सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 41

१. साधारण अधिकरण १५
६३. वैजयिकीनां विद्यानां ज्ञानम्—विजय दिलाने वाली विद्या (युद्धशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि)
का ज्ञान, और
६४. व्यायामिकीनां विद्यानां ज्ञानम्—व्यायामविद्या।
ये कामसूत्र की अङ्गभूत चौंसठ विद्याएँ हैं ॥ १५ ॥
पाञ्चालिकी च चतुःषष्टिरपरा। तस्याः प्रयोगानन्ववेत्य सांप्रयोगिके वक्ष्यामः;
कामस्य तदात्मकत्वात् ॥ १६ ॥
उक्त कलाओं से भिन्न चौंसठ पांचालिकी (पांचालदेश में प्रचलित) कलाएँ हैं। इनके
प्रयोगों को साम्प्रयोगिक अधिकरण में यथावसर कहेंगे, क्योंकि काम का स्वभाव तदनुकूल ही
होता है ॥ १६ ॥
आभिरभ्युच्छ्रिता वेश्या शीलरूपगुणान्विता।
लभते गणिकाशब्दं स्थानं च जनसंसदि ॥ १७ ॥
कलाज्ञान का फल—शील, रूप और गुण से युक्त वेश्या इन कलाओं से उत्कर्ष प्राप्त
कर गणिका का विशिष्ट पद प्राप्त कर लेती है और उच्चस्तरीय नागरिक गोष्ठियों में स्थान पाती
है ॥ १७ ॥
पूजिता सा सदा राज्ञा गुणवद्भिश्च संस्तुता।
प्रार्थनीयाभिगम्या च लक्ष्यभूता च जायते ॥ १८ ॥
राजा उसका सदैव सम्मान करता है, गुणी लोग उसकी प्रशंसा करते हैं और कला का
ज्ञान सीखने वाले लोग प्रार्थना करते हैं, इस प्रकार वह सभी का लक्ष्यबिन्दु हो जाती है ॥ १८ ॥
योगज्ञा राजपुत्री च महामात्रसुता तथा।
सहस्रान्तःपुरमपि स्ववशे कुरुते पतिम् ॥ १९ ॥
इन कलाओं के प्रयोगों को जानने वाली राजपुत्री और मन्त्रिपुत्री (सामन्त, सरदार या
उच्च वैभवसम्पन्न व्यक्ति की पुत्री) सहस्रों सपत्नियों के होने पर भी पति को अपने अधीन कर
लेती है ॥ १९ ॥
तथा पतिवियोगे च व्यसनं दारुणं गता।
देशान्तरेऽपि विद्याभिः सा सुखेनैव जीवति ॥ २० ॥
और इन कलाओं में निपुण स्त्री, पति के विदेश जाने पर, वैधव्य आदि भीषण संकट आ
जाने पर और अन्य देश में स्थित होने पर भी, इन विद्याओं से सुखपूर्वक जीवनयापन कर
सकती है ॥ २० ॥
नरः कलासु कुशलो वाचालश्चाटुकारकः।
असंस्तुतोऽपि नारीणां चित्तमाश्वेव विन्दति ॥ २१ ॥
पुरुषों को कलाज्ञान का लाभ—उक्त कलाओं में निपुण वाचाल एवं चाटुकार पुरुष
प्रशंसनीय (असाधारण) न होते हुए भी स्त्रियों के चित्त को शीघ्र ही आकृष्ट कर लेता है ॥ २१ ॥
कलानां ग्रहणादेव सौभाग्यमुपजायते।
देशकालौ त्वपेक्ष्यासां प्रयोगः सम्भवेन्न वा ॥ २२ ॥