५) लोकयात्रा में हस्तगत बीज को भविष्य में उत्पन्न होने वाले अन्न के लिये भावी
उत्पादन (फसल) हेतु छोड़ दिया जाता है।
अतएव धर्म का आचरण अवश्य करना चाहिये—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत
है ॥ २५ ॥
नार्थांश्चरेत् । प्रयत्नतोऽपि ह्येतेऽनुष्ठीयमाना नैव कदाचित् स्युः, अननुष्ठीयमाना
अपि यदृच्छया भवेयुः ॥ २६ ॥
अर्थार्जन के लिए प्रयत्न नहीं करना चाहिये, क्योंकि कभी अर्थ प्रयत्न करने पर भी तो
प्राप्त नहीं होता, और कभी बिना प्रयत्न के भी अकस्मात् प्राप्त हो जाता है ॥ २६ ॥
तत्सर्वं कालकारितमिति ॥ २७ ॥
क्या यह पूर्वकृत है ? नहीं; यह सब काल के अधीन है ॥ २७ ॥
काल एव हि पुरुषानर्थानर्थयोर्जयपराजययोः सुखदुःखयोश्च स्थाप-
यति ॥ २८ ॥

१. साधारण अधिकरण ९
काल ही मनुष्यों को अर्थ और अनर्थ में, जय और पराजय में तथा सुख और दुःख में
स्थापित करता है ॥ २८ ॥
कालेन बलिरिन्द्रः कृतः । कालेन व्यपरोपितः । काल एव पुनरप्येनं कर्तेति
कालकारणिकाः ॥ २९ ॥
काल ने बलि को इन्द्र बनाया, काल ने ही उसे अपदस्थ किया और वही सम्भवतः उसे
फिर इन्द्र बना दे—ऐसा काल को ही सब कुछ का कारण मानने वाले आचार्य कहते हैं ॥ २९ ॥
पुरुषकारपूर्वकत्वात् सर्वप्रवृत्तीनामुपायः प्रत्ययः ॥ ३० ॥
सम्पूर्ण प्रवृत्तियाँ पुरुषार्थ से सम्पन्न होती हैं, अतः उनके उपाय का जानना आवश्यक
है ॥ ३० ॥
अवश्यं भाविनोऽप्यर्थस्योपायपूर्वकत्वादेव। न निष्कर्मणो भद्रमस्तीति
वात्स्यायनः ॥ ३१ ॥
अवश्यम्भावी कार्यों की भी उपायपूर्वक ही सिद्धि होने से स्पष्ट है कि अकर्मण्य पुरुष का
कल्याण नहीं होता—ऐसा वात्स्यायन का मत है ॥ ३१ ॥
न कामाँश्चरेत्। धर्मार्थयोः प्रधानयोरेवमन्येषां च सतां प्रत्यनीकत्वात्। अनर्थ-
जनसंसर्गमसद्व्यवसायमशौचमनायतिं चैते पुरुषस्य जनयन्ति ॥ ३२ ॥
काम का आचरण नहीं करना चाहिये, क्योंकि यह प्रधान पुरुषार्थ धर्म और अर्थ के तथा
सज्जनों के विरुद्ध है। यह मनुष्य में अनर्थकारी लोगों का संसर्ग, असत् कर्म, अपवित्रता और
प्रभावहीनता (पराक्रम एवं यश का अभाव) उत्पन्न करता है ॥ ३२ ॥
तथा प्रमादं लाघवमप्रत्ययमग्राह्यतां च ॥ ३३ ॥
और यह काम प्रमाद, चञ्चलता और अविश्वास को उत्पन्न करता है तथा कामी व्यक्ति
सभी के लिये अग्राह्य हो जाता है अर्थात् सभी लोग उससे बचने लगते हैं ॥ ३३ ॥
बहवश्च कामवशगाः सगणा एवं विनष्टाः श्रूयन्ते ॥ ३४ ॥
और यह भी सुना जाता है कि बहुत से व्यक्ति काम के वशीभूत होकर सपरिवार नष्ट हो
गये ॥ ३४ ॥
यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मणकन्यामभिमन्यमानः सबन्धुराष्ट्रो
विननाश ॥ ३५ ॥
जैसे भोजवंशीय दाण्डक्य नामक राजा काम के वशीभूत होकर ब्राह्मण-कन्या को
कामतृप्ति का साधन मानने के कारण अपने बन्धु-बान्धव और राष्ट्र सहित नष्ट हो गया ॥ ३५ ॥
देवराजश्चाहल्यामतिबलश्च कीचको द्रौपदीं रावणश्च सीतामपरे चान्ये च
बहवो दृश्यन्ते कामवशगा विनष्टा इत्यर्थचिन्तकाः ॥ ३६ ॥
देवराज इन्द्र अहल्या के गमन से, महाबली कीचक द्रौपदी की और रावण सीता की
कामना में नष्ट हुआ। इनके अतिरिक्त भी अनेक पुरुष काम के वशीभूत होकर नष्ट होते देखे गये
हैं—ऐसा अर्थचिन्तकों का कहना है ॥ ३६ ॥
शरीरस्थितिहेतुत्वादाहारसधर्माणो हि कामाः। फलभूताश्च धर्मार्थयोः ॥ ३७ ॥

१० वात्स्यायन-कामसूत्र
शरीर की स्थिति का कारण होने से काम भी आहार के समान ही है, और धर्म एवं अर्थ
का फलरूप काम ही है ॥ ३७ ॥
बोद्धव्यं तु दोषेष्विव। नहि भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्रीयन्ते। नहि
मृगाः सन्तीति यवा नोप्यन्त इति वात्स्यायनः ॥ ३८ ॥
यदि कामसेवन से दोष उत्पन्न होते हैं, तो उन्हें भी अन्नादि के दोषों के समान ही समझना
चाहिये और उन्हें दूर करने के उपाय करने चाहिये। पर यह बात तर्कसङ्गत नहीं है कि भिक्षुक
हैं तो भोजन बनाने के लिये चूल्हा ही न जलाया जाये, और मृग हैं तो जौं (अन्न) ही न बोया
जाये—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ ३८ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
एवमर्थं च कामं च धर्मं चोपाचरन्नरः।
इहामुत्र च निःशल्यमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ ३९ ॥
अनुष्ठान करने का फल—इस विषय में प्राचीन लोगों के श्लोक देते हैं—
इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील मनुष्य, इस लोक में और
परलोक में निष्कण्टक सुख प्राप्त करता है ॥ ३९ ॥
किं स्यात् परत्रेत्याशङ्का कार्ये यस्मिन्न जायते।
न चार्थघ्नं सुखं चेति शिष्टास्तत्र व्यवस्थिताः ॥
त्रिवर्गसाधकं यत् स्याद् द्वयोरेकस्य वा पुनः।
कार्यं तदपि कुर्वीत न त्वेकार्थं द्विबाधकम् ॥ ४० ॥
जिस अर्थ के करने में यह शंका न हो कि परलोक में क्या होगा, और जो सुख अर्थ का
नाश न करे, शिष्ट पुरुष उसी के अनुष्ठान में लगते हैं। जो कार्य त्रिवर्ग का साधक हो, या दो का
अथवा एक का ही साधक हो, उसे करना चाहिये; परन्तु जो धर्म, अर्थ या काम केवल अपना
साधक हो तथा शेष दो का विघातक हो, उसे नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥
त्रिवर्गप्रतिपत्तिप्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
●
तृतीय अध्याय
विद्यासमुद्देशप्रकरण
धर्मार्थाङ्गविद्याकालाननुपरोधयन् कामसूत्रं तदङ्गविद्याश्च पुरुषो-
ऽधीयीत ॥ १ ॥
कामसूत्र का अध्ययनकाल—पुरुषों को धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा इन दोनों की
अङ्गभूत विद्याओं के साथ ही मध्य मध्य में कामसूत्र और उसकी अङ्गभूत विद्याओं का भी
अध्ययन करना चाहिये ॥ १ ॥

१. साधारण अधिकरण ११
प्राग्यौवनात् स्त्री। प्रत्ता च पत्युरभिप्रायात् ॥ २ ॥
धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और कामशास्त्र तथा उसकी अङ्गभूत विद्याओं का स्त्री को विवाह
से पूर्व, पिता के घर पर, अध्ययन करना चाहिये। यदि विवाह हो गया हो, तो पति की अनुमति
से ही इन्हें सीखना चाहिये ॥ २ ॥
योषितां शास्त्रग्रहणस्याभावादनर्थकमिह शास्त्रे स्त्रीशासनमित्या-
चार्याः ॥ ३ ॥
स्त्रियों के लिए कामशास्त्रीय शिक्षा—स्त्री शास्त्र की अधिकारिणी नहीं है, अतः इन
कामशास्त्र और उसकी अङ्गभूत विद्याओं में उनका परिश्रम निरर्थक है—ऐसा कुछ आचार्यों
का मत है ॥ ३ ॥
प्रयोगग्रहणं त्वासाम्। प्रयोगस्य च शास्त्रपूर्वकत्वादिति वात्स्यायनः ॥ ४ ॥
स्त्रियों को कामशास्त्र के व्यावहारिक प्रयोग का तो अधिकार है ही, और व्यावहारिक
प्रयोग के बिना सैद्धान्तिक ज्ञान समुचित रूप में नहीं हो सकता, अतएव उन्हें कामशास्त्र का
अध्ययन अवश्य करना चाहिये—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ ४ ॥
तन्न केवलमिहैव। सर्वत्र हि लोके कतिचिदेव शास्त्रज्ञाः। सर्वजनविषयश्च
प्रयोगः ॥ ५ ॥
यह बात केवल कामशास्त्र के विषय में ही सत्य हो—ऐसा नहीं है, बल्कि सर्वत्र देखी
जाती है कि लोक में शास्त्रों के जानने वाले कुछ ही होते हैं, पर उसका प्रयोग सभी लोग करते
हैं ॥ ५ ॥
प्रयोगस्य च दूरस्थमपि शास्त्रमेव हेतुः ॥ ६ ॥
और दूर होने पर भी प्रयोग का कारण शास्त्र ही है ॥ ६ ॥
अस्ति व्याकरणमित्यवैयाकरणा अपि याज्ञिका ऊहं क्रतुषु प्रयुञ्जते ॥ ७ ॥
व्याकरण शास्त्र के होने पर ही अवैयाकरण याज्ञिक यज्ञों में ऊह का प्रयोग करते हैं ॥ ७ ॥
अस्ति ज्यौतिषमिति पुण्याहेषु कर्म कुर्वते ॥ ८ ॥
ज्योतिषशास्त्र के होते हुए ही ज्योतिष न जानने वाले व्यक्ति भी शुभ दिनों में विशेष कृत्यों
को किया करते हैं ॥ ८ ॥
तथाश्वारोहा गजारोहाश्चाश्वान् गजांश्चानधिगतशास्त्रा अपि विनयन्ते ॥ ९ ॥
तथा हस्तिविद्या और शालिहोत्र को बिना पढ़े महावत और अश्वपालक भी क्रमशः
हाथियों और घोड़ों को नियन्त्रित करते हैं ॥ ९ ॥
तथास्ति राजेति दूरस्था अपि जनपदा न मर्यादामतिवर्तन्ते तद्वदेतत् ॥ १० ॥
जिस प्रकार दण्ड देने में समर्थ राजा की सत्ता जानकर दूरस्थ प्रजा भी राज्य की मर्यादाओं
का अतिक्रमण नहीं करती, उसी प्रकार कामशास्त्र को न जानने वाले व्यक्ति भी इसकी
मर्यादाओं का पालन करते हैं ॥ १० ॥
सन्त्यपि खलु शास्त्रप्रहतबुद्धयो गणिका राजपुत्र्यो महामात्रदुहितरश्च ॥ ११ ॥
निश्चय ही कुछ गणिकाएँ, राजपुत्रियाँ और महामात्यों (मन्त्रियों) की पुत्रियाँ
काम० ३

Here is the line-by-line transcription of the text from the image:

१२ वात्स्यायन-कामसूत्र
कामशास्त्रीय प्रयोगों में ही नहीं, शास्त्रानुशील में भी निष्पन्न बुद्धि वाली होती हैं अर्थात् यह
कहना सत्य नहीं है कि स्त्री शास्त्र की अधिकारिणी नहीं होती ॥ ११ ॥
तस्माद्वैश्वासिकाज्नाद्रहसि प्रयोगाञ्छास्त्रमेकदेशं वा स्त्री गृह्णीयात् ॥ १२ ॥
स्त्रियों की कामशास्त्रानुशील की रीति—इसलिये विश्वस्त जन से, एकान्त में,
कामशास्त्र के समस्त प्रयोग, सम्पूर्ण शास्त्र अथवा उसके एक अंग की शिक्षा स्त्रियाँ प्राप्त
करें ॥ १२ ॥
अभ्यासप्रयोज्यांश्च चातुःषष्टिकान् योगान् कन्या रहस्येकाकिन्यभ्य-
सेत् ॥ १३ ॥
अभ्यास से प्रयोज्य चौंसठ कलाओं के प्रयोगों का कन्या को एकान्त में एकाकी ही
अभ्यास करना चाहिये ॥ १३ ॥
आचार्यास्तु कन्यानां प्रवृत्तपुरुषसम्प्रयोगा सहसम्प्रवृद्धा धात्रेयिका।
तथाभूता वा निरत्ययसम्भाषणा सखी। सवयाश्च मातृष्वसा। विस्रब्धा तत्स्थानीया

१. साधारण अधिकरण १३
वैजयिकीनाम् व्यायामिकीनां च विद्यानां ज्ञानम्, इति चतुःषष्टिरङ्गविद्याः ।
कामसूत्रस्यावयविन्यः ॥ १५॥
कामशास्त्र की उपायभूत चौंसठ कलाएँ—इनमें भी काम की उपायभूत चौंसठ
कलाओं को गिनाते हैं—
१. गीतम्—गायन (सुगम सङ्गीत),
२. वाद्यम्—विभिन्न वाद्यों का बजाना,
३. नृत्यम्—विभिन्न प्रकार के नृत्य,
४. आलेख्यम्—चित्रकला (विभिन्न प्रकार के चित्र बनाना),
५. विशेषकच्छेद्यम्—बिन्दी तथा कटाव की तस्वीर बनाना,
६. तण्डुलकुसुमवलिविकाराः—रंगीन चावल और फूलों से अल्पना बनाना या चौक पूरना,
७. पुष्पास्तरणम्—पुष्पों की शैय्या बनाना,
८. दशनवसनाङ्गरागः—दाँत, वस्त्र और शरीर को रँगकर भव्य बनाना,
९. मणिभूमिकामर्म—मणियों का फर्श तैयार करना,
१०. शयनरचनम्—सुन्दर शैय्या-रचना,
११. उदकवाद्यम्—जल को वाद्य की तरह बजाना, जैसे जलतरंग,
१२. उदकघातम्—जलक्रीड़ा में कलात्मक जलप्रहार या पिचकारी मारना,
१३. चित्रयोगाः—विभिन्न औपनिषदिक योगों (मन्त्रों, तन्त्रों एवं औषधियों) के प्रयोगों का
ज्ञान,
१४. माल्यग्रथनविकल्पाः—विभिन्न प्रकार की मालाएँ बनाना,
१५. शेखरकापीडयोजनम्—शिरोभूषण—शेखरक, आपीड आदि का धारण करना,
१६. नेपथ्यप्रयोगाः—वस्त्राभरणसज्जा,
१७. कर्णपत्रभङ्गः—कर्णाभरण बनाना,
१८. गन्धयुक्तिः—कई द्रव्यों को मिलाकर सुगन्ध तैयार करना,
१९. भूषणयोजनम्—समुचित रीति से भूषणविन्यास करना,
२०. ऐन्द्रजालः—जादू के खेल दिखाना,
२१. कौचुमारयोगाः—औपनिषदिक में वर्णित सौन्दर्यवृद्धि आदि के प्रयोग,
२२. हस्तलाघवम्—हाथ की सफाई (फुरती),
२३. विचित्रशाकयूषभक्ष्यविकारक्रिया—विभिन्न प्रकार के शाक, तरकारी तथा भक्ष्य तैयार
करना,
२४. पानकरसरागासवयोजनम्—विभिन्न प्रकार के पेय पदार्थ, राग और आसव तैयार करना,
२५. सूची-वानकर्माणि—सीना, पिरोना, जाली बुनना,
२६. सूत्रक्रीड़ा—धागे से पशु-पक्षियों के चित्र बनाना,
२७. वीणाडमरुकवाद्यानि—वीणा आदि वाद्यों को बजाना,
२८. प्रहेलिका—पहेलियाँ समझना और कहना,
२९. प्रतिमाला—अन्त्याक्षरी प्रतियोगिता की क्षमता,

१४ वात्स्यायन-कामसूत्र
३०. दुर्वाचकयोगाः—कूट श्लोकों का पूछना और बताना,
३१. पुस्तकवाचनम्—पद्य का रसानुकूल गायन,
३२. नाटकाख्यायिकादर्शनम्—नाटक और कथासाहित्य आदि का परिज्ञान,
३३. काव्यसमस्यापूरणम्—काव्य में समस्यापूर्ति करना,
३४. पट्टिकावानवेत्रविकल्पाः—बेंत और सरकण्डों से चटाई, मूढ़े आदि बनाना,
३५. तक्षकमाणि—आभूषण और बर्तनों पर मीनाकारी,
३६. तक्षणम्—बढ़ईगिरी (लकड़ी का काम),
३७. वास्तुविद्या—भवननिर्माण कला,
३८. रूप्यपरीक्षा—मणि और रत्नों की परीक्षा,
३९. धातुवादः—धातुओं का शोधन एवं मिश्रण,
४०. मणिरागाकरज्ञानम्—मणियों को रँगना और खान आदि का ज्ञान,
४१. वृक्षायुर्वेदयोगः—वृक्षों एवं लताओं की चिकित्सा,
४२. मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधिः—भेड़ा, कुक्कुट और लावकों को लड़ाने की विधि,
४३. शुकसारिकाप्रलापनम्—शुक-सारिकाओं को प्रशिक्षित करना,
४४. उत्सादने संवाहने केशमर्दने च कौशलम्—हाथ-पैरों से दबाने (अङ्गमर्दन) तथा सिर की
मालिश की कला,
४५. अक्षरमुष्टिकाकथनम्—सांकेतिक या गुप्त अक्षरों का कथन तथा मुष्टिका—संकेत द्वारा
वार्तालाप,
४६. म्लेच्छितविकल्पाः—अस्पष्ट शब्दों के प्रयोग का अभ्यास,
४७. देशभाषाविज्ञानम्—विभिन्न देशों की भाषाओं का ज्ञान,
४८. पुष्पशकटिका—पुष्पों से गाड़ी आदि बनाना,
४९. निमित्तज्ञानम्—शकुन विचार,
५०. मन्त्रमातृका—स्वचालित यन्त्रों का निर्माण,
५१. धारणमातृका—स्मृतिवृद्धि के साधनों का ज्ञान,
५२. सम्पाठ्यम्—पठित या श्रुत छन्द को यथावत् दोहरा देना,
५३. मानसीकाव्यक्रिया—विक्षिप्त अक्षरों को मन से पूरा करके छन्द रचना करना,
५४. अभिधानकोशः—शब्दकोशों का ज्ञान एवं प्रयोग,
५५. छन्दोविज्ञानम्—छन्दःशास्त्र का ज्ञान,
५६. क्रियाकल्पः—काव्यशास्त्र का ज्ञान,
५७. छलतियोगाः—अनेक रूप धारण करने की कला,
५८. वस्त्रगोपनानि—वस्त्रों के दोषों को छिपाने की कला,
५९. द्यूतविशेषः—द्यूतकला का परिज्ञान,
६०. आकर्षकीड़ा—पासों को अनुकूल फेंकने की कला,
६१. बालकीडनकानि—बालकों के खेलों का ज्ञान,
६२. वैनयिकीनां विद्यानां ज्ञानम्—विनय देने वाली विद्या (आचारशास्त्र) का ज्ञान,

१. साधारण अधिकरण १५
६३. वैजयिकीनां विद्यानां ज्ञानम्—विजय दिलाने वाली विद्या (युद्धशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि)
का ज्ञान, और
६४. व्यायामिकीनां विद्यानां ज्ञानम्—व्यायामविद्या।
ये कामसूत्र की अङ्गभूत चौंसठ विद्याएँ हैं ॥ १५ ॥
पाञ्चालिकी च चतुःषष्टिरपरा। तस्याः प्रयोगानन्ववेत्य सांप्रयोगिके वक्ष्यामः;
कामस्य तदात्मकत्वात् ॥ १६ ॥
उक्त कलाओं से भिन्न चौंसठ पांचालिकी (पांचालदेश में प्रचलित) कलाएँ हैं। इनके
प्रयोगों को साम्प्रयोगिक अधिकरण में यथावसर कहेंगे, क्योंकि काम का स्वभाव तदनुकूल ही
होता है ॥ १६ ॥
आभिरभ्युच्छ्रिता वेश्या शीलरूपगुणान्विता।
लभते गणिकाशब्दं स्थानं च जनसंसदि ॥ १७ ॥
कलाज्ञान का फल—शील, रूप और गुण से युक्त वेश्या इन कलाओं से उत्कर्ष प्राप्त
कर गणिका का विशिष्ट पद प्राप्त कर लेती है और उच्चस्तरीय नागरिक गोष्ठियों में स्थान पाती
है ॥ १७ ॥
पूजिता सा सदा राज्ञा गुणवद्भिश्च संस्तुता।
प्रार्थनीयाभिगम्या च लक्ष्यभूता च जायते ॥ १८ ॥
राजा उसका सदैव सम्मान करता है, गुणी लोग उसकी प्रशंसा करते हैं और कला का
ज्ञान सीखने वाले लोग प्रार्थना करते हैं, इस प्रकार वह सभी का लक्ष्यबिन्दु हो जाती है ॥ १८ ॥
योगज्ञा राजपुत्री च महामात्रसुता तथा।
सहस्रान्तःपुरमपि स्ववशे कुरुते पतिम् ॥ १९ ॥
इन कलाओं के प्रयोगों को जानने वाली राजपुत्री और मन्त्रिपुत्री (सामन्त, सरदार या
उच्च वैभवसम्पन्न व्यक्ति की पुत्री) सहस्रों सपत्नियों के होने पर भी पति को अपने अधीन कर
लेती है ॥ १९ ॥
तथा पतिवियोगे च व्यसनं दारुणं गता।
देशान्तरेऽपि विद्याभिः सा सुखेनैव जीवति ॥ २० ॥
और इन कलाओं में निपुण स्त्री, पति के विदेश जाने पर, वैधव्य आदि भीषण संकट आ
जाने पर और अन्य देश में स्थित होने पर भी, इन विद्याओं से सुखपूर्वक जीवनयापन कर
सकती है ॥ २० ॥
नरः कलासु कुशलो वाचालश्चाटुकारकः।
असंस्तुतोऽपि नारीणां चित्तमाश्वेव विन्दति ॥ २१ ॥
पुरुषों को कलाज्ञान का लाभ—उक्त कलाओं में निपुण वाचाल एवं चाटुकार पुरुष
प्रशंसनीय (असाधारण) न होते हुए भी स्त्रियों के चित्त को शीघ्र ही आकृष्ट कर लेता है ॥ २१ ॥
कलानां ग्रहणादेव सौभाग्यमुपजायते।
देशकालौ त्वपेक्ष्यासां प्रयोगः सम्भवेन्न वा ॥ २२ ॥

१६ वात्स्यायन-कामसूत्र
कलाओं का ज्ञान प्राप्त करने से ही पुरुष का सौभाग्य जाग उठता है। यदि देश-काल को
विचार कर इनका प्रयोग किया जाये तो वह कभी निष्फल नहीं होता ॥ २२ ॥
विद्यासमुद्देश नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥
●
चतुर्थ अध्याय
नागरकवृत्तप्रकरण
गृहीतविद्यः प्रतिग्रहजयक्रयनिवेशाधिगतैरथैरन्वयागतैरुभयैर्वा गार्ह-
स्थ्यमधिगम्य नागरकवृत्तं वर्तेत ॥ १ ॥
प्रकरणसम्बन्ध—विद्याग्रहण किया हुआ युवक दान, विजय, व्यापार तथा भृति
(नौकरी) से अथवा पैतृक सम्पत्ति से या अर्जन एवं सम्पत्ति दोनों से धन प्राप्त कर, गृहस्थाश्रम
में प्रवेश कर, नागरकों (रसिक या विदग्ध) के समान आचरण करे ॥ १ ॥
नगरे पत्तने खर्वटे महति वा सजनाश्रये स्थानम्। यात्रावशाद्वा ॥ २ ॥
नागरक का वास—नागरकवृत्त के निर्वाह के लिये पत्तन, नगर, महत् (पाँच सौ ग्रामों
में बड़ा ग्राम) और खर्वट (दो सौ ग्रामों में बड़ा ग्राम)—इनमें से कहीं भी सज्जनों के मध्य
निवास करें, अथवा जहाँ अपनी जीविका हो, वहाँ रहे ॥ २ ॥
तत्र भवनमासन्नोदकं वृक्षवाटिकावद् विभक्तकर्मकक्षं द्विवासगृहं
कारयेत् ॥ ३ ॥
वहाँ जल के निकट, वृक्षवाटिका से सम्पन्न, वास के दो प्रकोष्ठों (बहिःप्रकोष्ठ और
अन्तःप्रकोष्ठ) से युक्त घर बनावे, जिसमें भिन्न भिन्न कार्यों के लिये भिन्न भिन्न कक्ष
निर्मित हों ॥ ३ ॥
बाह्ये च वासगृहे सुश्लक्ष्णमुभयोपधानं मध्ये विनतं शुक्लोत्तरच्छदं शयनीयं
स्यात्। प्रतिशय्यिका च। तस्य शिरोभागे कूर्चस्थानम् वेदिका च। तत्र रात्रिशेषमनु-
लेपनं माल्यं सिक्थकरण्डकं सौगन्धिकपुटिका मातुलुङ्गत्वचस्ताम्बूलानि च स्युः।
भूमौ पतद्ग्रहः। नागदन्तावसक्ता वीणा। चित्रफलकम्। वर्तिकासमुद्गकः। यः
कश्चित्पुस्तकः कुरण्टकमालाश्च। नातिदूरे भूमौ वृत्तास्तरणं समस्तकम्। आकर्ष-
फलकं द्यूतफलकं च। तस्य बहिः क्रीडाशकुनिपञ्जराणि। एकान्ते च तक्ष-
तक्षणस्थानमन्यासां च क्रीडानाम्। स्वास्तीर्णा प्रेङ्खादोला वृक्षवाटिकायां
सप्रच्छाया। स्थण्डिलपीठिका च सकुसुमेति भवनविन्यासः॥ ४ ॥
गृहसज्जा—निवासगृह के बाह्यप्रकोष्ठ में नर्म और मुलायम (गद्देदार) पर्यङ्क (पलङ्ग)
बिछा हुआ होना चाहिये, जो बीच में झुका हो। उस पर सफेद घुली हुई चादर बिछी हुई हो और
सिरहाने एवं पायताने, दोनों ओर तकिये लगे हुए हों। पर्यङ्क के पास एक छोटी एवं सज्जित
चारपाई रतिकर्म के लिए होनी चाहिये। उस पर्यंक के सिरहाने कूर्चस्थान पर, समान ऊँचाई पर