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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 248 में से

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पृष्ठ 29

१. साधारण अधिकरण ३
सके) था, अतएव बाभ्रव्य के उस विशाल शास्त्र को संक्षिप्त कर, एक संक्षिप्त एवं पूर्ण इस
'कामसूत्र' की रचना की गयी है ॥ १४ ॥
तस्यायं प्रकरणाधिकरणसमुद्देशः ॥ १५ ॥
इस 'कामसूत्र' के प्रकरण, अधिकरण और समुद्देश की सूची इस प्रकार है ॥ १५ ॥
शास्त्रसंग्रहः। त्रिवर्गप्रतिपत्तिः। विद्यासमुद्देशः। नागरकवृत्तम्। नायक-
सहायदूतीकर्मविमर्शः। इति साधारणं प्रथमाधिकरणम्। अध्यायाः पञ्च।
प्रकरणानि पञ्च ॥ १६ ॥
'कामसूत्र' की विषयवस्तु—'साधारण' नामक प्रथम अधिकरण है, इसमें पाँच
अध्याय और पाँच ही प्रकरण हैं—(१) शास्त्रसंग्रह, (२) त्रिवर्गप्रतिपत्ति, (३) विद्यासमुद्देश,
(४) नागरकवृत्त और (५) नायकसहायदूतीकर्मविमर्श ॥ १६ ॥
प्रमाणकालाभावेभ्यो रतावस्थापनम्। प्रीतिविशेषाः। आलिङ्गनविचाराः।
चुम्बनविकल्पाः। नखरदनजातयः। दशनच्छेद्यविधयः। वेश्या-उपचाराः।
संवेशनप्रकाराः। चित्ररतानि। प्रहणनयोगाः। तद्युक्ताश्च। सीत्कृतोपक्रमाः।
पुरुषायितम्। पुरुषोपसृप्तानि। औपरिष्टकम्। रतारम्भावसानिकम्। रतविशेषाः।
प्रणयकलहः। इति साम्प्रयोगिकं द्वितीयमधिकरणम्। अध्याया दश। प्रकरणानि
सप्तदश ॥ १७ ॥
'साम्प्रयोगिक' नामक द्वितीय अधिकरण है, इसमें दश अध्याय और सत्रह प्रकरण हैं—
(१) प्रमाण, काल और भावों के अनुरूप रमण (सम्भोग) की व्यवस्था, (२) प्रीतिविशेष या
प्रीतिवर्णन, (३) आलिङ्गनविचार, (४) चुम्बनप्रकार, (५) नखक्षतप्रकार, (६) दन्त-
क्षतप्रकार, (७) विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित बाह्योपचार सम्बन्धी परम्पराएँ, (८) सम्भोग-
विधियाँ (९) विचित्र रत, (१०) प्रहणनप्रकार, (११) सीत्कार, (१२) पुरुषायित या विपरीत
रति, (१३) पुरुषोपसृप्त या पुरुष का निकट आना (सम्भोग से पूर्व की छेड़छाड़),
(१४) औपरिष्टक (मुखमैथुन), (१५) सम्भोग के समारम्भ और समापन के कर्तव्य,
(१६) रतविशेष और (१७) प्रणयकलह।
वरणविधानम्। सम्बन्धनिर्णयः। कन्याविस्रम्भणम्। बालाया उपक्रमाः।
इङ्गिताकारसूचनम्। एकपुरुषाभियोगः। प्रयोज्यस्योपावर्तनम्। अभियोगतश्च
कन्यायाः प्रतिपत्तिः विवाहयोगः। इति कन्यासम्प्रयुक्तकं तृतीयाधिकरणम्।
अध्यायाः पञ्च। प्रकरणानि नव ॥ १८ ॥
'कन्यासम्प्रयुक्तक' नामक तृतीय अधिकरण है, इसमें पाँच अध्याय और नौ प्रकरण
हैं—(१) कन्यावरण, (२) विवाह-सम्बन्ध का निर्णय, (३) कन्याविस्रम्भण—कन्या में
विश्वास जगाना, (४) कन्या में प्रेमोत्पत्ति, (५) इंगित और आकारविषयक सूचनाएँ, (६)
ईप्सित कन्या से विवाह करने का प्रयत्न, (७) कन्या द्वारा मनोवाञ्छित को आकर्षित करना,
(८) अपने प्रेमी की अभियोगों द्वारा प्राप्ति और (९) विवाह-सम्बन्ध ॥ १८ ॥
एकचारिणीवृत्तम्। प्रवासचर्या। सपत्नीषु ज्येष्ठावृत्तम्। कनिष्ठावृत्तम्।