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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 248 में से

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पृष्ठ 35

१. साधारण अधिकरण ९
काल ही मनुष्यों को अर्थ और अनर्थ में, जय और पराजय में तथा सुख और दुःख में
स्थापित करता है ॥ २८ ॥
कालेन बलिरिन्द्रः कृतः । कालेन व्यपरोपितः । काल एव पुनरप्येनं कर्तेति
कालकारणिकाः ॥ २९ ॥
काल ने बलि को इन्द्र बनाया, काल ने ही उसे अपदस्थ किया और वही सम्भवतः उसे
फिर इन्द्र बना दे—ऐसा काल को ही सब कुछ का कारण मानने वाले आचार्य कहते हैं ॥ २९ ॥
पुरुषकारपूर्वकत्वात् सर्वप्रवृत्तीनामुपायः प्रत्ययः ॥ ३० ॥
सम्पूर्ण प्रवृत्तियाँ पुरुषार्थ से सम्पन्न होती हैं, अतः उनके उपाय का जानना आवश्यक
है ॥ ३० ॥
अवश्यं भाविनोऽप्यर्थस्योपायपूर्वकत्वादेव। न निष्कर्मणो भद्रमस्तीति
वात्स्यायनः ॥ ३१ ॥
अवश्यम्भावी कार्यों की भी उपायपूर्वक ही सिद्धि होने से स्पष्ट है कि अकर्मण्य पुरुष का
कल्याण नहीं होता—ऐसा वात्स्यायन का मत है ॥ ३१ ॥
न कामाँश्चरेत्। धर्मार्थयोः प्रधानयोरेवमन्येषां च सतां प्रत्यनीकत्वात्। अनर्थ-
जनसंसर्गमसद्व्यवसायमशौचमनायतिं चैते पुरुषस्य जनयन्ति ॥ ३२ ॥
काम का आचरण नहीं करना चाहिये, क्योंकि यह प्रधान पुरुषार्थ धर्म और अर्थ के तथा
सज्जनों के विरुद्ध है। यह मनुष्य में अनर्थकारी लोगों का संसर्ग, असत् कर्म, अपवित्रता और
प्रभावहीनता (पराक्रम एवं यश का अभाव) उत्पन्न करता है ॥ ३२ ॥
तथा प्रमादं लाघवमप्रत्ययमग्राह्यतां च ॥ ३३ ॥
और यह काम प्रमाद, चञ्चलता और अविश्वास को उत्पन्न करता है तथा कामी व्यक्ति
सभी के लिये अग्राह्य हो जाता है अर्थात् सभी लोग उससे बचने लगते हैं ॥ ३३ ॥
बहवश्च कामवशगाः सगणा एवं विनष्टाः श्रूयन्ते ॥ ३४ ॥
और यह भी सुना जाता है कि बहुत से व्यक्ति काम के वशीभूत होकर सपरिवार नष्ट हो
गये ॥ ३४ ॥
यथा दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मणकन्यामभिमन्यमानः सबन्धुराष्ट्रो
विननाश ॥ ३५ ॥
जैसे भोजवंशीय दाण्डक्य नामक राजा काम के वशीभूत होकर ब्राह्मण-कन्या को
कामतृप्ति का साधन मानने के कारण अपने बन्धु-बान्धव और राष्ट्र सहित नष्ट हो गया ॥ ३५ ॥
देवराजश्चाहल्यामतिबलश्च कीचको द्रौपदीं रावणश्च सीतामपरे चान्ये च
बहवो दृश्यन्ते कामवशगा विनष्टा इत्यर्थचिन्तकाः ॥ ३६ ॥
देवराज इन्द्र अहल्या के गमन से, महाबली कीचक द्रौपदी की और रावण सीता की
कामना में नष्ट हुआ। इनके अतिरिक्त भी अनेक पुरुष काम के वशीभूत होकर नष्ट होते देखे गये
हैं—ऐसा अर्थचिन्तकों का कहना है ॥ ३६ ॥
शरीरस्थितिहेतुत्वादाहारसधर्माणो हि कामाः। फलभूताश्च धर्मार्थयोः ॥ ३७ ॥