वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ वात्स्यायन-कामसूत्र
अथवा जीवन की अनित्यता के कारण जिस समय भी जो सम्भव हो उसका ही सेवन
करना चाहिये ॥ ५ ॥
ब्रह्मचर्यमेव त्वा विद्याग्रहणात् ॥ ६ ॥
ब्रह्मचर्यपालन—विद्योपार्जन काल में ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है ॥ ६ ॥
अलौकिकत्वाददृष्टार्थत्वादप्रवृत्तानां यज्ञादीनां शास्त्रात् प्रवर्त्तनम्, लौकिक-
त्वाद् दृष्टार्थत्वाच्च प्रवृत्तेभ्यश्च मांसभक्षणादिभ्यः शास्त्रादेव निवारणं धर्मः ॥ ७ ॥
धर्म का स्वरूप और उसका उपाय—अलौकिक एवं फल के अदृष्ट होने से यज्ञादि में
स्वभावतः प्रवृत्त न होने वाले मनुष्य का शास्त्र के आदेश से प्रवृत्त होना तथा लौकिक एवं प्रत्यक्ष
फल वाला होने के कारण मांस-भक्षणादि कार्यों में प्रवृत्त मनुष्य का शास्त्र के आदेश से निवृत्त
होना—यह प्रवृत्ति और निवृत्ति रूप द्विविध धर्म है ॥ ७ ॥
तं श्रुतेर्धर्मज्ञसमवायाच्च प्रतिपद्येत ॥ ८ ॥
धर्म के विषय में शास्त्र ही प्रमाण क्यों मानते हो?—उस धर्म को विद्वान् लोग वेद के
अध्ययन से और साधारण लोग धर्मज्ञ पुरुषों से जान लें ॥ ८ ॥
विद्याभूमिहिरण्यपशुधान्यभाण्डोपस्करमित्रादीनामर्जनमर्जितस्य विवर्धन-
मर्थः ॥ ९ ॥
अर्थ का स्वरूप और उसका उपाय—विद्या, भूमि, हिरण्य (स्वर्ण), पशु, धान्य,
बर्तनादि गृह-उपकरण, मित्रों आदि का सम्पादन करना तथा अर्जित को बढ़ाना ही अर्थ
कहलाता है ॥ ९ ॥
तमध्यक्षप्रचाराद्वार्तासमयविद्भ्यो वणिग्भ्यश्चेति ॥ १० ॥
उस अर्थ को अध्यक्षप्रचार (स्वयं दर्शन) से, कृषि-वाणिज्य आदि के तत्त्वज्ञों से और
व्यापारियों से जानना चाहिये ॥ १० ॥
श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानामात्मसंयुक्तेन मनसाधिष्ठितानां स्वेषु स्वेषु
विषयेष्वानुकूल्यतः प्रवृत्तिकामः ॥ ११ ॥
काम का स्वरूप और उसका उपाय—आत्मा से संयुक्त हुए मन से अधिष्ठित श्रोत्र
(कान), त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका—इन पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की अपने अपने विषय—
क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—में अनुकूल प्रवृत्ति को काम कहते हैं ॥ ११ ॥
स्पर्शविशेषविषयात्त्वस्याभिमानिकसुखानुविद्धा फलवत्यर्थप्रतीतिः
प्राधान्यात् कामः ॥ १२ ॥
चुम्बनादि के प्रासङ्गिक सुख के साथ, परस्पर स्तन, नितम्ब आदि विशेष अङ्गों के स्पर्श
से आनन्द की जो फलवती प्रतीति होती है, उसे काम कहते हैं ॥ १२ ॥
तं कामसूत्रान्नागरिकजनसमवायाच्च प्रतिपद्येत ॥ १३ ॥
उस काम-विषयक ज्ञान को ‘कामसूत्र’ से तथा सम्भ्रान्त नागरिकों से सीखना
चाहिये ॥ १३ ॥