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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 248 में से

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पृष्ठ 37

१. साधारण अधिकरण ११
प्राग्यौवनात् स्त्री। प्रत्ता च पत्युरभिप्रायात् ॥ २ ॥
धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और कामशास्त्र तथा उसकी अङ्गभूत विद्याओं का स्त्री को विवाह
से पूर्व, पिता के घर पर, अध्ययन करना चाहिये। यदि विवाह हो गया हो, तो पति की अनुमति
से ही इन्हें सीखना चाहिये ॥ २ ॥
योषितां शास्त्रग्रहणस्याभावादनर्थकमिह शास्त्रे स्त्रीशासनमित्या-
चार्याः ॥ ३ ॥
स्त्रियों के लिए कामशास्त्रीय शिक्षा—स्त्री शास्त्र की अधिकारिणी नहीं है, अतः इन
कामशास्त्र और उसकी अङ्गभूत विद्याओं में उनका परिश्रम निरर्थक है—ऐसा कुछ आचार्यों
का मत है ॥ ३ ॥
प्रयोगग्रहणं त्वासाम्। प्रयोगस्य च शास्त्रपूर्वकत्वादिति वात्स्यायनः ॥ ४ ॥
स्त्रियों को कामशास्त्र के व्यावहारिक प्रयोग का तो अधिकार है ही, और व्यावहारिक
प्रयोग के बिना सैद्धान्तिक ज्ञान समुचित रूप में नहीं हो सकता, अतएव उन्हें कामशास्त्र का
अध्ययन अवश्य करना चाहिये—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ ४ ॥
तन्न केवलमिहैव। सर्वत्र हि लोके कतिचिदेव शास्त्रज्ञाः। सर्वजनविषयश्च
प्रयोगः ॥ ५ ॥
यह बात केवल कामशास्त्र के विषय में ही सत्य हो—ऐसा नहीं है, बल्कि सर्वत्र देखी
जाती है कि लोक में शास्त्रों के जानने वाले कुछ ही होते हैं, पर उसका प्रयोग सभी लोग करते
हैं ॥ ५ ॥
प्रयोगस्य च दूरस्थमपि शास्त्रमेव हेतुः ॥ ६ ॥
और दूर होने पर भी प्रयोग का कारण शास्त्र ही है ॥ ६ ॥
अस्ति व्याकरणमित्यवैयाकरणा अपि याज्ञिका ऊहं क्रतुषु प्रयुञ्जते ॥ ७ ॥
व्याकरण शास्त्र के होने पर ही अवैयाकरण याज्ञिक यज्ञों में ऊह का प्रयोग करते हैं ॥ ७ ॥
अस्ति ज्यौतिषमिति पुण्याहेषु कर्म कुर्वते ॥ ८ ॥
ज्योतिषशास्त्र के होते हुए ही ज्योतिष न जानने वाले व्यक्ति भी शुभ दिनों में विशेष कृत्यों
को किया करते हैं ॥ ८ ॥
तथाश्वारोहा गजारोहाश्चाश्वान् गजांश्चानधिगतशास्त्रा अपि विनयन्ते ॥ ९ ॥
तथा हस्तिविद्या और शालिहोत्र को बिना पढ़े महावत और अश्वपालक भी क्रमशः
हाथियों और घोड़ों को नियन्त्रित करते हैं ॥ ९ ॥
तथास्ति राजेति दूरस्था अपि जनपदा न मर्यादामतिवर्तन्ते तद्वदेतत् ॥ १० ॥
जिस प्रकार दण्ड देने में समर्थ राजा की सत्ता जानकर दूरस्थ प्रजा भी राज्य की मर्यादाओं
का अतिक्रमण नहीं करती, उसी प्रकार कामशास्त्र को न जानने वाले व्यक्ति भी इसकी
मर्यादाओं का पालन करते हैं ॥ १० ॥
सन्त्यपि खलु शास्त्रप्रहतबुद्धयो गणिका राजपुत्र्यो महामात्रदुहितरश्च ॥ ११ ॥
निश्चय ही कुछ गणिकाएँ, राजपुत्रियाँ और महामात्यों (मन्त्रियों) की पुत्रियाँ
काम० ३