सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 36

१० वात्स्यायन-कामसूत्र
शरीर की स्थिति का कारण होने से काम भी आहार के समान ही है, और धर्म एवं अर्थ
का फलरूप काम ही है ॥ ३७ ॥
बोद्धव्यं तु दोषेष्विव। नहि भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्रीयन्ते। नहि
मृगाः सन्तीति यवा नोप्यन्त इति वात्स्यायनः ॥ ३८ ॥
यदि कामसेवन से दोष उत्पन्न होते हैं, तो उन्हें भी अन्नादि के दोषों के समान ही समझना
चाहिये और उन्हें दूर करने के उपाय करने चाहिये। पर यह बात तर्कसङ्गत नहीं है कि भिक्षुक
हैं तो भोजन बनाने के लिये चूल्हा ही न जलाया जाये, और मृग हैं तो जौं (अन्न) ही न बोया
जाये—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ ३८ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
एवमर्थं च कामं च धर्मं चोपाचरन्नरः।
इहामुत्र च निःशल्यमत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ ३९ ॥
अनुष्ठान करने का फल—इस विषय में प्राचीन लोगों के श्लोक देते हैं—
इस प्रकार धर्म, अर्थ और काम की प्राप्ति के लिये प्रयत्नशील मनुष्य, इस लोक में और
परलोक में निष्कण्टक सुख प्राप्त करता है ॥ ३९ ॥
किं स्यात् परत्रेत्याशङ्का कार्ये यस्मिन्न जायते।
न चार्थघ्नं सुखं चेति शिष्टास्तत्र व्यवस्थिताः ॥
त्रिवर्गसाधकं यत् स्याद् द्वयोरेकस्य वा पुनः।
कार्यं तदपि कुर्वीत न त्वेकार्थं द्विबाधकम् ॥ ४० ॥
जिस अर्थ के करने में यह शंका न हो कि परलोक में क्या होगा, और जो सुख अर्थ का
नाश न करे, शिष्ट पुरुष उसी के अनुष्ठान में लगते हैं। जो कार्य त्रिवर्ग का साधक हो, या दो का
अथवा एक का ही साधक हो, उसे करना चाहिये; परन्तु जो धर्म, अर्थ या काम केवल अपना
साधक हो तथा शेष दो का विघातक हो, उसे नहीं करना चाहिये ॥ ४० ॥
त्रिवर्गप्रतिपत्तिप्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
●
तृतीय अध्याय
विद्यासमुद्देशप्रकरण
धर्मार्थाङ्गविद्याकालाननुपरोधयन् कामसूत्रं तदङ्गविद्याश्च पुरुषो-
ऽधीयीत ॥ १ ॥
कामसूत्र का अध्ययनकाल—पुरुषों को धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा इन दोनों की
अङ्गभूत विद्याओं के साथ ही मध्य मध्य में कामसूत्र और उसकी अङ्गभूत विद्याओं का भी
अध्ययन करना चाहिये ॥ १ ॥