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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 248 में से

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पृष्ठ 28

२ वात्स्यायन-कामसूत्र
एक सहस्र अध्याय वाले कामसूत्र को पृथक् कर कहा, अर्थात् एक सहस्र अध्यायों में उसका
स्वतन्त्र एवं विशद विवेचन किया ॥ ८ ॥
तदेव तु पञ्चभिरध्यायशतैरुद्दालकिः श्वेतकेतुः सञ्चिक्षेप ॥ ९ ॥
महर्षि उद्दालक के पुत्र श्वेतकेतु ने नन्दिकेश्वर के उस कामसूत्र को पाँच सौ अध्यायों में
संक्षिप्त करके निरूपित किया ॥ ९ ॥
तदेव तु पुनरर्ध्यर्धेनाध्यायशतेन साधारण-साम्प्रयोगिक-कन्यासम्प्रयुक्तक-
भार्याधिकारिक-पारदारिक-वैशिक-औपनिषदिकैः सप्तभिरधिकरणैर्बाभ्रव्यः
पाञ्चालः सञ्चिक्षेप ॥ १० ॥
इसके पश्चात् पांचाल देश के निवासी बभ्रु के पुत्र बाभ्रव्य ने श्वेतकेतु के पाँच सौ अध्याय
वाले कामसूत्र को साधारण, साम्प्रयोगिक, कन्यासम्प्रयुक्तक, भार्याधिकारिक, पारदारिक,
वैशिक और औपनिषदिक—इन सात अधिकरणों में विभक्त कर, एक सौ पचास अध्यायों में
संक्षिप्त किया ॥ १० ॥
तस्य षष्ठं वैशिकमधिकरणं पाटलिपुत्रिकाणां गणिकानां नियोगाद् दत्तकः
पृथक् चकार ॥ ११ ॥
पटना की वेश्याओं के अनुरोध पर, आचार्य दत्तक ने बाभ्रव्य द्वारा संक्षिप्त किये गये
कामशास्त्र के षष्ठ भाग—वैशिक अधिकरण को पृथक् किया (अर्थात् उसका स्वतन्त्र विवेचन
किया) ॥ ११ ॥
तत्प्रसङ्गात् चारायणः साधारणमधिकरणं पृथक् प्रोवाच। सुवर्णनाभः
साम्प्रयोगिकम्। घोटकमुखः कन्यासम्प्रयुक्तकम्। गोनर्दीयो भार्याधिकारिकम्।
गोणिकापुत्रः पारदारिकम्। कुचुमार औपनिषदिकमिति ॥ १२ ॥
(जिस प्रकार बाभ्रव्य के संक्षिप्त कामशास्त्र से आचार्य दत्तक ने वैशिक अधिकरण का
स्वतन्त्र विवेचन किया, उसी प्रकार) विशेष प्रयोजनवश चारायण ने साधारण अधिकरण,
सुवर्णनाभ ने साम्प्रयोगिक अधिकरण, घोटकमुख ने कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण, गोनर्द देश के
निवासी गोनर्दीय ने भार्याधिकारिक अधिकरण, गोणिकापुत्र ने पारदारिक अधिकरण और
कुचुमार ने औपनिषदिक अधिकरण का स्वतन्त्र विवेचन किया ॥ १२ ॥
एवं बहुभिराचार्यैस्तच्छास्त्रं खण्डशः प्रणीतमुत्सन्नकल्पमभूत् ॥ १३ ॥
कामशास्त्र बनाने का प्रयोजन—इस प्रकार बाभ्रव्यरचित वह शास्त्र विभिन्न आचार्यों
द्वारा विभिन्न खण्डों में पृथक् पृथक् लिखे जाने के कारण बिखर-सा गया ॥ १३ ॥
तत्र दत्तकादिभिः प्रणीतानां शास्त्रावयवानामेकदेशत्वात् महदिति च
बाभ्रवीयस्य दुरध्येयत्वात् संक्षिप्य सर्वमर्थमल्पेन ग्रन्थेन कामसूत्रमिदं
प्रणीतम् ॥ १४ ॥
क्योंकि दत्तक आदि आचार्यों ने पृथक्-पृथक् अधिकरणों को लेकर अपने ग्रन्थों की
रचना की थी, फलतः वे समस्त शास्त्र के अंशमात्र थे और आचार्य बाभ्रव्य का शास्त्र
साङ्गोपाङ्ग, किन्तु विशाल होने के कारण दुरध्येय (जिसका कठिनता से अध्ययन किया जा