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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 248 में से

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१६ वात्स्यायन-कामसूत्र
कलाओं का ज्ञान प्राप्त करने से ही पुरुष का सौभाग्य जाग उठता है। यदि देश-काल को
विचार कर इनका प्रयोग किया जाये तो वह कभी निष्फल नहीं होता ॥ २२ ॥
विद्यासमुद्देश नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥
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चतुर्थ अध्याय
नागरकवृत्तप्रकरण
गृहीतविद्यः प्रतिग्रहजयक्रयनिवेशाधिगतैरथैरन्वयागतैरुभयैर्वा गार्ह-
स्थ्यमधिगम्य नागरकवृत्तं वर्तेत ॥ १ ॥
प्रकरणसम्बन्ध—विद्याग्रहण किया हुआ युवक दान, विजय, व्यापार तथा भृति
(नौकरी) से अथवा पैतृक सम्पत्ति से या अर्जन एवं सम्पत्ति दोनों से धन प्राप्त कर, गृहस्थाश्रम
में प्रवेश कर, नागरकों (रसिक या विदग्ध) के समान आचरण करे ॥ १ ॥
नगरे पत्तने खर्वटे महति वा सजनाश्रये स्थानम्। यात्रावशाद्वा ॥ २ ॥
नागरक का वास—नागरकवृत्त के निर्वाह के लिये पत्तन, नगर, महत् (पाँच सौ ग्रामों
में बड़ा ग्राम) और खर्वट (दो सौ ग्रामों में बड़ा ग्राम)—इनमें से कहीं भी सज्जनों के मध्य
निवास करें, अथवा जहाँ अपनी जीविका हो, वहाँ रहे ॥ २ ॥
तत्र भवनमासन्नोदकं वृक्षवाटिकावद् विभक्तकर्मकक्षं द्विवासगृहं
कारयेत् ॥ ३ ॥
वहाँ जल के निकट, वृक्षवाटिका से सम्पन्न, वास के दो प्रकोष्ठों (बहिःप्रकोष्ठ और
अन्तःप्रकोष्ठ) से युक्त घर बनावे, जिसमें भिन्न भिन्न कार्यों के लिये भिन्न भिन्न कक्ष
निर्मित हों ॥ ३ ॥
बाह्ये च वासगृहे सुश्लक्ष्णमुभयोपधानं मध्ये विनतं शुक्लोत्तरच्छदं शयनीयं
स्यात्। प्रतिशय्यिका च। तस्य शिरोभागे कूर्चस्थानम् वेदिका च। तत्र रात्रिशेषमनु-
लेपनं माल्यं सिक्थकरण्डकं सौगन्धिकपुटिका मातुलुङ्गत्वचस्ताम्बूलानि च स्युः।
भूमौ पतद्ग्रहः। नागदन्तावसक्ता वीणा। चित्रफलकम्। वर्तिकासमुद्गकः। यः
कश्चित्पुस्तकः कुरण्टकमालाश्च। नातिदूरे भूमौ वृत्तास्तरणं समस्तकम्। आकर्ष-
फलकं द्यूतफलकं च। तस्य बहिः क्रीडाशकुनिपञ्जराणि। एकान्ते च तक्ष-
तक्षणस्थानमन्यासां च क्रीडानाम्। स्वास्तीर्णा प्रेङ्खादोला वृक्षवाटिकायां
सप्रच्छाया। स्थण्डिलपीठिका च सकुसुमेति भवनविन्यासः॥ ४ ॥
गृहसज्जा—निवासगृह के बाह्यप्रकोष्ठ में नर्म और मुलायम (गद्देदार) पर्यङ्क (पलङ्ग)
बिछा हुआ होना चाहिये, जो बीच में झुका हो। उस पर सफेद घुली हुई चादर बिछी हुई हो और
सिरहाने एवं पायताने, दोनों ओर तकिये लगे हुए हों। पर्यङ्क के पास एक छोटी एवं सज्जित
चारपाई रतिकर्म के लिए होनी चाहिये। उस पर्यंक के सिरहाने कूर्चस्थान पर, समान ऊँचाई पर