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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 248 में से

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पृष्ठ 24

२० वात्स्यायन-कामसूत्र
कार्य, माँ के कार्य, बेटी का शिष्टाप्रदर्शन, माँ का आज्ञापालन, व्याधि का बहाना, बहाने का
फल, इसकी विधि, मिलनविषयक बातें, मनोरथकथन, दोषों को छिपाना, शयनविधि, देखने
की रीति, व्यवहार की रीति, बोलने की रीति, सहानुभूति के अवसर, नायक के साथ सहजीवन
को प्राथमिकता, जीवन सार्थक मानना, देवपूजा (कृतज्ञताप्रदर्शन), भोजन और अलङ्कार की
रीति, नायक से सन्तान की इच्छा, आवश्यक बातें, प्रतिकूल ऋतु में भी अभिसार, जन्मान्तर
सम्बन्धों की कामना, वशीकरण की शङ्का, माँ से विवाद, माँ को भयभीत करना, रहस्योद्घाटन
का प्रयास, धन के विषय में विवाद नहीं, सभी कार्यों में माता की सहमति, नायक के आने के
बाद के कृत्य, काकबलि, साथ ही मरना, आसक्त की पहचान, उपजीव्य का उल्लेख, वेश्या-
नायकों को शिक्षा।
तृतीय अध्याय १६६-१७१
अर्थागमोपायप्रकरण—कामशास्त्र के आचार्यों का मत, आचार्य वात्स्यायन का मत,
धनप्राप्ति के उपाय, वैशिक के धन की प्रशंसा, लूट का बहाना, अग्निकाण्ड या विनाश का
बहाना, स्वागत-सत्कार का खर्च, ऋण, प्रेमोपहार की विवशता, आवश्यक खर्चों में कटौती,
वैद्य और राजपुरुषों पर उपकार, मित्रों की सहायता, प्रिय वस्तु की बिक्री का बहाना, विशिष्ट
बर्तनों की माँग, नायक के प्रति कृतज्ञताज्ञापन, त्यागशीलता का दिखावा, बच्चों के समान
हठपूर्वक माँगना।
विरक्तप्रतिपत्तिप्रकरण—विरक्त के लक्षण, विरक्त पुरुष के कार्य, वेश्या के कार्य ।
निष्कासनक्रमप्रकरण—अकिञ्चन का निष्कासन, निष्कासन के प्रकट उपाय, सम्भोगकालीन
व्यवहार, बातें करने की रीति, अन्तिम उपाय, बाभ्रव्य का वैशिक, आचार्य दत्तक ने इतना ही
क्यों कहा ?।
चतुर्थ अध्याय १७१-१७६
विशीर्णप्रतिसन्धानप्रकरण—मिलने का कारण, विशीर्ण के विविध रूप — प्रथमः
दोनों ओर से स्वयं हटने वाला, द्वितीय : दोनों ओर से धक्के देकर निकाला गया, तृतीय यहाँ से
स्वयं निकाल वहाँ से निकाला गया, चतुर्थ : यहाँ से स्वयं हटकर वहाँ जमा, पंचम : यहाँ से
निकाला गया और वहाँ से स्वयं हटा, षष्ठ : यहाँ से निकाला गया और वहाँ जमा, प्रथम—न
मिलाने योग्य नायक, द्वितीय—अधिक लाभ पर स्वीकार्य, निर्धन या दुष्ट का संसर्ग योग्य नहीं,
तृतीय—अधिक धन पर स्वीकार्य, चतुर्थ—विचारणीय, संसर्ग योग पक्ष, असंसर्ग योग्य पक्ष,
पंचम—विचारणीय, संसर्गयोग्य पक्ष, असंसर्गयोग्य पक्ष, षष्ठ—नायक का विचार, इसके
कारण, पूर्वकृत उपकारों से प्रेम की पहचान, पूर्वपरिचित की श्रेष्ठता, आचार्य वात्स्यायन का
मत, पूर्वसंसृष्ट (वियुक्त) के भेद, पुरुष का स्वभाव ही प्रमुख, प्रतिसंधान के कारण—
वियुक्तगत कारण, वर्तमानगत कारण, नायक को परामर्श, नायिका को परामर्श, समर्थ और
अनुरक्त को प्राथमिकता, वियुक्त को मिलाते समय ध्यातव्य बातें।