वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६. वैशिक अधिकरण १८७
ओर से अनर्थ का संशय होने पर 'उभयतः अनर्थसंशय' होता है। उद्दालक के पुत्र श्वेकेतु
द्वारा कहे गये उभयतो योग पूर्ण हुए॥ ३५ ॥
बाभ्रवीयास्तु ॥ ३६ ॥
इस विषय में आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायी यह बताते हैं ॥ ३६ ॥
यत्राभिगमनेऽर्थोनभिगमने च सक्तादर्थः स उभयतोऽर्थः ॥ ३७॥
उभयतः अर्थयोग—जिस उभयतो योग में पूर्व नायक से समागम किये बिना ही दूसरे
(अपूर्व) से अर्थ प्राप्त कर लिया जाये और बाद में अनुरक्त नायक को भी प्रसन्न कर अर्थ प्राप्त
किया जाये तो वह 'उभयतः अर्थयोग' कहलाता है ॥ ३७ ॥
यत्राभिगमने निष्फलो व्ययोऽनभिगमने च निष्प्रतीकारोऽनर्थः स उभयतोऽ-
नर्थः ॥ ३८ ॥
उभयतः अनर्थयोग—जिस समागम में निष्फल व्यय हो और समागम न करने पर
अपरिहार्य संकट आने की आशंका हो, वह 'उभयतः अनर्थयोग' कहलाता है ॥ ३८ ॥
यत्राभिगमने निर्व्ययो दास्यति न वेति संशयोऽनभिगमने सक्तो दास्यति न वेति
स उभयतोऽर्थसंशयः ॥ ३९ ॥
उभयतो अर्थसंशय—जिस समागम में अपना तो कुछ खर्च न हो, लेकिन देगा या
नहीं? यह सन्देह बना हुआ हो और अनुरक्त नायक भी बिना समागम के देगा या नहीं? —यह
संशय हो तो यह 'उभयतः अर्थसंशय' कहलाता है ॥ ३९ ॥
यत्राभिगमने व्ययवति पूर्वो विरुद्धः प्रभाववान् प्राप्स्यते न वेति
संशयोऽनभिगमने च क्रोधादनर्थं करिष्यति न वेति स उभयतोऽनर्थसंशयः ॥ ४० ॥
उभयतः अनर्थसंशय—अपने पास से व्यय करके किये गये जिस समागम में यह संशय
हो कि पूर्व नायक जो प्रभावशाली पुरुष है, अब मिलेगा या नहीं और न करने पर यह संशय हो
कि क्रोध से वह अनर्थ करेगा या नहीं, दोनों ओर से अनर्थ का सन्देह होने के कारण यह
उभयतः अनर्थसंशय कहलाता है ॥ ४० ॥
एतेषामेव व्यतिकरेऽन्यतोऽर्थोऽन्यतोऽनर्थः, अन्यतोऽर्थोऽन्यतोऽर्थसंशयः,
अन्यतोऽर्थोऽन्यतोऽनर्थसंशय इति षट्सङ्कीर्णयोगाः ॥ ४१ ॥
उभयतः संकीर्ण योग—इन्हीं के विषम प्रयोगों से एक-एक के छह-छह संकीर्ण योग
बनते हैं—एक से अर्थ एक से अनर्थ, एक से अर्थ एक से अर्थसंशय और एक से अर्थ एक से
अनर्थ-संशय—ये तीन श्वेतकेतु के मत से और तीन ही बाभ्रवीय मत से, दोनों मिलाकर छह
सङ्कीर्ण योग हुए। इस प्रकार छह सङ्कीर्ण योगों का विवेचन पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
तेषु सहायैः सह विमृश्य यतोऽर्थभूयिष्ठोऽर्थसंशयो गुरुरनर्थप्रशमो वा ततः
प्रवर्तेत ॥ ४२ ॥
विवेचन का प्रयोजन—इन संशयों के उपस्थित होने पर अपने सहायकों के साथ
विचार कर, जिससे अधिक अर्थवाला संशय हो अथवा जिसमें महान् अनर्थ की शान्ति हो, उसी
के साथ समागम में प्रवृत्त होना चाहिये ॥ ४२ ॥
काम० १४