वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१. साधारण अधिकरण ७
एषां समवाये पूर्वः पूर्वो गरीयान् ॥ १४ ॥
धर्म, अर्थ और काम के समुदाय में उत्तर से पूर्व पूर्व श्रेष्ठ है, अर्थात् काम से अर्थ श्रेष्ठ हैं
और अर्थ से धर्म श्रेष्ठ है ॥ १४ ॥
अर्थश्च राज्ञः। तन्मूलत्वाल्लोकयात्रायाः। वेश्यायाश्चेति त्रिवर्गप्रति-
पत्तिः ॥ १५ ॥
राजा के लिए धर्म और काम की अपेक्षा अर्थ ही बड़ा है, क्योंकि उसकी लोकयात्रा का
मूल धन ही हैं। वेश्या के लिए भी अर्थ ही बड़ा है। इस प्रकार त्रिवर्ग की प्रतिपत्ति (प्राप्ति) पूर्ण
हुई ॥ १५ ॥
धर्मस्यालौकिकत्वात् तदभिधायकं शास्त्रं युक्तम्; उपायपूर्वकत्वादर्थसिद्धेः।
उपायप्रतिपत्तिः शास्त्रात् ॥ १६ ॥
धर्मादि की प्रतिपत्ति — धर्म अलौकिक हैं, इसलिये उसके स्वरूप का बोध कराने वाले
शास्त्र का होना युक्तिसङ्गत भी है और आवश्यक भी। अर्थ की सिद्धि भी उपायों से ही होती है,
अतएव इन उपायों को बताने वाले अर्थशास्त्र की भी आवश्यकता है ॥ १६ ॥
तिर्यग्योनिष्वपि तु स्वयं प्रवृत्तत्वात् कामस्य नित्यत्वाच्च न शास्त्रेण
कृत्यमस्तीत्याचार्याः ॥ १७ ॥
कामशास्त्र की आवश्यकता — पशु-पक्षियों में भी काम की स्वतः प्रवृत्ति पायी जाती
है तथा यह नित्य (अविनाशी) है, अतः इसे सिखाने के लिये शास्त्र की आवश्यकता नहीं है—
ऐसा कुछ आचार्यों का मत है ॥ १७ ॥
सम्प्रयोगपराधीनत्वात् स्त्रीपुंसयोरुपायमपेक्षते ॥ १८ ॥
सम्भोग में स्त्री-पुरुष के पराधीन होने के कारण, उन्हें पराधीनता से बचने के लिये
शास्त्ररूप उपाय की आवश्यकता होती है ॥ १८ ॥
सा चोपायप्रतिपत्तिः कामसूत्रादिति वात्स्यायनः ॥ १९ ॥
दाम्पत्य जीवन को सफल बनाने वाले उपायों का परिज्ञान कामसूत्र से ही होता है—ऐसा
महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ १९ ॥
तिर्यग्योनिषु पुनरनावृतत्वात् स्त्रीजातेश्च, ऋतौ यावदर्थं प्रवृत्तेरबुद्धिपूर्वक-
त्वाच्च प्रवृत्तीनामनुपायः प्रत्ययः ॥ २० ॥
मनुष्यों में शास्त्ररूपी उपाय की आवश्यकता क्यों है? — पशु-पक्षियों में स्त्री जाति
अनावृत—स्वतन्त्र, बन्धनरहित एवं आवरणरहित रहती है, ऋतुकाल में ही उनकी सोद्देश्य
प्रवृत्ति होती है, और यह प्रवृत्ति बुद्धिपूर्वक नहीं होती, अतः उनका सहज धर्म किसी शास्त्ररूपी
उपाय की आवश्यकता नहीं रखता ॥ २० ॥
न धर्मांश्चरेत्; एष्यत्फलत्वात्। सांशयिकत्वाच्च ॥ २१ ॥
त्रिवर्ग के आचरण की आवश्यकता पर शंका — क्योंकि धर्म का फल भविष्य में
मिलने वाला (अनिश्चित) होता है, अतः धर्मों का आचरण नहीं करना चाहिये। उनके फल
मिलने में भी संशय रहता है ॥ २१ ॥