वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७. औपनिषदिक अधिकरण १९७
मदनमन्दिर में अंगुली डालकर उसे भली भाँति रससिक्त कर ले, तत्पश्चात् समागम प्रारम्भ करे।
इससे वह स्त्री को पहले स्खलित करके उसका नष्ट राग पुनः प्राप्त कर सकता है ॥ २ ॥
औपरिष्टकं मन्दवेगस्य गतवयसो व्यायतस्य रतश्रान्तस्य च रागप्रत्या-
नयनम् ॥ ३ ॥
जो पुरुष मन्दवेग है, जिसका यौवन ढल गया हो, जो बहुत मोटा हो और जो समागम में
थक गया हो, उसे चाहिये कि साम्प्रयोगिक अधिकरण में कही गयी औपरिष्टक (मुखमैथुन)
विधि से अपने में उत्तेजना प्राप्त कर ले ॥ ३ ॥
अपद्रव्याणि वा योजयेत् ॥ ४ ॥
अपद्रव्यों का प्रयोग—अथवा अपद्रव्यों का प्रयोग करे अर्थात् कृत्रिम साधनों से काम
चलाये ॥ ४ ॥
तानि सुवर्णरजतताम्रकालायसगजदन्तगवलद्रव्यमयानि ॥ ५ ॥
अपद्रव्य—इस प्रकार के कृत्रिम साधन सोना, चाँदी, ताबाँ, लोहा, हाथीदाँत और सींग
से बनाये जाते हैं ॥ ५ ॥
त्रापुषाणि सैसकानि च मृदूनि शीतवीर्याणि कर्मणि च धृष्णूनि भवन्तीति
बाभ्रवीया योगाः ॥ ६ ॥
क्योंकि राँगे और सीसे से बने कृत्रिम साधन कोमल, शीतल और घर्षणशील होते हैं—
ऐसा आचार्य बाभ्रव्य के शिष्यों का मत है ॥ ६ ॥
दारुमयानि साम्यतश्चेति वात्स्यायनः ॥ ७ ॥
यदि अनुकूल पड़े तो लकड़ी का कृत्रिम साधन भी प्रयोग किया जा सकता है—यह
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ७ ॥
लिङ्गप्रमाणान्तरं बिन्दुभिः कर्कशपर्यन्तं बहुलं स्यात् ॥ ८ ॥
कृत्रिम साधन पुरुष के शिश्न की माप का ही होना चाहिये और इसके अग्रभाग पर बहुत
से विन्दु होने चाहिये जिससे स्त्री की खाज मिट सके ॥ ८ ॥
एते एव द्वे सङ्घाटौ ॥ ९ ॥
कृत्रिम साधन में कम से कम दो जोड़ या उतार चढ़ाव अवश्य होने चाहिये ॥ ९ ॥
त्रिप्रभृति यावत्प्रमाणं वा चूडकः ॥ १० ॥
चूडक—शश से लेकर अश्व तक पुरुष के शिश्न के जो प्रमाण बताये गये हैं, उतने
प्रमाण वाला कृत्रिम साधन चूडक कहलाता है ॥ १० ॥
एकामेव लतिकां प्रमाणवशेन वेष्टयेदित्येकचूडकः ॥ ११ ॥
एकचूडक—जो अपने प्रमाण से एक ही लता को लपेट सके, ऐसा कृत्रिम साधन
एकचूडक कहलाता है ॥ ११ ॥
उभयतोमुखच्छिद्रः स्थूलकर्कशवृषणगुटिकायुक्तः प्रमाणवशयोगी कट्यां
बद्धः कञ्चुको जालकं वा ॥ १२ ॥
कञ्चुक या जालक—जिसके दोनों ओर छेद किये गये हों, जो स्थूल और कर्कश हो,