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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

१७८ वात्स्यायन-कामसूत्र
लोग जिसे अभीष्ट समझें अथवा जिस नायक को अधिक गुणी, सुन्दर और प्रभावशाली समझें,
उसी की दी हुई वस्तु ग्रहण करे ॥ ८ ॥
रागित्यागिनोस्त्यागिनि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ ९ ॥
रागी से त्यागी की श्रेष्ठता—अनुरक्त नायक की अपेक्षा दानशील त्यागी से अधिक लाभ
प्रत्यक्ष ही है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ ९ ॥
शक्यो हि रागिणि त्याग आधातुम् ॥ १० ॥
उपायों द्वारा रागी की त्यागशीलता भी सम्भव—अनुरक्त नायक को उपायों द्वारा
त्यागशील बनाया जा सकता है ॥ १० ॥
लुब्धोऽपि हि रक्तस्त्यजति न तु त्यागी निर्बन्धाद्रज्यत इति वात्स्यायनः ॥ ११ ॥
अनुरक्त होने पर तो लोभी पुरुष भी धन दे सकता है, किन्तु त्यागशील को उपायों द्वारा
अनुरक्त नहीं किया जा सकता—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ११ ॥
तत्रापि धनवदधनवतोर्धनवति विशेषः । त्यागप्रयोजनकर्त्रोः प्रयोजनकर्तरि
विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ १२ ॥
निर्धन से धनवान् और त्यागशील से कार्यसाधक श्रेष्ठ—इसमें भी निर्धन की अपेक्षा
धनवान् श्रेष्ठ है और त्यागशील की अपेक्षा वेश्या का स्वार्थसाधक श्रेष्ठ है—ऐसा कामशास्त्र के
पूर्व आचार्यों का मत है ॥ १२ ॥
प्रयोजनकर्ता सकृत्कृत्वा कृतिनमात्मानं मन्यते त्यागी पुनरतीतं नापेक्षत इति
वात्स्यायनः ॥ १३ ॥
वेश्या का कार्य सिद्ध करने वाला तो एक बार कार्य सिद्ध करके अपने को कृती मान लेता
है, किन्तु त्यागशील तो अतीत में दिये गये धन के विषय में सोचता ही नहीं है—ऐसा आचार्य
वात्स्यायन का मत है ॥ १३ ॥
तत्राप्यात्ययिकतो विशेषः ॥ १४ ॥
आवश्यकतानुसार विशिष्ट—आवश्यकतानुसार इन दोनों में भी विशेषता होती
है ॥ १४ ॥
कृतज्ञत्यागिनोस्त्यागिनि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ १५ ॥
कृतज्ञ और त्यागी—कृतज्ञ और त्यागी—दोनों में त्यागी से विशेष लाभ प्राप्त किया जा
सकता है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ १५ ॥
चिरमाराधितोऽपि त्यागी व्यलीकमेकमुपलभ्य प्रतिगणिकया वा
मिथ्यादूषितः श्रममतीतं नापेक्षते ॥ १६ ॥
त्यागी की न्यूनता—बहुत समय तक उपायों द्वारा सिद्ध किया गया त्यागी, वेश्या के एक
ही अपराध को देखकर अथवा प्रतिगणिका (स्पर्धी वेश्या) द्वारा बहकाये जाने पर वेश्या द्वारा
उठाये गये कष्टों को नहीं देखता ॥ १६ ॥
प्रायेण हि तेजस्विन ऋजवोजनादृताश्च त्यागिनो भवन्ति ॥ १७ ॥

६. वैशिक अधिकरण १७९
त्यागियों का स्वभाव—प्रायः त्यागी तेजस्वी, सरल (निष्कपट) और अनादर को न
सह पाने वाले होते हैं ॥ १७ ॥
कृतज्ञस्तु पूर्वश्रमापेक्षी न सहसा विरज्यते। परीक्षितशीलत्वाच्च न मिथ्या
दूष्यत इति वात्स्यायनः ॥ १८ ॥
कृतज्ञ—कृतज्ञ नायिका के परिश्रम को समझता है इसलिये अकस्मात् विरक्त नहीं होता।
क्योंकि वह नायिका के शील की परीक्षा किये रहता है इसलिये स्पर्धी वेश्या के बहकावे में नहीं
आता—ऐसा आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ १८ ॥
तत्राप्यायतितो विशेषः ॥ १९ ॥
रागी, त्यागी, कृतज्ञ—तीनों में विशेष—रागी, त्यागी और कृतज्ञ—इन तीनों में से
भविष्य के प्रभाव को देखकर ही लाभ उठाना चाहिये ॥ १९ ॥
मित्रवचनार्थगमयोरर्थागमे विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ २० ॥
मित्रवाक्य और अर्थप्राप्ति में प्राथमिकता—मित्रों के परामर्श और अर्थप्राप्ति—इन
दोनों में अर्थप्राप्ति में विशेष लाभ तो प्रत्यक्ष ही है—ऐसा कामशास्त्र के पूर्व आचार्यों का मत
है ॥ २० ॥
सोऽपि ह्यर्थागमो भविता। मित्रं तु सकृद्वाक्ये प्रतिहते कलुषितं स्यादिति
वात्स्यायनः ॥ २१ ॥
मित्रों का परामर्श न मानने पर धन तो मिलेगा ही, पर अपनी बात न मानने पर वे अप्रसन्न
हो जायेंगे—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ २१ ॥
तत्राप्यतिपाततो विशेषः ॥ २२ ॥
इस अर्थसञ्चय में भी फिर न मिलने वाले को प्राप्त कर लेना चाहिये। उस समय की
अपेक्षा से जो अर्थ फिर हाथ न आये, उसे प्राप्त कर लेना चाहिये, यह विशेष लाभ है ॥ २२ ॥
तत्र कार्यसन्दर्शनेन मित्रमनुनीय श्वोभूते वचनमस्त्विति ततोऽतिपातिनमर्थं
प्रतिगृह्णीयात् ॥ २३ ॥
मित्रों से अनुनय-विनय—कार्य के बहाने मित्र से अनुनय विनय कर तात्कालिक लाभ
प्राप्त कर ले और उनसे कहे कि कल आपकी बात अवश्य मानूँगी ॥ २३ ॥
अर्थगमानर्थप्रतीघातयोरर्थागमे विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ २४ ॥
अर्थप्राप्ति और अनर्थनिवारण—अर्थ की प्राप्ति और अनर्थ के निवारण में अर्थ की
प्राप्ति में ही विशेष लाभ है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ २४ ॥
अर्थः परिमितावच्छेदः, अनर्थः पुनः सकृत्प्रसृतो न ज्ञायते क्वावतिष्ठत इति
वात्स्यायनः ॥ २५ ॥
अर्थ की प्राप्ति तो नियमित रूप से होती ही रहती है, किन्तु यदि अनर्थ एक बार प्रारम्भ
हो जाये तो पता नहीं कब तक चलता रहे, इसलिये पहले उस पर ही ध्यान देना चाहिये—ऐसा
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ २५ ॥

१८० वात्स्यायन-कामसूत्र
तत्रापि गुरुलाघवकृतो विशेषः ॥ २६ ॥
व्यवस्थाविषयक विचार—यहाँ भी न्यूनाधिक समझकर ही विशेष को ग्रहण करना
चाहिये ॥ २६ ॥
एतेनार्थसंशयादनर्थप्रतीकारे विशेषो व्याख्यातः ॥ २७ ॥
सिद्धान्त का स्पष्टीकरण—इस कथन से यह बात भी कह दी गयी है कि अर्थ के संशय
से अनर्थ के निवारण में ही विशेष लाभ है ॥ २७ ॥
देवकुलतडागारामणां करणम्, स्थलीनामग्निचैत्यानां निबन्धनम्,
गोसहस्त्राणां पात्रान्तरितं ब्राह्मणेभ्यो दानम्, देवतानां पूजोपहारप्रवर्तनम्,
तद्व्ययसहिष्णोर्वा धनस्य परिग्रहणमित्युत्तमगणिकानां लाभातिशयः ॥ २८ ॥
उत्तम गणिकाओं के लाभ—देवमन्दिर बनवाना, कूआ-बावड़ी खुदवाना, बाग
लगवाना, आवागमन के लिये पुल बनवाना, निवासस्थान के बाहर मिट्टी का घर या मन्दिर
बनवाकर अग्निहोत्र कराना, किसी को माध्यम बनाकर ब्राह्मणों को एक हजार गायें दान देना,
देवताओं के भोग एवं प्रसाद का प्रबन्ध करना—इन धार्मिक और लोकोपकारी कार्यों के व्यय
को सहन कर ले, इतना धन उत्तम गणिकाओं का अतिशय लाभ है ॥ २८ ॥
सार्वाङ्गिकोऽलङ्कारयोगो गृहस्योदारस्य करणम्। महार्हैर्भाण्डैः परिचारकैश्च
गृहपरिच्छदस्योज्ज्वलतेति रूपाजीवानां लाभातिशयः ॥ २९ ॥
रूपाजीवा के लाभ—सम्पूर्ण शरीर पर आभूषण धारण करना, निवासस्थान को
कलात्मक ढंग से सजाकर रखना और उसमें बहुमूल्य बर्तनों और नौकरों द्वारा गृह के भीतरी
भाग को साफ-सुथरा और सुसज्जित रखना—ये रूपाजीवा के विशेष लाभ हैं ॥ २९ ॥
नित्यं शुक्लमच्छादनमपक्षुधमन्नपानं नित्यं सौगन्धिकेन ताम्बूलेन च योगः
सहिरण्यभागमलङ्करणमिति कुम्भदासीनां लाभातिशयः ॥ ३० ॥
कुम्भदासी के लाभ—नित्य साफ सुथरे कपड़े पहनना, भरपेट स्वादिष्ट भोजन करना,
सुगन्धित तेल प्रयोग करना, सुवासित पान खाना, चाँदी के आभूषणों के साथ एकाध सोने का
आभूषण भी पहनना—ये कुम्भदासियों के अतिशय लाभ हैं ॥ ३० ॥
एतेन प्रदेशेन मध्यमाधमानामपि लाभातिशयान् सर्वासामेव योजयेदित्या-
चार्याः ॥ ३१ ॥
लाभ पर आचार्यों का मत—जो ऊपर गणिका, रूपाजीवा और कुम्भदासी के विशेष
लाभ बताये गये हैं, उनको इसी रीति से मध्यम और अधम के साथ भी समझ लेना चाहिये—
यह कामशास्त्र के पूर्वाचार्यों का मत है ॥ ३१ ॥
देशकालविभवसामर्थ्यानुरागलोकप्रवृत्तिवशादनियतलाभादियमवृत्तिरिति
वात्स्यायनः ॥ ३२ ॥
देश, काल, वैभव, सामर्थ्य, अनुराग और लोकप्रवृत्ति (लोकाचार) के कारण लाभ
निश्चित नहीं रहता, अतएव वेश्या की वृत्ति सदैव अनियत और अनियमित रहती है—यह
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ३२ ॥

६. वैशिक अधिकरण १८१
गम्यमन्यतो निवारयितुकामा सक्तमन्यस्यामपहर्तुकामा वा अन्यां वा लाभतो
वियुयुक्षमाणागम्यसंसर्गादात्मनः स्थानं वृद्धिमायतिमभिगम्यतां च मन्यमाना
अनर्थप्रकारे वा साहाय्यमेनं कारयितुकामा सक्तस्य वान्यस्य व्यलीकार्थिनी
पूर्वोपकारमकृतमिव पश्यन्ती केवलप्रीत्यर्थिनी वा कल्याणबुद्धेरल्पमपि लाभं
प्रतिगृह्णीयात्॥ ३३॥
अल्प लाभ के स्थान—यदि वेश्या अपने नायक को किसी अन्य वेश्या के पास जाने से
रोकना चाहे, अन्य नायिका के धनवान् नायक को आकृष्ट करना चाहे, अन्य नायिका को
आर्थिक हानि पहुँचाना चाहे, नायक के साथ संसर्ग से उचित स्थान, वृद्धि, उज्ज्वल भविष्य और
नायकों की इच्छा की वस्तु बनवाना चाहे, अनर्थों के निवारण में उसकी सहायता की इच्छा रखे
अथवा पहले किये गये उपकारों को भूलकर निर्धन नायक को निकलवाना चाहे और किसी
शुभचिन्तक प्रेमी को अपना बनाना चाहे तो वेश्या अल्प लाभ भी ले सकती है॥ ३३॥
आयत्यर्थिनी तु तमाश्रित्य चानर्थं प्रतिचिकीर्षन्ती नैव प्रतिगृह्णीयात्॥ ३४॥
लाभ न लेने के स्थान—भविष्य में प्रभाव चाहने वाली वेश्या, जिसके बल पर अनर्थों
को रोकना चाहे, उससे कुछ न ले॥ ३४॥
त्यक्ष्याम्येनमन्यतः प्रतिसन्धास्यामि, गमिष्यति दारैर्योक्ष्यते नाशयिष्यत्य-
नर्थान्, अङ्कुशभूत उत्तराध्यक्षोऽस्यागमिष्यति स्वामी पिता वा, स्थानभ्रंशो वास्य
भविष्यति चलचित्तश्चेति मन्यमाना तदात्वे तस्माल्लाभमिच्छेत्॥ ३५॥
तत्काल लाभ के स्थान—इस नायक को छोड़कर अन्य से सम्बन्ध बनाऊँगी, यह
स्वयं चला जायेगा, अपनी स्त्रियों से मिल जायेगा, यह अनर्थों को नष्ट कर देगा, इसके ऊपर
स्वामी या पिता का अंकुश विद्यमान है अथवा इसका पद या अधिकार भ्रष्ट हो जायेगा, यह
चञ्चल चित्त का व्यक्ति है—यदि वेश्या ऐसा समझे तो तत्काल जो लाभ मिल सकता हो, प्राप्त
कर ले॥ ३५॥
प्रतिज्ञातमीश्वरेण प्रतिग्रहं लप्स्यते अधिकरणं स्थानं वा प्राप्स्यति वृत्ति-
कालोऽस्य वा आसन्नः वाहनमस्यागमिष्यति स्थलपत्रं वा सस्यमस्य पक्ष्यते कृतम-
स्मिन्न नश्यति नित्यमविसंवादको वेत्यायत्यामिच्छेत्। परिग्रहकल्पं वाचरेत्॥ ३६॥
भविष्य में लाभ के स्थान— राज्य या शासन से इसे धन की प्राप्ति निश्चित रूप से होगी,
इसको महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त होगा या इसे किसी प्राधिकरण का प्रमुख बनाया जायेगा, इसकी
जीविकाप्राप्ति का समय निकट ही है, इसका वाहन व्यापारिक वस्तुएँ बेचकर शीघ्र ही आने
वाला है, इसकी भूमि उर्वर है, इसकी फसल पक रही है, यह कृतज्ञ है, इसलिये इसके साथ
संसर्ग हानिकारक नहीं है, यह कभी झूठ नहीं बोलता, इसलिये कहकर अवश्य देगा—यदि
ऐसी स्थिति हो तो भविष्य में लाभ की इच्छा रखे और पत्नी के समान उसकी सेवा करे॥ ३६॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
कृच्छाधिगतवित्तांश्च राजवल्लभनिष्ठुरान्।
आयत्यां च तदात्वे च दूरादेव विवर्जयेत्॥ ३७॥

१८२ वात्स्यायन-कामसूत्र
अग्राह्य पुरुष—जिन्हें कठिनता से धन मिला हो, जो राजा को प्रसन्न करने के लिये क्रूर
कर्म करते हों, उनसे तत्काल या भविष्य में अधिक लाभ की सम्भावना भी हो तब भी उनसे दूर
ही रहना चाहिये ॥ ३७ ॥
अनर्थो वर्जने येषां गमनेऽभ्युदयस्तथा।
प्रयत्नेनापि तान् गृह्य सापदेशमुपक्रमेत् ॥ ३८ ॥
ग्राह्य पुरुष—जिनको ना करने पर अनर्थ की सम्भावना हो और मिलने पर अभ्युदय की
प्राप्ति निश्चित हो, ऐसे नायकों को प्रयत्नपूर्वक आकृष्ट करके समागम का अवसर देना
चाहिये ॥ ३८ ॥
प्रसन्ना ये प्रयच्छन्ति स्वल्पेऽप्यगणितं वसु।
स्थूललक्ष्यान्महोत्साहाँस्तान् गच्छेत् स्वैरपि व्ययैः ॥ ३९ ॥
अर्थप्रयोजन के पूरक नायक—जो अल्प प्रसन्नता पर भी असीमित धन दे देते हैं, ऐसे
स्थूल लक्ष्य वाले पुरुषों को अपना धन खर्च करके भी मिलाना चाहिये ॥ ३९ ॥
लाभविशेषप्रकरण नामक पञ्चम अध्याय पूर्ण हुआ ॥
●
षष्ठ अध्याय
अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारप्रकरण
अर्थानाचर्यमाणानर्था अप्यनूद्भवन्त्यनुबन्धाः संशयाश्च ॥ १ ॥
अर्थोपार्जन के लिये प्रयास करती हुई वेश्या के समक्ष अनेक प्रकार के अनर्थ, अनुबन्ध
और संशय उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १ ॥
ते बुद्धिदौर्बल्यादतिरागादत्यभिमानादतिदम्भादत्यार्जवादतिविश्वासादति-
क्रोधात् प्रमादात् साहसाद्दैवयोगाच्च स्युः ॥ २ ॥
अनर्थत्रिवर्ग की उत्पत्ति के कारण—अनर्थ, उनके अनुबन्ध और संशय इन कारणों
से उत्पन्न होते हैं—बुद्धि की दुर्बलता से, अधिक प्रेम से, अतिशय अभिमान से, अत्यधिक
सरलता से, अत्यन्त विश्वास करने से, अतिक्रोध से, प्रमाद (असावधानी) से, अविवेकपूर्ण कार्य
करने से और दैवयोग से ॥ २ ॥
तेषां फलम्—कृतस्य व्ययस्य निष्फलत्वमनायतिरागमिष्यतोऽर्थस्य निवर्तन-
प्राप्तस्य निष्क्रमणं पारुष्यस्य प्राप्तिर्गर्भ्यता शरीरस्य प्रघातः केशानां छेदनं
पातनमङ्गवैकल्यापत्तिः ॥ ३ ॥
दुष्परिणाम—इनके ये दुष्परिणाम हैं—किये गये खर्च का निष्फल हो जाना, प्रभाव और
अनुराग का मिट जाना, हाथ आते धन का न मिलना और प्राप्त धन का हाथ से निकल जाना,

६. वैशिक अधिकरण १८३
स्वभाव में कठोरता आना, अपनी गम्यता और शरीर का उपघात (विनाश), बालों का काट
लिया जाना, बन्धन एवं ताड़न तथा अङ्ग-भङ्ग कर देना ॥ ३ ॥
तस्मात्तानादित एव परिजिहीर्षेदर्थभूयिष्ठाँश्चोपेक्षेत ॥ ४ ॥
उपाय का समुचित समय—अतएव वेश्या को चाहिये कि बुद्धि की दुर्बलता आदि
अनर्थ के कारणों को प्रारम्भ से ही दूर कर दे और यदि उनसे अधिक धन भी मिलता हो तो भी
उनकी उपेक्षा कर दे ॥ ४ ॥
अर्थो धर्मः काम इत्यर्थत्रिवर्गः ॥ ५ ॥
अर्थ, धर्म और काम—यह अर्थत्रिवर्ग कहलाता है ॥ ५ ॥
अनर्थोऽधर्मो द्वेष इत्यनर्थत्रिवर्गः ॥ ६ ॥
अनर्थत्रिवर्ग—अनर्थ, अधर्म और द्वेष—यह अनर्थत्रिवर्ग है ॥ ६ ॥
तेष्वाचर्यमाणेष्वन्यस्यापि निष्पत्तिरनुबन्धः ॥ ७ ॥
अनुबन्ध-स्वरूप—अर्थ आदि को सिद्ध करते हुए, उसके साथ जो दूसरा स्वतः सिद्ध
हो जाये, उसे 'अनुबन्ध' कहते हैं ॥ ७ ॥
सन्दिग्धायां तु फलप्राप्तौ स्याद्वा न वेति शुद्धसंशयः ॥ ८ ॥
शुद्धसंशय—'यह होगा या नहीं'? इस प्रकार फलप्राप्ति में सन्देह होना 'शुद्ध संशय'
कहलाता है ॥ ८ ॥
इदं वा स्यादिदं वेति सङ्कीर्णः ॥ ९ ॥
संकीर्णसंशय—'यह फल होगा या यह फल'?—यह सङ्कीर्णसंशय है ॥ ९ ॥
एकस्मिन् क्रियमाणे कार्ये कार्यद्वयस्योत्पत्तिरुभयतोयोगः ॥ १० ॥
उभयतोयोग—जब एक कार्य करने पर दूसरे कार्य की उत्पत्ति स्वतः हो जाये तो उसे
'उभयतो योग' कहते हैं ॥ १० ॥
समन्तादुत्पत्तिः समन्ततोयोग इति तानुदाहरिष्यामः ॥ ११ ॥
समन्ततोयोग—जब चारों ओर से उत्पत्ति हो तो उसे 'समन्ततो योग' कहते हैं। इसके
उदाहरण आगे देंगे ॥ ११ ॥
विचारितरूपोऽर्थत्रिवर्गः। तद्विपरीत एवानर्थत्रिवर्गः ॥ १२ ॥
दोनों त्रिवर्ग—जिसके स्वरूप पर विचार किया जा चुका है वह अर्थत्रिवर्ग है। इसके
विपरीत अनर्थत्रिवर्ग है ॥ १२ ॥
यस्योत्तमस्याभिगमने प्रत्यक्षतोऽर्थलाभो ग्रहणीयत्वमायतिरागमः प्रार्थनीयत्वं
चान्येषां स्यात्सोऽर्थोऽर्थानुबन्धः ॥ १३ ॥
अर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध—जिस उत्तम नायक के साथ समागम करने पर
नायिका को केवल अर्थलाभ ही न हो, अपितु उस का प्रभाव बढ़ जाये, वह अन्य नायकों के
लिये आकांक्षा की वस्तु बन जाये, वे समागम हेतु प्रार्थना करें और नायिका को अर्थ की प्राप्ति
हो तो यह अर्थ प्रथम या प्रधान अर्थ के साथ सम्बद्ध होने के कारण अर्थोऽर्थानुबन्धः (अर्थ का
अर्थ के साथ अनुबन्ध) कहलाता है ॥ १३ ॥

१८४ वात्स्यायन-कामसूत्र
लाभमात्रे कस्यचिदन्यस्य गमनं सोऽर्थो निरनुबन्धः ॥ १४ ॥
अनुबन्धरहित अर्थ—केवल अर्थलाभ की दृष्टि से किसी से भी समागम कर लेना
अनुबन्धरहित अर्थ है ॥ १४ ॥
अन्यार्थपरिग्रहे सक्तादायतिच्छेदनमर्थस्य निष्क्रमणं लोकविद्विष्टस्य वा
नीचस्य गमनमायतिघ्नमर्थोऽनर्थानुबन्धः ॥ १५ ॥
अर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध—नायक के हाथों पराया (चुराया हुआ) अर्थ लेने से
वेश्या का प्रभाव कम होता है और वह अर्थ भी निकल जाता है अथवा लोकद्रोही या अधम
पुरुष के साथ समागम करने से प्रभाव कम होता है और ऐसा अर्थ अनेक अनर्थों को उत्पन्न
करता है, अतएव इसे अर्थोऽनुर्थानुबन्धः (अर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध) कहते हैं ॥ १५ ॥
स्वेन व्ययेन शूरस्य महामात्रस्य प्रभवतो वा लुब्धस्य गमनं निष्फलमपि
व्यसनप्रतीकारार्थं महतश्चार्थघ्नस्य निमित्तस्य प्रशमनमायतिजननं वा सोऽनर्थो-
ऽर्थानुबन्धः ॥ १६ ॥
अनर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध—अपने व्यय पर किसी शूरवीर, प्रभावशाली पुरुष,
महामन्त्री या लोभी के साथ समागम निष्फल (तत्काल अर्थहीन) होने पर भी सङ्कट के निवारण
के लिये, महान् अर्थनाशक कारणों को शान्त करने के लिये और प्रभाव बढ़ाने के लिये तो है।
इस प्रकार अर्थप्राप्ति रूप एक प्रयोजन के सिद्ध न होने पर भी अनेक प्रयोजन सिद्ध करने वाला
है—इसे ही 'अनर्थोऽर्थानुबन्धः'—अनर्थ का अर्थ से अनुबन्ध कहा जाता है ॥ १६ ॥
कदर्यस्य सुभगमानिनः कृतघ्नस्य वातिसन्धानशीलस्य स्वैरपि व्ययैस्तथारा-
धनमन्ते निष्फलं सोऽनर्थो निरनुबन्धः ॥ १७ ॥
अनुबन्धरहित अनर्थ—अपने को सुन्दर समझने वाले, कृपण, कृतघ्न या अत्यधिक
चाटुकारिता चाहने वाले पुरुष के साथ जब वेश्या अपने व्यय पर समागम करती है तो उसका
धन और अनुराग, दोनों ही निष्फल हो जाते हैं। किसी के भी साथ सम्बद्ध न होने के कारण
ऐसा अनर्थ अनुबन्धरहित कहलाता है ॥ १७ ॥
तस्यैव राजवल्लभस्य क्रौर्यप्रभावाधिकस्य तथैवाराधनमन्ते निष्फलं
निष्कासनं च दोषकरं सोऽनर्थोऽनर्थानुबन्धः ॥ १८ ॥
अनर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध—कृपण पुरुषों से केवल अनुबन्धरहित अनर्थ ही
उत्पन्न हो, ऐसा नहीं है; कभी-कभी अनर्थ से सम्बन्धित अनर्थ भी उत्पन्न हो जाते हैं। इसी
प्रकार किसी क्रूर राजपुरुष या प्रशासनिक अधिकारी के साथ समागम करना निष्फल होता है
और उसे निकाल देना अनेक अनर्थों को उत्पन्न करने वाला बन जाता है। इस प्रकार यह अनर्थ
अपने साथ अनेक अनर्थों का सम्बन्ध रखने के कारण ‘अनर्थोऽनर्थानुबन्धः' (अनर्थ का अनर्थ
के साथ अनुबन्ध) कहलाता है ॥ १८ ॥
एवं धर्मकामयोरप्यनुबन्धान् योजयेत् ॥ १९ ॥
धर्म और काम की अनुबन्ध योजना—इसी प्रकार धर्म और काम के अनुबन्धों की भी
योजना कर लेनी चाहिये ॥ १९ ॥

६. वैशिक अधिकरण १८५
परस्परेण च युक्त्या सङ्किरेदित्यनुबन्धाः ॥ २० ॥
इनको परस्पर युक्तिपूर्वक मिलाये । इस प्रकार अनुबन्ध पूर्ण हुए ॥ २० ॥
परितोषितोऽपि दास्यति न वेत्यर्थसंशयः ॥ २१ ॥
शुद्धसंशय : अर्थसंशय—सन्तुष्ट होने पर भी देगा या नहीं ? यह अर्थसंशय है ॥ २१ ॥
निष्पीडितार्थमफलमुत्सृजन्त्या अर्थमलभमानाया धर्मः स्यान्न वेति धर्म-
संशयः ॥ २२ ॥
धर्मसंशय—जिसका समस्त धन निचोड़ लिया हो और उससे कुछ धन का मिल पाने
के कारण उसे छोड़ने को उद्यत हो, अर्थ न मिल पाने पर उसे छोड़ना वेश्या के लिये धर्म होगा
या नहीं ?—इस प्रकार का संशय धर्मसंशय है ॥ २२ ॥
अभिप्रेतमुपलभ्य परिचारकमन्यं वा क्षुद्रं गत्वा कामः स्यान्न वेति काम-
संशयः ॥ २३ ॥
कामसंशय—अभीष्ट नायक को पाकर भी किसी अन्य आत्मीय सेवक या क्षुद्रव्यक्ति के
निकट जाकर 'इसके साथ समागम करने पर काम होगा या नहीं' ? इस प्रकार का सन्देह करना
कामसंशय कहलाता है ॥ २३ ॥
प्रभाववान् क्षुद्रोऽनभिगतोऽनर्थं करिष्यति न वेत्यनर्थसंशयः ॥ २४ ॥
अनर्थसंशय—प्रभावशाली नीच पुरुष समागम का अवसर न मिलने पर अनर्थ करेगा या
नहीं ?—यह अनर्थसंशय है ॥ २४ ॥
अत्यन्तनिष्फलः सक्तः परित्यक्तः पितृलोकं यायात्तत्राधर्मः स्यान्न वेत्यधर्म-
संशयः ॥ २५ ॥
अधर्मसंशय—समागम के लिये उत्सुक निर्धन नायक को प्रयोजनहीन मानकर छोड़
दिया गया हो और फिर यह सोचा जाये कि यदि यह मर जाये तो अधर्म होगा या नहीं ?—ऐसा
सन्देह अधर्मसंशय कहलाता है ॥ २५ ॥
रागस्यापि विवक्षायामभिप्रेतमनुपलभ्य विरागः स्यान्न वेति द्वेषसंशयः । इति
शुद्धसंशयाः ॥ २६ ॥
द्वेषसंशय—कामव्यथा से पीड़ित वेश्या अभीष्ट नायक को न पाकर जब कामव्यथा के
शमन के लिये छटपटाती है, उस समय उसे बिना मिले विराग होगा या नहीं, यह सन्देह
द्वेषसंशय कहलाता है। इस प्रकार शुद्ध संशयवर्णन पूर्ण हुआ । ॥ २६ ॥
अथ सङ्कीर्णाः ॥ २७ ॥
सङ्कीर्णसंशय—अब सङ्कीर्णसंशयों को कहते हैं ॥ २७ ॥
आगन्तोरविदितशीलस्य वल्लभसंश्रयस्य प्रभविष्णोर्वा समुपस्थितस्यारा-
धनमर्थोऽनर्थ इति संशयः ॥ २८ ॥
अर्थ और अनर्थ की संकीर्णता—आश्रित या प्रभावशाली नायक की उपस्थिति में यदि
अपरिचित पुरुष समागम के लिये आ जाये तो उसका आराधन अर्थकर है या अनर्थकर ?—यह
सन्देह होना—यह अर्थ और अनर्थ का संशय है ॥ २८ ॥

१८६ वात्स्यायन-कामसूत्र
श्रोत्रियस्य ब्रह्मचारिणो दीक्षितस्य व्रतिनो लिङ्गिनो वा मां दृष्ट्वा जातरागस्य
मुमूर्षोर्मित्रवाक्यादानृशंस्याच्च गमनं धर्मोऽधर्म इति संशयः ॥ २९ ॥
धर्म और अधर्म की संकीर्णता—अपने को देखकर अनुरक्त हुए वेदपाठी ब्राह्मण,
ब्रह्मचारी, दीक्षित, व्रती, साधु या मरने की इच्छा रखने वाले पुरुष के साथ मित्र के कथन पर
अथवा अपनी दयालुता के कारण वेश्या का समागम करना धर्म होगा या अधर्म?—यह
धर्माधर्मसंशय कहलाता है ॥ २९ ॥
लोकादेवाकृतप्रत्ययादगुणो गुणवान् वेत्यनवेक्ष्य गमनं कामो द्वेष इति
संशयः ॥ ३० ॥
काम और द्वेष की सङ्कीर्णता—'यह गुणवान् है अथवा गुणहीन है' इस बात का स्वयं
विचार करके केवल लोकप्रवाद (संसार के कहने पर) से नायक के साथ समागम करने पर
काम होगा या द्वेष?—इस प्रकार का सन्देह काम और द्वेष की सङ्कीर्णता कहलाता है ॥ ३० ॥
सङ्किरेच्च परस्परेणेति सङ्कीर्णसंशयाः ॥ ३१ ॥
जो परस्पर मिलने से संशय हो, वे सङ्कीर्णसंशय हैं। इस प्रकार सङ्कीर्णसंशय पूर्ण
हुए ॥ ३१ ॥
यत्र परस्याभिगमनेऽर्थः सक्ताच्च सङ्घर्षतः स उभयतोऽर्थः ॥ ३२ ॥
उभयतः अर्थयोग—दूसरे नायक से अर्थ लेकर समागम करने से वेश्या पर आसक्त
नायक भी दूसरे नायक से सम्बन्ध-विच्छेद करने के लिये अर्थ देता है, तो दोनों ओर से अर्थ का
योग होने से यह 'उभयतो अर्थयोग' हुआ ॥ ३२ ॥
यत्र स्वेन व्ययेन निष्फलमभिगमनं सक्ताच्चामर्षिताद्वित्तप्रत्यादानं स उभ-
यतोऽनर्थः ॥ ३३ ॥
उभयतः अनर्थयोग—जहाँ नायिका अपना धन व्यय करके नायक के साथ समागम
करती है और निष्फल रहता है तथा दूसरी ओर अप्रसन्न अनुरक्त नायक से उसके द्वारा दिये गये
अर्थ के छिन जाने का भय हो तो इसे 'उभयतः अनर्थयोग' कहते हैं ॥ ३३ ॥
यत्राभिगमनेऽर्थो भविष्यति न वेत्याशङ्का सक्तोऽपि सङ्घर्षाद्दास्यति न वेति स
उभयतोऽर्थसंशयः ॥ ३४ ॥
उभयतः अर्थसंशय—जिस समागम में 'अर्थ प्राप्त होगा या नहीं'? यह शंका हो और
अनुरक्त नायक भी संघर्ष के कारण देगा या नहीं—यह संशय हो तो इसे 'उभयतः अर्थसंशय'
कहा जाता है ॥ ३४ ॥
यत्राभिगमने व्ययवति पूर्वो विरुद्धः क्रोधादपकारं करिष्यति न वेति सक्तो
वामर्षितो दत्तं प्रत्यादास्यति न वेति स उभयतोऽनर्थसंशयः। इत्यौद्दालकेरुभयतो
योगाः ॥ ३५ ॥
उभयतो अनर्थसंशय—अपने पास से व्यय करके अपूर्व नायक के साथ समागम करना
पड़े, इससे पूर्व नायक क्रोधवश अपकार कर देगा या नहीं?—यह संशय हो अथवा अनुरक्त
नायक भी अप्रसन्न होकर दिये गये धन को वापस न ले ले?—यह संशय हो। इस प्रकार दोनों

६. वैशिक अधिकरण १८७
ओर से अनर्थ का संशय होने पर 'उभयतः अनर्थसंशय' होता है। उद्दालक के पुत्र श्वेकेतु
द्वारा कहे गये उभयतो योग पूर्ण हुए॥ ३५ ॥
बाभ्रवीयास्तु ॥ ३६ ॥
इस विषय में आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायी यह बताते हैं ॥ ३६ ॥
यत्राभिगमनेऽर्थोनभिगमने च सक्तादर्थः स उभयतोऽर्थः ॥ ३७॥
उभयतः अर्थयोग—जिस उभयतो योग में पूर्व नायक से समागम किये बिना ही दूसरे
(अपूर्व) से अर्थ प्राप्त कर लिया जाये और बाद में अनुरक्त नायक को भी प्रसन्न कर अर्थ प्राप्त
किया जाये तो वह 'उभयतः अर्थयोग' कहलाता है ॥ ३७ ॥
यत्राभिगमने निष्फलो व्ययोऽनभिगमने च निष्प्रतीकारोऽनर्थः स उभयतोऽ-
नर्थः ॥ ३८ ॥
उभयतः अनर्थयोग—जिस समागम में निष्फल व्यय हो और समागम न करने पर
अपरिहार्य संकट आने की आशंका हो, वह 'उभयतः अनर्थयोग' कहलाता है ॥ ३८ ॥
यत्राभिगमने निर्व्ययो दास्यति न वेति संशयोऽनभिगमने सक्तो दास्यति न वेति
स उभयतोऽर्थसंशयः ॥ ३९ ॥
उभयतो अर्थसंशय—जिस समागम में अपना तो कुछ खर्च न हो, लेकिन देगा या
नहीं? यह सन्देह बना हुआ हो और अनुरक्त नायक भी बिना समागम के देगा या नहीं? —यह
संशय हो तो यह 'उभयतः अर्थसंशय' कहलाता है ॥ ३९ ॥
यत्राभिगमने व्ययवति पूर्वो विरुद्धः प्रभाववान् प्राप्स्यते न वेति
संशयोऽनभिगमने च क्रोधादनर्थं करिष्यति न वेति स उभयतोऽनर्थसंशयः ॥ ४० ॥
उभयतः अनर्थसंशय—अपने पास से व्यय करके किये गये जिस समागम में यह संशय
हो कि पूर्व नायक जो प्रभावशाली पुरुष है, अब मिलेगा या नहीं और न करने पर यह संशय हो
कि क्रोध से वह अनर्थ करेगा या नहीं, दोनों ओर से अनर्थ का सन्देह होने के कारण यह
उभयतः अनर्थसंशय कहलाता है ॥ ४० ॥
एतेषामेव व्यतिकरेऽन्यतोऽर्थोऽन्यतोऽनर्थः, अन्यतोऽर्थोऽन्यतोऽर्थसंशयः,
अन्यतोऽर्थोऽन्यतोऽनर्थसंशय इति षट्सङ्कीर्णयोगाः ॥ ४१ ॥
उभयतः संकीर्ण योग—इन्हीं के विषम प्रयोगों से एक-एक के छह-छह संकीर्ण योग
बनते हैं—एक से अर्थ एक से अनर्थ, एक से अर्थ एक से अर्थसंशय और एक से अर्थ एक से
अनर्थ-संशय—ये तीन श्वेतकेतु के मत से और तीन ही बाभ्रवीय मत से, दोनों मिलाकर छह
सङ्कीर्ण योग हुए। इस प्रकार छह सङ्कीर्ण योगों का विवेचन पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
तेषु सहायैः सह विमृश्य यतोऽर्थभूयिष्ठोऽर्थसंशयो गुरुरनर्थप्रशमो वा ततः
प्रवर्तेत ॥ ४२ ॥
विवेचन का प्रयोजन—इन संशयों के उपस्थित होने पर अपने सहायकों के साथ
विचार कर, जिससे अधिक अर्थवाला संशय हो अथवा जिसमें महान् अनर्थ की शान्ति हो, उसी
के साथ समागम में प्रवृत्त होना चाहिये ॥ ४२ ॥
काम० १४

१८८ वात्स्यायन-कामसूत्र
एवं धर्मकामावप्यनयैव युक्त्योदाहरेत्। सङ्कीरेच्च परस्परेण व्यतिषञ्-
येच्चेत्युभयतोयोगाः॥ ४३॥
अवशिष्टों के शुद्ध, सङ्कीर्ण और संश्लिष्ट—जिस युक्ति से अर्थ के शुद्ध उभयतो योग
बताये गये हैं उसी युक्ति से धर्म और काम के भी शुद्ध उभयतो योग बना लें, अर्थ के समान ही
इनके सङ्कीर्ण उभयतो योग भी बना लें, और फिर उनके विरोधी भाव हटाकर उन्हें परस्पर
संश्लिष्ट भी कर दें॥ ४३॥
सम्भूय च विटाः परिगृह्णन्त्येकामसौ गोष्ठीपरिग्रहः॥ ४४॥
गोष्ठीपरिग्रह—बहुत से विट (रसलम्पट) मिलकर एक वेश्या के साथ रतिक्रीड़ा करें
तो उसे ‘गोष्ठीपरिग्रह’ कहते हैं॥ ४४॥
सा तेषामितस्ततः संसृज्यमाना प्रत्येकं सङ्घर्षार्थं निर्वर्तयेत्॥ ४५॥
समन्ततो योग में वेश्या का कर्तव्य—गोष्ठीपरिग्रह वाली वेश्या को चाहिये कि इधर
उधर मिलती हुई, नायकों से स्पर्धा कराकर उनसे धन प्राप्त कर ले॥ ४५॥
सुवसन्तकादिषु च योगे यो मे इमममुं च सम्पादयिष्यति तस्याद्य गमिष्यति मे
दुहितेति मात्रा वाचयेत्॥ ४६॥
स्पर्धा का कारण—वेश्या की माँ उसके नायकों से यह कहलवा दे कि सुवसन्तक
आदि उत्सव पर यह उसी के साथ प्रथम समागम करेगी, जो इन इन वस्तुओं को लाकर उसे
देगा॥ ४६॥
तेषां च सङ्घर्षजेऽभिगमने कार्याणि लक्षयेत्॥ ४७॥
उस समय जब नायक वेश्या से मिलने के लिये स्पर्धा करने लगे तो अपने लक्ष्य (लाभ)
पर ही ध्यान रखे॥ ४७॥
एकतोऽर्थः सर्वतोऽर्थः, एकतोऽनर्थः सर्वतोऽनर्थः, अर्धतोऽर्थः सर्वतोऽर्थः,
अर्धतोऽनर्थः सर्वतोऽनर्थः—इति समन्ततो योगाः॥ ४८॥
लाभनिर्देश—एक से अर्थ सबसे अर्थ, एक से अनर्थ सबसे अनर्थ, आधों से अर्थ सबसे
अर्थ, आधों से अनर्थ सबसे अनर्थ—ये समन्ततो योग हैं॥ ४८॥
अर्थसंशयमनर्थसंशयं च पूर्ववद्योजयेत्। सङ्कीरेच्च तथा धर्मकामावपि।
इत्यर्थानर्थानुबन्धसंशयविचाराः॥ ४९॥
पूर्ववत् अर्थसंशय और अनर्थसंशय की योजना कर लेनी चाहिये, साथ ही संकीर्ण को भी
समझ लेना चाहिये। इसी प्रकार धर्म और काम के समन्ततो योग भी समझ लेने चाहिये। इस
प्रकार अनुबन्ध, अर्थ, अनर्थ और संशयों के विचार पूर्ण हुए॥ ४९॥
कुम्भदासी परिचारिका कुलटा स्वैरिणी नटी शिल्पकारिका प्रकाशविनष्टा
रूपाजीवा गणिका चेति वेश्याविशेषाः॥ ५०॥
कुम्भदासी, परिचारिका, कुलटा, स्वैरिणी, नटी, शिल्पकारिका, प्रकाशविनष्टा, रूपाजीवा
और गणिका—ये वेश्या के भेद हैं॥ ५०॥

७. औपनिषदिक अधिकरण १८९
सर्वासां चानुरूपेण गम्याः सहायास्तदुपराञ्जनमर्थागमोपाया निष्कासनं पुनः
सन्धानं लाभविशेषानुबन्धा अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचाराश्चेति वैशिकम् ॥ ५१ ॥
जितने प्रकार की वेश्याएँ बतायी गयी हैं, उतने ही प्रकार के उनके मिलने वाले भी होते
हैं। वेश्याएँ, उनके नायक, उनके सहायक, अनुरक्त करने के उपाय, अर्थप्राप्ति के उपाय, धनहीन
नायकों को निकालने की रीति, वियुक्त को मिलाने की रीति; लाभविशेष, अर्थ, अनर्थ, अनुबन्ध
और संशयों का विचार—यही इस अधिकरण के प्रमुख प्रतिपाद्य (विषय) हैं ॥ ५१ ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
रत्यर्थाः पुरुषा येन रत्यर्थाश्चैव योषितः।
शास्त्रस्यार्थप्रधानत्वात्तेन योगोऽत्र योषिताम् ॥ ५२ ॥
इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
पुरुष और स्त्री, दोनों ही रतिसुख की कामना करते हैं, दोनों का प्रयोजन रतिसुख ही
होता है। क्योंकि रतिसुख का केन्द्र स्त्री है, इसलिये स्त्रियों के रति प्रयोजन पर यहाँ विस्तार से
विचार किया गया है ॥ ५२ ॥
सन्ति रागपरा नार्यः सन्ति चार्थपरा अपि।
प्राक्तत्र वर्णितो रागो वेश्यायोगाश्च वैशिके ॥ ५३ ॥
उपसंहार—कुछ स्त्रियाँ शुद्ध राग की ही कामना करती हैं और कुछ रति के साथ धन
की भी इच्छा करती हैं। रागिणी स्त्रियों का वर्णन तो पिछले अधिकरणों में कर दिया गया है और
जो रति (राग) के साथ धन की भी इच्छा करती हैं, उनका वर्णन इस अधिकरण में किया गया
है ॥ ५३ ॥
अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारप्रकरण
नामक षष्ठ अध्याय सम्पन्न ॥
◉
७.
औपनिषदिक नामक सप्तम अधिकरण
प्रथम अध्याय
सुभगङ्करणादिप्रकरण
व्याख्यातं च कामसूत्रम् ॥ १ ॥
स्वयं शास्त्रकार महर्षि वात्स्यायन इस प्रकरण का सम्बन्ध बताते हुए कहते हैं—कामसूत्र
की व्याख्या समाप्त हुई ॥ १ ॥
तत्रोक्तेस्तु विधिभिरभिप्रेतमर्थमनधिगच्छन्नौपनिषदिकमाचरेत् ॥ २ ॥

१९० वात्स्यायन-कामसूत्र
यदि पूर्वोक्त विधियों (तन्त्र१ और आवाप२) से अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति न हो सके तो इस
औपनिषदिक३ अधिकरण में बताये गये उपायों को प्रयोग में लाना चाहिये ॥ २ ॥
रूपं गुणो वयस्त्याग इति सुभगङ्करणम् ॥ ३ ॥
सुभगङ्करण (सौन्दर्यवर्धक) योग—रूप, गुण, अवस्था और उदारता—ये चार बातें
मनुष्य को सौभाग्यशाली बनाती हैं ॥ ३ ॥
तगरकुष्ठतालीसपत्रकानुलेपनं सुभगङ्करणम् ॥ ४ ॥
सौन्दर्यवर्धक योग—तगर, कूट और तालीशपत्र का लेप करना सौन्दर्य बढ़ाता है ॥ ४ ॥
एतैरेव सुपिष्टैर्वर्तिमालिम्याक्षतैलेन नरकपाले साधितमञ्जनं च ॥ ५ ॥
सुभगङ्करण काजल—उपर्युक्त वस्तुओं को पीसकर और रूई को बत्ती में लपेटकर
बहेड़े के तैल में जलाकर नरकपाल में अंजन बना ले ॥ ५ ॥
पुनर्नवासहदेवीसारिवाकुरण्टोत्पलपत्रैश्च सिद्धं तैलमभ्यञ्जनम् ॥ ६ ॥
सुभगङ्करण तैल—पुनर्नवा, सहदेवी, अनन्तमूल, कुरण्ट (पियाबाँसा) और उत्पल
(नीलकमल)—इन सबका तैल बनाकर लगाने से सौभाग्य-सौन्दर्य बढ़ता है ॥ ६ ॥
तद्युक्ता एव स्त्रजश्च ॥ ७ ॥
सुभगङ्कर माला—पुनर्नवा आदि वस्तुओं को माला में लगाकर पहने ॥ ७ ॥
पद्मोत्पलनागकेसराणां शोषितानां चूर्णं मधुघृताभ्यामवलिह्य सुभगो
भवति ॥ ८ ॥
सुभगङ्कर चटनी—पद्म (लाल कमल), उत्पल (नील कमल) और नागकेसर के चूर्ण
को शहद और घी के साथ मिलाकर चाटने से भी सौन्दर्य (सौभाग्य) बढ़ता है ॥ ८ ॥
तान्येव तगरतालीसतमालपत्रयुक्तान्यनुलिप्य ॥ ९ ॥
सुभगङ्कर लेप—इन वस्तुओं में तगर, तालीशपत्र और तमालपत्र मिलाकर सुभगङ्कर
लेप भी तैयार होता है ॥ ९ ॥
मयूरस्याक्षि तरक्षोर्वा सुवर्णेनावलिप्य दक्षिणहस्तेन धारयेदिति सुभग-
ङ्करणम् ॥ १० ॥
सुभगङ्कर यंत्रधारण—मोर और चीते की आँखें सोने के ताबीज में भरकर दाहिने हाथ
में बाँधें—ये सुभग बनाने के उपाय हैं ॥ १० ॥
तथा बादरमणिं शङ्खमणिं च तथैव तेषु चाथर्वणान्योगान् गमयेत् ॥ ११ ॥
इसी प्रकार बादरमणि और शङ्खमणि भी हैं। अथर्ववेद में लिखे ऐसे प्रयोगों को समझ
लेना चाहिये ॥ ११ ॥
विद्यात्तन्त्राच्च विद्यायोगात् प्राप्तयौवनां परिचारिकां स्वामी संवत्सर-
१. पूर्वोक्त रत्युत्पादक आलिङ्गन, चुम्बन आदि तन्त्र कहलाते हैं।
२. पूर्वोक्त स्त्री आदि की प्राप्ति आवाप कही जाती है।
३. गूढ या गोपनीय सिद्धान्त औपनिषदिक कहलाते हैं।

७. औपनिषदिक अधिकरण १९१
मात्रमन्यतो वारयेत्। ततो वारितां बालां वामत्वाल्लालसीभूतेषु गम्येषु योऽस्यै
संघर्षेण बहु दद्यात्तस्मै विसृजेदिति सौभाग्यवर्धनम्॥ १२॥
विद्यातन्त्र और विद्यायोग से यौवनावस्था को प्राप्त परिचारिका को स्वामी एक वर्ष तक
समागम से रक्षित रखे। इस प्रकार रक्षित परिचारिका को दूसरे पुरुष बाला मानकर समागम और
विवाह की इच्छा प्रकट करेंगे। इस प्रकार लालसा की स्पर्धा में जो अधिक धन दे, उसी को
परिचारिका सौंप दे, यह परिचारिका के सौभाग्यवर्धन की विधि है॥ १२॥
गणिका प्राप्तयौवनां स्वां दुहितरं तस्या विज्ञानशीलरूपानुरूप्येण तान-
भिनिमन्त्र्य सारेण योऽस्या इदमिदं च दद्यात् स पाणिं गृह्णीयादिति सम्भाष्य
रक्षयेदिति॥ १३॥
वेश्यापुत्री के विवाह की विधि—गणिका अपनी युवा पुत्री को समान शील, रूप, गुण
और यौवनसम्पन्न युवकों को आमन्त्रित कर उनकी गोष्ठी में यह घोषणा करे कि जो मेरी पुत्री
को ये ये वस्तुएँ देगा उसी के साथ उसका विवाह कर दिया जायेगा—इस प्रकार अपनी पुत्री का
विवाह कर उसके चरित्र की रक्षा करें॥ १३॥
सा च मातुरविदिता नाम नागरिकपुत्रैर्धनिभिरत्यर्थं प्रीयेत॥ १४॥
वेश्यापुत्री का कर्तव्य—और उस वेश्यापुत्री को चाहिये कि वह उन धनी नागरिक पुत्रों
के साथ इस प्रकार प्रेम प्रदर्शित करे मानो माँ को कुछ पता ही नहीं है॥ १४॥
तेषां कलाग्रहणे गन्धर्वशालायां भिक्षुकीभवने तत्र तत्र च सन्दर्शन-
योगाः॥ १५॥
रसिकों का दर्शन—जब वे युवक कलाज्ञान के लिये अपने घर आयें तो लड़की उनसे
मिले और तत्पश्चात् गन्धर्वशाला, भिक्षुकी के घर, सरस्वतीभवन, उद्यान आदि में मिलती
रहे॥ १५॥
तेषां यथोक्तदायिनां माता पाणिं ग्राहयेत्॥ १६॥
पाणिग्रहण—जो युवक कही हुई वस्तु लाकर दे दे, उसके साथ वेश्या अपनी पुत्री का
पाणिग्रहण करा दे॥ १६॥
तावदर्थमलभमाना तु स्वेनाप्येकदेशेन दुहित्र एतद्दत्तमनेनेति
ख्यापयेत्॥ १७॥
विना धन मिले भी प्रदर्शन—जो जो वस्तुएँ उससे पहले नियत हुई हों, यदि वे सब न
भी मिलें तो वेश्या अपनी ओर से दिखाकर यह कह दे कि यह भी इस युवक ने मेरी पुत्री को
दिया है॥ १७॥
ऊढाया वा कन्याभावं विमोचयेत्॥ १८॥
अथवा कन्या के युवा हो जाने पर उपर्युक्त रीति से युवकों को फँसाकर उसका
कौमार्यभङ्ग करा दे॥ १८॥
प्रच्छन्नं वा तैः संयोज्य स्वयमजानती भूत्वा ततो विदितेष्वेतं धर्मस्थेषु
निवेदयेत्॥ १९॥

१९२ वात्स्यायन-कामसूत्र
धन वसूलने की रीति—अथवा प्रच्छन्न रूप से उन युवकों से मिलाकर उनके प्रेम को
राजकीय अधिकारियों तक पहुँचा दे और फिर उन रसिकों के विरुद्ध न्यायाधिकरण में पहुँच
जाये ॥ १९ ॥
सख्यैव तु दास्या वा 'नोचितकन्याभावां सुगृहीतकामसूत्रामाभ्यासिकेषु
योगेषु प्रतिष्ठितां प्रतिष्ठिते वयसि सौभाग्ये च दुहितरमवसृजन्ति गणिका इति
प्राच्योपचाराः ॥ २० ॥
प्राच्य देश की वेश्याओं की रीति—पूर्व प्रदेशों की वेश्याएँ सखी या दासी से लड़की
का कौमार्यहरण कराकर काम के रहस्यों और योगों का अभ्यास कराती हैं। उन योगों और
कामकलाओं में दक्षता प्राप्त कर लेने पर यौवन के साथ ही उनका भाग्य भी चमक उठता है और
तत्पश्चात् युवती को वेश्याचरित के लिये स्वतन्त्र कर देती हैं ॥ २० ॥
पाणिग्रहश्च संवत्सरमव्यभिचार्यस्ततो यथा कामिनी स्यात् ॥ २१ ॥
एक वर्ष तक पत्नीव्रत का निर्वाह—जिस युवक ने वेश्यापुत्री का पाणिग्रहण किया हो
उसके साथ वह एक वर्ष सदाचारिणी बनकर रहे। तत्पश्चात् जहाँ वह चाहे या जो उसे चाहे वहाँ
स्वच्छन्दतापूर्वक भोग करे ॥ २१ ॥
ऊर्ध्वमपि संवत्सरात् परिणीतेन निमन्त्र्यमाणा लाभमप्युत्सृज्य तां रात्रिं तस्या-
गच्छेदिति वेश्यायाः पाणिग्रहणविधिः सौभाग्यवर्धनं च ॥ २२ ॥
निमन्त्रण पर उपस्थिति आवश्यक—एक वर्ष बाद भी जब पति बुलाये तब भी
वेश्यापुत्री अर्थलाभ को छोड़कर उस रात उसके साथ समागम के लिये अवश्य आये। वेश्या के
विवाह और सौभाग्यवर्धन का विषय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥
एतेन रङ्गोपजीविनां कन्या व्याख्याताः ॥ २३ ॥
अभिनेत्री कन्याओं की विवाह की रीति—इससे ही रङ्गमञ्च पर अभिनय करने वाली
कन्याओं की बात भी कह दी गयी है अर्थात् रङ्गमञ्च पर नृत्य और अभिनय करने वाली
कन्याओं की विवाह की भी यही रीति है ॥ २३ ॥
तस्मै तु तां दद्युर्य एषां तूर्ये विशिष्टमुपकुर्यात्। इति सुभगङ्करणम् ॥ २४ ॥
वैशिष्ट्यकथन—नट, नर्तक आदि अपनी पुत्री का विवाह उसी पुरुष से करें, जो उसके
नृत्य-गान आदि को उन्नत बनाने में सहायक हो। सुभगङ्करण प्रकरण पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥
धत्तूरकमरिचपिप्पलीचूर्णैर्मधुमिश्रैर्लिप्तलिङ्गस्य सम्प्रयोगो वशीकरणम् ॥ २५ ॥
वशीकरण प्रकरण : वशीकरण लेप—धतूरा, काली मिर्च और छोटी पीपल के चूर्ण
में शहद मिलाकर शिश्न पर लेप करके जिस स्त्री से समागम किया जाये वह वशीभूत हो जाती
है ॥ २५ ॥
वातोद्भ्रान्तपत्रं मृतकनिर्माल्यं मयूरास्थिचूर्णावचूर्णं वशीकरणम् ॥ २६ ॥
वशीकरण चूर्ण—हवा से उड़ा हुआ पत्ता, शव पर चढ़ाया गया फूल और मोर की हड्डी
के चूर्ण का अवचूर्ण (सूक्ष्म चूर्ण) उत्तम वशीकरण है ॥ २६ ॥

७. औपनिषदिक अधिकरण १९३
स्वयं मृताया मण्डलकारिकायाश्चूर्णं मधुसंयुक्तं सहामलकैः स्नानं वशी-
करणम् ॥ २७ ॥
वशीकरण स्नान—स्वयं मरे हुए गिद्ध (मादा) के चूर्ण में शहद मिलाकर और आँवले
के रस के साथ उबटन की तरह लगाकर स्नान करने से भी स्त्री वशीभूत हो जाती है ॥ २७ ॥
वज्रस्नुहीगण्डकानि खण्डशः कृतानि मनःशिलागन्धपाषाणचूर्णेनाभ्यज्य
सप्तकृत्वः शोषितानि चूर्णयित्वा मधुना लिप्तलिङ्गस्य सम्प्रयोगो वशी-
करणम् ॥ २८ ॥
शिश्नलेप—थूहर की गाँठें टुकड़े-टुकड़े करके उनमें मैनशिल और गन्धक को
लपेटकर सात बार सुखाये, फिर उसका चूर्ण बनाकर शिश्न पर लेप करके जिस स्त्री से समागम
किया जाये वह वशीभूत हो जाती है ॥ २८ ॥
एतेनैव रात्रौ धूमं कृत्वा तद्धूमतिरस्कृतं सौवर्णं चन्द्रमसं दर्शयति ॥ २९ ॥
उपर्युक्त वस्तुओं के चूर्ण का रात्रि में धुआँ करने पर धुएँ से ढका चन्द्र सोने का-सा
दिखायी देता है ॥ २९ ॥
एतैरेव चूर्णैर्तानरपुरीषमिश्रितैर्यां कन्यामवकिरेत् साऽन्यस्मै न दीयते ॥ ३० ॥
वाञ्छित कन्या से विवाह की रीति—इन्हीं वस्तुओं के चूर्ण में बन्दर की विष्ठा
मिलाकर जिस कन्या पर छिड़क दी जाये, वह किसी अन्य को नहीं दी जा सकती अर्थात् वह
वशीभूत हो जाती है और प्रयोक्ता से ही विवाह करती है ॥ ३० ॥
वचागण्डकानि सहकारतैललिप्तानि शिंशपावृक्षस्कन्धमुत्कीर्य षण्मासं निद-
ध्यात् ततः षड्भिर्मासैरपनीतानि देवकान्तमनुलेपनं वशीकरणं चेत्याचक्षते ॥ ३१ ॥
देवकान्त अनुलेप—वचा की गाँठें आम के तैल में भिगोकर शीशम के तने में खोदकर
रख दे। छह मास पश्चात् निकाले। यह देवकान्त अनुलेप उत्तम वशीकरण है—ऐसा कहा
जाता है ॥ ३१ ॥
तथा खदिरसारजानि शकलानि तनूनि यं वृक्षमत्कीर्य षण्मासं निदध्यात्
तत्पुष्पगन्धानि भवन्ति गन्धर्वकान्तमनुलेपनं वशीकरणं चेत्याचक्षते ॥ ३२ ॥
गन्धर्वकान्त अनुलेप—इसी प्रकार खदिरसार (कत्था) के टुकड़ों को पतला करके
और आम के तैल में भिगोकर जिस वृक्ष के तने में छह मास के लिये रख देंगे, वे उसी के समान
सुगन्ध वाले हो जायेंगे। यह गन्धर्वकान्त अनुलेप उत्तम वशीकरण है—ऐसा कहा जाता
है ॥ ३२ ॥
प्रियङ्गवस्तगरमिश्राः सहकारतैलदिग्धा नागवृक्षमुत्कीर्य षण्मासं निहिता
नागकान्तमनुलेपनं वशीकरणमित्याचक्षते ॥ ३३ ॥
नागकान्त अनुलेप—तगर और काँगनी को मिलाकर और आम के तेल में भिगोकर
नागकेसर के तने में छह मास के लिये दबा दे। नागकान्त नामक यह अनुलेप उत्तम वशीकरण
है—ऐसा कहा जाता है ॥ ३३ ॥

१९४ वात्स्यायन-कामसूत्र
उष्ट्रास्थि भृङ्गराजरसेन भावितं दग्धमञ्जनं नलिकायां निहितमुष्ट्रास्थि-
शलाकयैव स्रोतोऽञ्जनसहितं पुण्यं चक्षुष्यं वशीकरणं चेत्याचक्षते ॥ ३४ ॥
पुण्य अंजन—ऊँट की हड्डियों में भृङ्गराज के रस की भावना देकर अंजन के समान
पुटपाक विधि से जलाकर काजल बना ले। इसे ऊँट की हड्डियों से बनी सुरमादानी में रखे और
ऊँट की हड्डी से बनी सलाई से आँखों में लगावे। यह नेत्रों के लिये हितकारी और उत्तम
वशीकरण है—ऐसा कहा जाता है ॥ ३४ ॥
एतेन श्येनभासमयूरास्थिमयान्यञ्जनानि व्याख्यातानि ॥ ३५ ॥
इसी प्रकार श्येन, भास, मयूर आदि पक्षियों की हड्डियों का अंजन भी उपर्युक्त विधि से
बनाया जा सकता है ॥ ३५ ॥
उच्चटाकन्दश्चव्या यष्टीमधुकं च सशर्करेण पयसा पीत्वा वृषीभवति ॥ ३६ ॥
बल-वीर्यवर्धक (वृष्य) प्रकरण : उच्चटा और मुलहठी—उच्चटा (उटंगण) और
मुलहठी के चूर्ण को शक्कर मिले दूध के साथ पीने से पुरुष के बलवीर्य में वृद्धि होती है ॥ ३६ ॥
मेषवस्तमुष्कसिद्धस्य पयसः सशर्करस्य पानं वृषत्वयोगः ॥ ३७ ॥
मेढ़ा और बकरे का अण्डकोश—मेढ़ा या बकरे के अण्डकोशों को दूध में पकाकर
और शक्कर डालकर पीने से भी बलवीर्य की वृद्धि होती है ॥ ३७ ॥
तथा विदार्याः क्षीरिकायाः स्वयंगुप्तायाश्च क्षीरेण पानम् ॥ ३८ ॥
विदारीकन्द, वंशलोचन और क्रौंच—विदारीकन्द, वंशलोचन और क्रौंच के बीजों के
चूर्ण को दूध के साथ पीने से बलवीर्य की वृद्धि होती है ॥ ३८ ॥
तथा प्रियालबीजानां मोरटाविदार्योश्च क्षीरेणैव ॥ ३९ ॥
चिरौंजी, मुहार और श्वेत विदारी—इसी प्रकार चिरौंजी, मुहार (मुरहरी) और श्वेत
विदारी—इनका चूर्ण दूध के साथ पीने से बलवीर्य की वृद्धि होती है ॥ ३९ ॥
शृङ्गाटककसेरुकामधूलिकानि क्षीरकाकोल्या सह पिष्टानि सशर्करेण पयसा
घृतेन मन्दाग्निनोत्करिकां पक्त्वा यावदर्थं भक्षितवानन्ताः स्त्रियो गच्छतीत्याचार्याः
प्रचक्षते ॥ ४० ॥
क्षीरकाकोली, सिंघाड़ा, कसेरू और महुआ—सिंघाड़ा, कसेरू और महुआ के फूलों
को क्षीरकाकोली के कन्द के साथ पीसकर शक्करमिश्रित दूध के साथ मिलाकर, घी में मन्द
मन्द अग्नि पर हलुआ बनाकर नित्य खाने से इतना बलवीर्य बढ़ता है कि पुरुष अनन्त रमणियों
के साथ रमण कर सकता है—ऐसा आचार्य कहते हैं ॥ ४० ॥
माषकमलिनीं पयसा धौतामुष्णेन घृतेन मृदुकृत्योद्धृतां वृद्धवत्सायाः गोः
पयःसिद्धं पायसं मधुसर्पिर्भ्यामशित्वाऽनन्ताः स्त्रियो गच्छतीति आचार्याः
प्रचक्षते ॥ ४१ ॥
उड़द की दाल की खीर—उड़द की धुली दाल को रात में दूध में भिगो दे और प्रातः
पीसकर घी में लाल होने तक भूने। फिर बाखरी गाय या बकरी का दूध डालकर खीर बना लें।
विषम मात्रा में घी और शहद डालकर खाने से पुरुष में अनन्त स्त्रियों के साथ सम्भोग करने की
शक्ति आ जाती है—ऐसा आचार्य कहते हैं ॥ ४१ ॥

७. औपनिषदिक अधिकरण १९५
विदारी स्वयंगुप्ता शर्करा मधुसर्पिभ्यां गोधूमचूर्णेन पोलिकां कृत्वा यावदर्थं
भक्षितवानन्ताः स्त्रियो गच्छतीत्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४२ ॥
विदारीकन्द और क्रौंच की पूड़ियाँ—विदारीकन्द और क्रौंच के बीजों के चूर्ण में गेहूँ
का आटा, शहद और शक्कर मिलाकर घी में पूड़ियाँ सेंक लें। इन्हें नित्य खाने से पुरुष में इतना
बलवीर्य बढ़ता है कि वह अनन्त स्त्रियों के साथ सम्भोग कर सकता है—ऐसा आचार्य
कहते हैं ॥ ४२ ॥
चटकाण्डरसभावितैस्तण्डुलैः पायसं सिद्धं मधुसर्पिभ्यां प्लावितं
यावदर्थमिति समानं पूर्वेण ॥ ४३ ॥
गौरैया के अण्डों से भावित खीर—चिड़िया के अण्डों के रस की भावना देकर तैयार
किये गये चावलों की खीर बनाये। उसे विषम मात्रा में घी और शहद डालकर खाने से पुरुष में
अनन्त स्त्रियों के साथ सम्भोग करने की शक्ति आ जाती है ॥ ४३ ॥
चटकाण्डरसभावितानपगतत्वचस्तिलाञ् शृङ्गाटककसेरुकस्वयंगुप्ता-
फलानि गोधूममाषचूर्णं सशर्करेण पयसा सर्पिषा च पक्वं संयावं यावदर्थं
प्राशित्वा—इति समानं पूर्वेण ॥ ४४ ॥
उक्त रीति से भावित तिलों की खीर—काले तिलों को भिगोकर उनका छिलका अलग
कर लिया जाये और फिर गौरैया के अण्डों के रस की भावना दे। तत्पश्चात् सिंघाड़ा, कसेरू और
क्रौंच के बीजों का चूर्ण तैयार करे। गेहूँ का आटा और उड़द की दाल की पिट्ठी मिलाकर तथा
शक्कर, घी से जल के स्थान पर दूध डालकर लप्सी तैयार कर ले। इसे नित्य खाने से
रतिमल्लता बढ़ती है ॥ ४४ ॥
सर्पिणो मधूनः शर्कराया मधुकस्य च द्वे द्वे पले मधुरसायाः कर्षः प्रस्थं पयस
इति षडङ्गममृतं मेध्यं वृष्यमायुष्यं युक्तरसमित्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४५ ॥
मुलहठी आदि का षडङ्ग अमृत—घी, शहद, शक्कर और मुलहठी दो-दो पल, एक
कर्ष मधुरसा और एक प्रस्थ दूध—यह छह अंगों वाला अमृतमेध्य है, वाजीकरण है, आयुर्वर्धक
हैं। इसे युक्तरस कहते हैं ॥ ४५ ॥
शतावरीश्वदंष्ट्रागुडकषाये पिप्पलीमधुकल्के गोक्षीरच्छागघृते पक्वे तस्य
पुष्यारम्भेणान्वहं प्राशनं मेध्यं वृष्यमायुष्यं युक्तरसमित्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४६ ॥
शतावरी और गोखरू—शतावरी और पहाड़ी गोखरू—इन दोनों वस्तुओं के कषाय में
पीपल और शहद का कल्क मिलाकर गाय के घी में भूनकर दूध में पका लें। इसे पुष्य नक्षत्र में
नित्य चाटना बलबुद्धिवर्धक है, वाजीकारक है, आयुर्वर्धक है। इसे आचार्य 'युक्तरस'
कहते हैं ॥ ४६ ॥
शतावर्याः श्वदंष्ट्रायाः श्रीपर्णीफलानां च क्षुण्णानां चतुर्गुणितजलेन पाक
आप्रकृत्यवस्थानात् तस्य पुष्यारम्भेण प्रातः प्राशनं मेध्यं वृष्यमायुष्यं युक्तरस-
मित्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४७ ॥
शतावरी, गोखरू और श्रीपर्णी—शतावरी, पहाड़ी गोखरू और श्रीपर्णी (कसेरू) के

१९६ वात्स्यायन-कामसूत्र
फूल कूटकर चार गुने जल में अग्नि पर चढ़ा दें। जब पानी जल जाये तो उतार लें। इसे पुष्य
नक्षत्र से प्रातःकाल चाटना प्रारम्भ कर दे। यह बलबुद्धिवर्धक, वाजीकरण और आयुर्वर्धक है।
इसे आचार्य युक्तरस कहते हैं॥ ४७॥
श्वदंष्ट्राचूर्णसमन्वितं तत्सममेव यवचूर्णं प्रातरुत्थाय द्विपलकमनुदिनं प्राश्नी-
यान्मेध्यं वृष्यं युक्तरसमित्याचार्याः प्रचक्षते॥ ४८॥
गोखरू और जौ—पहाड़ी गोखरू का चूर्ण और जौ का आटा सममात्रा में लेकर प्रातः
दो पल प्रतिदिन खाये। यह बलबुद्धिवर्धक, वाजीकरण और आयुर्वर्धक है। इसे आचार्यों ने
'युक्तरस' कहा है॥ ४८॥
आयुर्वेदाच्च वेदाच्च विद्यातन्त्रेभ्य एव च।
आप्तेभ्यश्चावबोद्धव्या योगा ये प्रीतिकारकाः॥ ४९॥
उपसंहार—पूर्वोक्त वाजीकारक योगों के अतिरिक्त अन्य भी रागरतिवर्धक योग हैं। उन्हें
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७. औपनिषदिक अधिकरण १९७
मदनमन्दिर में अंगुली डालकर उसे भली भाँति रससिक्त कर ले, तत्पश्चात् समागम प्रारम्भ करे।
इससे वह स्त्री को पहले स्खलित करके उसका नष्ट राग पुनः प्राप्त कर सकता है ॥ २ ॥
औपरिष्टकं मन्दवेगस्य गतवयसो व्यायतस्य रतश्रान्तस्य च रागप्रत्या-
नयनम् ॥ ३ ॥
जो पुरुष मन्दवेग है, जिसका यौवन ढल गया हो, जो बहुत मोटा हो और जो समागम में
थक गया हो, उसे चाहिये कि साम्प्रयोगिक अधिकरण में कही गयी औपरिष्टक (मुखमैथुन)
विधि से अपने में उत्तेजना प्राप्त कर ले ॥ ३ ॥
अपद्रव्याणि वा योजयेत् ॥ ४ ॥
अपद्रव्यों का प्रयोग—अथवा अपद्रव्यों का प्रयोग करे अर्थात् कृत्रिम साधनों से काम
चलाये ॥ ४ ॥
तानि सुवर्णरजतताम्रकालायसगजदन्तगवलद्रव्यमयानि ॥ ५ ॥
अपद्रव्य—इस प्रकार के कृत्रिम साधन सोना, चाँदी, ताबाँ, लोहा, हाथीदाँत और सींग
से बनाये जाते हैं ॥ ५ ॥
त्रापुषाणि सैसकानि च मृदूनि शीतवीर्याणि कर्मणि च धृष्णूनि भवन्तीति
बाभ्रवीया योगाः ॥ ६ ॥
क्योंकि राँगे और सीसे से बने कृत्रिम साधन कोमल, शीतल और घर्षणशील होते हैं—
ऐसा आचार्य बाभ्रव्य के शिष्यों का मत है ॥ ६ ॥
दारुमयानि साम्यतश्चेति वात्स्यायनः ॥ ७ ॥
यदि अनुकूल पड़े तो लकड़ी का कृत्रिम साधन भी प्रयोग किया जा सकता है—यह
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ७ ॥
लिङ्गप्रमाणान्तरं बिन्दुभिः कर्कशपर्यन्तं बहुलं स्यात् ॥ ८ ॥
कृत्रिम साधन पुरुष के शिश्न की माप का ही होना चाहिये और इसके अग्रभाग पर बहुत
से विन्दु होने चाहिये जिससे स्त्री की खाज मिट सके ॥ ८ ॥
एते एव द्वे सङ्घाटौ ॥ ९ ॥
कृत्रिम साधन में कम से कम दो जोड़ या उतार चढ़ाव अवश्य होने चाहिये ॥ ९ ॥
त्रिप्रभृति यावत्प्रमाणं वा चूडकः ॥ १० ॥
चूडक—शश से लेकर अश्व तक पुरुष के शिश्न के जो प्रमाण बताये गये हैं, उतने
प्रमाण वाला कृत्रिम साधन चूडक कहलाता है ॥ १० ॥
एकामेव लतिकां प्रमाणवशेन वेष्टयेदित्येकचूडकः ॥ ११ ॥
एकचूडक—जो अपने प्रमाण से एक ही लता को लपेट सके, ऐसा कृत्रिम साधन
एकचूडक कहलाता है ॥ ११ ॥
उभयतोमुखच्छिद्रः स्थूलकर्कशवृषणगुटिकायुक्तः प्रमाणवशयोगी कट्यां
बद्धः कञ्चुको जालकं वा ॥ १२ ॥
कञ्चुक या जालक—जिसके दोनों ओर छेद किये गये हों, जो स्थूल और कर्कश हो,