वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० वात्स्यायन-कामसूत्र
तत्रापि गुरुलाघवकृतो विशेषः ॥ २६ ॥
व्यवस्थाविषयक विचार—यहाँ भी न्यूनाधिक समझकर ही विशेष को ग्रहण करना
चाहिये ॥ २६ ॥
एतेनार्थसंशयादनर्थप्रतीकारे विशेषो व्याख्यातः ॥ २७ ॥
सिद्धान्त का स्पष्टीकरण—इस कथन से यह बात भी कह दी गयी है कि अर्थ के संशय
से अनर्थ के निवारण में ही विशेष लाभ है ॥ २७ ॥
देवकुलतडागारामणां करणम्, स्थलीनामग्निचैत्यानां निबन्धनम्,
गोसहस्त्राणां पात्रान्तरितं ब्राह्मणेभ्यो दानम्, देवतानां पूजोपहारप्रवर्तनम्,
तद्व्ययसहिष्णोर्वा धनस्य परिग्रहणमित्युत्तमगणिकानां लाभातिशयः ॥ २८ ॥
उत्तम गणिकाओं के लाभ—देवमन्दिर बनवाना, कूआ-बावड़ी खुदवाना, बाग
लगवाना, आवागमन के लिये पुल बनवाना, निवासस्थान के बाहर मिट्टी का घर या मन्दिर
बनवाकर अग्निहोत्र कराना, किसी को माध्यम बनाकर ब्राह्मणों को एक हजार गायें दान देना,
देवताओं के भोग एवं प्रसाद का प्रबन्ध करना—इन धार्मिक और लोकोपकारी कार्यों के व्यय
को सहन कर ले, इतना धन उत्तम गणिकाओं का अतिशय लाभ है ॥ २८ ॥
सार्वाङ्गिकोऽलङ्कारयोगो गृहस्योदारस्य करणम्। महार्हैर्भाण्डैः परिचारकैश्च
गृहपरिच्छदस्योज्ज्वलतेति रूपाजीवानां लाभातिशयः ॥ २९ ॥
रूपाजीवा के लाभ—सम्पूर्ण शरीर पर आभूषण धारण करना, निवासस्थान को
कलात्मक ढंग से सजाकर रखना और उसमें बहुमूल्य बर्तनों और नौकरों द्वारा गृह के भीतरी
भाग को साफ-सुथरा और सुसज्जित रखना—ये रूपाजीवा के विशेष लाभ हैं ॥ २९ ॥
नित्यं शुक्लमच्छादनमपक्षुधमन्नपानं नित्यं सौगन्धिकेन ताम्बूलेन च योगः
सहिरण्यभागमलङ्करणमिति कुम्भदासीनां लाभातिशयः ॥ ३० ॥
कुम्भदासी के लाभ—नित्य साफ सुथरे कपड़े पहनना, भरपेट स्वादिष्ट भोजन करना,
सुगन्धित तेल प्रयोग करना, सुवासित पान खाना, चाँदी के आभूषणों के साथ एकाध सोने का
आभूषण भी पहनना—ये कुम्भदासियों के अतिशय लाभ हैं ॥ ३० ॥
एतेन प्रदेशेन मध्यमाधमानामपि लाभातिशयान् सर्वासामेव योजयेदित्या-
चार्याः ॥ ३१ ॥
लाभ पर आचार्यों का मत—जो ऊपर गणिका, रूपाजीवा और कुम्भदासी के विशेष
लाभ बताये गये हैं, उनको इसी रीति से मध्यम और अधम के साथ भी समझ लेना चाहिये—
यह कामशास्त्र के पूर्वाचार्यों का मत है ॥ ३१ ॥
देशकालविभवसामर्थ्यानुरागलोकप्रवृत्तिवशादनियतलाभादियमवृत्तिरिति
वात्स्यायनः ॥ ३२ ॥
देश, काल, वैभव, सामर्थ्य, अनुराग और लोकप्रवृत्ति (लोकाचार) के कारण लाभ
निश्चित नहीं रहता, अतएव वेश्या की वृत्ति सदैव अनियत और अनियमित रहती है—यह
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ३२ ॥