वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१. साधारण अधिकरण ५
करना, (३) वाजीकरण के योग, (४) नष्टराग का पुनः उत्पादन, (५) सम्भोग-साधन की
वृद्धि के उपाय और (६) कुछ विचित्र अलौकिक योग ॥ २२ ॥
एवं षट्त्रिंशदध्यायाः। चतुःषष्टिः प्रकरणानि। अधिकरणानि सप्त। सपादं
श्लोकसहस्रम्। इति शास्त्रस्य संग्रहः ॥ २३ ॥
इस प्रकार इस 'कामसूत्र' में छत्तीस अध्याय, चौंसठ प्रकरण, सात अधिकरण और एक
हजार दो सौ पचास श्लोक हैं। इस प्रकार शास्त्रसंग्रह, विषयवस्तु (का सामान्य उल्लेख) समाप्त
हुआ ॥ २३ ॥
संक्षेपमिममुक्त्वास्य विस्तरोऽतः प्रवक्ष्यते।
इष्टं हि विदुषां लोके समासव्यासभाषणम् ॥ २४ ॥
इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे साधारणे प्रथमेऽधिकरणे
शास्त्रसंग्रहः प्रथमोऽध्यायः।
इस शास्त्र के संक्षिप्त उल्लेख—अधिकरण, अध्याय और प्रकरणों के नामोल्लेख को
कहकर, अब उसे विस्तारपूर्वक कहा जा रहा है, क्योंकि लोक में विद्वानों को संक्षेप और
विस्तार दोनों की इच्छा होती है ॥ २४ ॥
प्रथम अधिकरण में शास्त्रसंग्रह नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न॥
द्वितीय अध्याय
त्रिवर्गप्रतिपत्ति
शतायुर्वै पुरुषो विभज्य कालमन्योन्यानुबद्धं परस्परस्यानुपघातकं त्रिवर्गं
सेवेत ॥ १ ॥
कालविभाग—शतंजीवी विचारशील मनुष्य को चाहिये कि अपने जीवन को आश्रमों
में विभक्त कर धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों का इस प्रकार सेवन करे कि ये एक दूसरे से
सम्बद्ध भी रहें और परस्पर अनिष्टकर भी न हों ॥ १ ॥
बाल्ये विद्याग्रहणादीनर्थान् ॥ २ ॥
अवस्थानुरूप कालविभाग—बाल्यावस्था में विद्योपार्जन आदि बाल्योचित अर्थों का
सेवन करना चाहिये ॥ २ ॥
कामं च यौवने ॥ ३ ॥
युवावस्था में काम का सेवन करना चाहिये ॥ ३ ॥
स्थाविरे धर्मं मोक्षं च ॥ ४ ॥
वृद्धावस्था में धर्म और मोक्ष का सेवन करना चाहिये ॥ ४ ॥
अनित्यत्वादायुषो यथोपपादं वा सेवेत ॥ ५ ॥