वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणिका १९
दृष्टान्त का फलितार्थ, अपरिहार्यता पर उपाय, क्षुद्र व्यक्तियों के उपाय, सम्प्रयोग के अवसर,
गौशाला का अधिकारी, सूत का प्रभारी, नगराध्यक्ष (कोतवाल), पण्याध्यक्ष (बाजार का
अधिकारी), मुख्य अधिकारियों का उपाय, राजदूती का प्रयास, राजा के प्रेम का प्रकटीकरण,
राजदासी की असफलता पर राजा का कर्तव्य, सद्भावप्रदर्शन, रानी द्वारा सहयोग, कलाकौशल
के बहाने बुलाना, पीड़ित और स्वार्थियों के पत्नियों को बुलाने की रीति, रक्षिता बनाने की रीति,
परगृहप्रवेश में दोष, कोट्टराज और जयसेन का उदाहरण, सार्वजनिक प्रयोग, आन्ध्र की प्रथा,
वत्सगुल्म की प्रथा, विदर्भ की प्रथा, अपरान्त की प्रथा, सौराष्ट्र की प्रथा, अन्य योग, राजा के
लिए प्रशस्त मार्ग।
षष्ठ अध्याय १४८-१५४
अन्तःपुरिकावृत्तप्रकरण—अन्तःपुर की लीलाएँ, प्रयोगविधि, प्राच्यों के उपचार,
विना पत्नी वाले पुरुष की कामशक्ति का उपाय, नागरिकों का प्रवेश, सुरक्षाप्रबन्ध के अभाव में
प्रवेश न करें, वात्स्यायन का परामर्श, ध्यातव्य बातें, स्वेच्छा से प्रवेश की विधि, परिचारिका से
कृत्रिम प्रेम, गुप्तचरों से सावधान, गतिविधियाँ, चित्र का प्रयोग, पुटापुट योग, जनसाधारण का
अन्तःपुर में प्रवेश और निष्क्रमण, अन्तःपुर की स्त्रियों को परपुरुषगमन में मिलाने की रीति,
रानियों के भोग-विलास : अपरान्त देश की प्रवृत्ति, आभीर की प्रवृत्ति, वत्सगुल्म की प्रवृत्ति,
विदर्भ की प्रवृत्ति, स्त्रीराज की प्रवृत्ति, गौड़ देश की प्रवृत्ति, सिन्ध देश की प्रवृत्ति, हैमवतों की
प्रवृत्ति, अङ्ग-वङ्ग और कलिंग, प्राच्यों की प्रवृत्ति।
दाररक्षितप्रकरण—स्त्रियों की रक्षा का उपाय, कामशास्त्र का परामर्श, आचार्य
गोणिकापुत्र का मत, वात्स्यायन की व्यवस्था, परीक्षण द्वारा रक्षण सम्भव, बाभ्रवीय मत,
वात्स्यायन का मत, विनाश के कारण, उपसंहार।
६. वैशिक षष्ठ अधिकरण
प्रथम अध्याय १५४-१५९
सहायगम्यागम्यगमनकारणचिन्ताप्रकरण—वैशिक अधिकरण की प्रयोक्त्री, वेश्या
का प्रयोजन—काम और रतिसुख, स्वाभाविक और कृत्रिम प्रवृत्ति, कृत्रिम राग को स्वाभाविक
दिखाना, इसका कारण, प्रेम के समय निर्लोभता दिखाये, उपाय से ही धनप्राप्ति, रहन-सहन,
वेश्याजनों के सहायक, धन के लिये मिलने योग्य पुरुष, गुण के लिये मिलने योग्य पुरुष,
नायकोचित गुण, नायिका के गुण, दोनों का सामान्य गुण, नायक-नायिका के दोष, अगम्य
नायक, मिलने के कारण, वात्स्यायन की व्यवस्था।
गम्योपावर्तनप्रकरण—भावजिज्ञासा, प्रेमसूत्र जोड़ने के उपाय, आगत का स्वागत,
गोष्ठी में सम्मान, प्रेम की दृढ़ता हेतु उपाय, स्वयं दर्शन, उपसंहार, आदान-प्रदान।
द्वितीय अध्याय १५९-१६६
कान्तावृत्तप्रकरण—आचार्य वात्स्यायन का परामर्श, कान्तानुवृत्त, माँ के संरक्षण में