वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणिका २१
पञ्चम अध्याय १७७-१८२
लाभविशेषप्रकरण—अपरिग्रह का कारण, एक रात की फीस, दूत भेजने की रीति,
अधिक लाभ की रीति, एक साथ आने वालों से अधिक लाभ, आचार्य वात्स्यायन का मत,
फीस का स्वरूप, समानता में प्राथमिकता, रागी से त्यागी की श्रेष्ठता, उपायों द्वारा रागी की
त्यागशीलता भी सम्भव, आचार्य वात्स्यायन का मत, निर्धन से धनवान् और त्यागशील से
कार्यसाधक श्रेष्ठ, आचार्य वात्स्यायन का मत, आवश्यकतानुसार विशिष्ट, कृतज्ञ और त्यागी,
त्यागी की न्यूनता, त्यागियों का स्वभाव, कृतज्ञ, रागी, त्यागी, कृतज्ञ : तीनों में विशेष,
मित्रवाक्य और अर्थप्राप्ति में प्राथमिकता, आचार्य वात्स्यायन का मत, मित्रों से अनुनय-विनय,
अर्थप्राप्ति और अनर्थनिवारण, आचार्य वात्स्यायन का मत, व्यवस्थाविषयक विचार, सिद्धान्त
का स्पष्टीकरण, उत्तम गणिका के लाभ, रूपाजीवा के लाभ, कुम्भदासी के लाभ, लाभ पर
आचार्यों का मत, आचार्य वात्स्यायन का मत, लाभ न लेने के स्थान, तत्काल लाभ के स्थान,
भविष्य में अल्प लाभ के स्थान, लाभ के स्थान, अग्राह्य पुरुष, ग्राह्य पुरुष, अर्थप्रयोजन वाले
नायक।
षष्ठ अध्याय १८२-१८९
अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारप्रकरण—अनर्थ की उत्पत्ति के कारण, इनके
दुष्परिणाम, उपाय का समुचित समय, अर्थत्रिवर्ग, अनर्थ-त्रिवर्ग, अनुबन्धस्वरूप, शुद्ध संशय,
संकीर्ण संशय, उभयतोयोग, समन्ततोयोग, दोनों त्रिवर्ग, अर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध,
अनुबन्धरहित अर्थ, अर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध, अनर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध,
अनुबन्धरहित अनर्थ, अनर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध, अर्थ और काम की सम्बन्ध योजना,
शुद्धसंशय : अर्थसंशय, धर्मसंशय, कामसंशय, अनर्थसंशय, अधर्मसंशय, द्वेषसंशय, संकीर्ण
संशय, विरुद्ध संकीर्ण—अर्थ और अनर्थ की संकीर्णता, धर्म और अधर्म की संकीर्णता, काम
और द्वेष की संकीर्णता, अविरुद्ध संकीर्ण—श्वेतकेतु के उभयतोयोग—उभयतः अर्थ योग,
उभयतः अनर्थयोग, उभयतः अर्थसंशय, उभयतः अनर्थसंशय, बाभ्रवीयों के उभयतो योग,
उभयतः अर्थयोग, उभयतः अर्थसंशय, उभयतः अनर्थसंशय, उभयतः संकीर्ण योग, विवेचन
का प्रयोजन, अवशिष्टों के शुद्ध, संकीर्ण और संश्लिष्ट, उभयतो योगों का समष्टिविचार,
समन्ततोयोग—गोष्ठीपरिग्रह, समन्ततो योग में वेश्या का कर्तव्य, स्पर्धा का कारण, लाभनिर्देश,
वेश्याभेद, उपसंहार, महर्षि से मतभेद, वेश्या का स्वरूप, वैशिक को परामर्श।
७. औपनिषदिक नामक सप्तम अधिकरण
प्रथम अध्याय १८९-१९६
सुभगंकरणादिप्रकरण—सुभगंकरण योग, सौन्दर्यवर्धक योग, सुभगंकर काजल,
सुभगंकर तैल, सुभगंकर माला, सुभगंकर चटनी, सुभगंकर लेप, सुभगंकर यन्त्रधारण,
परिचारिका का सौभाग्यवर्धन, वेश्यापुत्री के विवाह की रीति, वेश्यापुत्री का कर्तव्य, रसिकों
का दर्शन, पाणिग्रहण, विना धन मिले भी प्रदर्शन, धन वसूलने की रीति, प्राच्य देशों की