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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 248 में से

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पृष्ठ 30

४ वात्स्यायन-कामसूत्र
पुनर्भूवृत्तम्। दुर्भगावृत्तम्। आन्तःपुरिकम्। पुरुषस्य बह्वीषु प्रतिपत्तिः। इति
भार्याधिकारिकं चतुर्थमधिकरणम्। अध्यायो द्वौ। प्रकरणाण्यष्टौ ॥ १९ ॥
'भार्याधिकारिक' नामक चतुर्थ अधिकरण है, इसमें दो अध्याय और आठ
प्रकरण हैं—(१) पतिपरायणा पत्नी के कर्तव्य, (२) पति के बाहर जाने पर पत्नी के
कर्तव्य, (३) सपत्नियों में ज्येष्ठा का कनिष्ठा के प्रति व्यवहार, (४) सपत्नियों में कनिष्ठा का
ज्येष्ठा के प्रति व्यवहार, (५) पुनर्विवाहित पत्नी का व्यवहार, (६) दुर्भाग्यशालिनी पत्नी का
पति एवं सपत्नियों के प्रति व्यवहार, (७) अन्तःपुर के प्रति कर्तव्य और (८) पुरुष का अनेक
पत्नियों के प्रति कर्तव्य ॥ १९ ॥
स्त्री-पुरुषशीलावस्थापनम्। व्यावर्तनकारणानि। स्त्रीषु सिद्धाः पुरुषाः।
अयत्नसाध्या योषितः। परिचयकारणानि। अभियोगाः। भावपरीक्षा। दूतीकर्माणि।
ईश्वरकामितम्। अन्तःपुरिकं दाररक्षितकम्। इति पारदारिकं पञ्चममधिकरणम्।
अध्यायाः षट्। प्रकरणाणि दश ॥ २० ॥
'पारदारिक' नामक पञ्चम अधिकरण है, इसमें छह अध्याय और दश प्रकरण हैं—
(१) स्त्री-पुरुष के स्वभाव की विवेचना, (२) परपुरुष-सम्बन्ध में अवरोध उत्पन्न करने के
कारण, (३) परनारी को वशीभूत करने में सिद्ध पुरुष, (४) अनायास साध्य स्त्रियाँ,
(५) परिचय बनाने के उपाय, (६) अभियोग, (७) भावों की परीक्षा, (८) दूतीकर्म,
(९) ऐश्वर्यशाली पुरुषों की इच्छा पूरी करने के उपाय और (१०) अन्तःपुर में प्रवेश और
व्यभिचारी एवं दुष्ट पुरुषों से अपनी स्त्रियों की रक्षा ॥ २० ॥
गम्यचिन्ता। गमनकारणानि। उपावर्तनविधिः। कान्तानुवर्तनम्।
अर्थागमोपायाः। विरक्तलिङ्गानि। विरक्तप्रतिपत्तिः। निष्कांसनप्रकाराः।
विशीर्णप्रतिसन्धानम्। लाभविशेषः। अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारः। वेश्या-
विशेषाश्च। इति वैशिकं षष्ठमधिकरणम्। अध्यायाः षट्। प्रकरणाणि द्वादश ॥ २१ ॥
'वैशिक' नामक षष्ठ अधिकरण है, इसमें छह अध्याय और बारह प्रकरण हैं—
(१) गम्यपुरुष-चिन्तन, (२) सम्भोग के कारण, (३) अपनी ओर आकृष्ट करने की विधि,
(४) अपने प्रेमी के साथ पत्नी के समान आचरण, (५) अर्थार्जन के उपाय, (६) विरक्त पुरुष
के चिह्न, (७) विरक्त पुरुष की पुनः प्राप्ति, (८) निष्कासन के उपाय, (९) निष्कासित का
प्रतिसन्धान, (१०) विशेष लाभ की युक्ति, (११) अर्थानर्थपरक अनुबन्ध और संशय-सम्बन्धी
विचार और (१२) वेश्याओं के विभिन्न प्रकार ॥ २१ ॥
सुभगङ्करणम्। वशीकरणम्। वृष्याश्च योगाः। नष्टरागप्रत्यानयनम्।
वृद्धिविधयः। चित्राश्च योगाः। इत्यौपनिषदिकं सप्तममधिकरणम्। अध्यायो द्वौ।
प्रकरणाणि षट् ॥ २२ ॥
'औपनिषदिक' नामक सप्तम अधिकरण है, इसमें दो अध्याय और छह प्रकरण हैं—
(१) रूप, गुण, आयु आदि सौभाग्य-प्राप्ति के उपाय, (२) यन्त्र, मन्त्र और तन्त्र से वश में