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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 248 में से

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पृष्ठ 34

८ वात्स्यायन-कामसूत्र
को ह्यबालिशो हस्तगतं परगतं कुर्यात् ॥ २२ ॥
लोकरीति—कौन ऐसा मूर्ख होगा जो हस्तगत पदार्थ को दूसरे से हाथ सौंपेगा ॥ २२ ॥
वरमद्य कपोतः श्वो मयूरात् ॥ २३ ॥
कल मिलने वाले मयूर से आज मिलने वाला कबूतर अच्छा है ॥ २३ ॥
वरं सांशयिकान्निष्कादसांशयिकः कार्षापणः । इति लौकायतिकाः ॥ २४ ॥
पारस्परिक असहमति के द्वितीय हेतु की लोकप्रसिद्धि बताते हैं—सन्दिग्ध निष्क
(स्वर्णमुद्रा) की अपेक्षा असन्दिग्ध कार्षापण (ताम्रमूद्रा या ताँबे का सिक्का) का लाभ अधिक
अच्छा है—ऐसा लौकायतिकों (लोकायत अर्थात् नास्तिक दर्शन के अनुयायी लोगों) का
मत है ॥ २४ ॥
शास्त्रस्यानभिशङ्क्यत्वादभिचारानुव्याहारयोश्च क्वचित्फलदर्शनान्नक्षत्रचन्द्र-
सूर्यताराग्रहचक्रस्य लोकार्थं बुद्धिपूर्वकमिव प्रवृत्तेर्दर्शनाद् वर्णाश्रमाचार-
स्थितिलक्षणत्वाच्च लोकयात्राया हस्तगतस्य च बीजस्य भविष्यतः सस्यार्थे
त्यागदर्शनाच्चरेद्धर्मानिति वात्स्यायनः ॥ २५ ॥
धर्म पर की गयी शंकाओं का उत्तर—क्योंकि—(१) धर्म का उपदेश करने वाले
शास्त्र (वेद, स्मृति आदि) अपौरुषेय (ईश्वरकृत या मन्त्रद्रष्टा ऋषियों द्वारा प्रणीत) हैं, इसलिये
उनमें शंका नहीं की जा सकती, वे निश्चय ही सत्य है।
(२) कहीं शास्त्रों द्वारा निर्देशित अभिचार कर्मों, शान्ति एवं पुष्टिवर्धक कर्मों का फल भी
स्पष्ट देखा जाता है।
(३) नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, तारागण एवं ग्रहचक्रों की लोकहित में बुद्धिपूर्वक के समान
प्रवृत्ति देखी जाती है।
(४) वर्ण एवं आश्रम व्यवस्था एवं उनके समस्त करणीय कर्मों का प्रतिपादन धर्म में ही
किया गया है।
(५) लोकयात्रा में हस्तगत बीज को भविष्य में उत्पन्न होने वाले अन्न के लिये भावी
उत्पादन (फसल) हेतु छोड़ दिया जाता है।
अतएव धर्म का आचरण अवश्य करना चाहिये—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत
है ॥ २५ ॥
नार्थांश्चरेत् । प्रयत्नतोऽपि ह्येतेऽनुष्ठीयमाना नैव कदाचित् स्युः, अननुष्ठीयमाना
अपि यदृच्छया भवेयुः ॥ २६ ॥
अर्थार्जन के लिए प्रयत्न नहीं करना चाहिये, क्योंकि कभी अर्थ प्रयत्न करने पर भी तो
प्राप्त नहीं होता, और कभी बिना प्रयत्न के भी अकस्मात् प्राप्त हो जाता है ॥ २६ ॥
तत्सर्वं कालकारितमिति ॥ २७ ॥
क्या यह पूर्वकृत है ? नहीं; यह सब काल के अधीन है ॥ २७ ॥
काल एव हि पुरुषानर्थानर्थयोर्जयपराजययोः सुखदुःखयोश्च स्थाप-
यति ॥ २८ ॥